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​प्रीतीश नंदी का कॉलम: क्या आखिरकार चुनावी हवा बदल रही है?

प्रधानमंत्री भयावह अपराधों की अनदेखी करते रहे तो अगले आम चुनाव में यह भारी पड़ सकता है।

Danik Bhaskar | Aug 30, 2018, 11:06 PM IST

ईमानदारी की बात है, मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी बुद्धिजीवी या जन्मजात नेता की श्रेणी में आते हैं। कम से कम अभी तो नहीं। न मुझे वे उनकी दादी जितने चतुर लगते हैं। यह कहने के बावजूद मैं मानता हूं कि उनके भाषण दिन ब दिन बेहतर होते जा रहे हैं लेकिन, अगले साल चुनाव में अपनी पार्टी के लिए उन्हें अधिक सीटें जीतना है, तो उन्हें लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। उनके सारे प्रयासों के बावजूद कांग्रेस आंतरिक कलह और स्थानीय नेतृत्व के अभाव में फंसी है। सड़न गहराई तक पैठी है और यदि राहुल को चीजें ठीक करना है, तो उन्हें कड़े फैसले लेने होंगे, जो चुनाव के इतने नज़दीक आसान नहीं है। लेकिन, एक बात साफ है कि उन्होंने अपना उद्‌देश्य स्पष्ट कर लिया है। वह यह कि भाजपा को बैकफुट पर लाना है।


हो सकता है यह आसान न हो और यदि वे उन्हें लगातार मुहिम चलाकर और समान विचारों वाले दलों के समर्थन से आंशिक कामयाबी भी मिले, तो कोई गारंटी नहीं है कि चुनाव बाद कांग्रेस मुख्य भूमिका में रहे। अभी तो विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए राहुल के सर्वसम्मति से नेता बनने के अवसर भी अस्पष्ट हैं। क्षेत्रीय नेता लोकसभा चुनाव को खुद को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने के मौके के रूप में देखेंगे। लेकिन, यह कहना बहुत मुश्किल है कि वे भाजपा को बाहर करने में सक्षम गठबंधन का नेतृत्व कर सकेंगे। फिर भी क्षेत्रीय दल भाजपा को कड़ी टक्कर देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, जबकि मुझे तो कांग्रेस अब भी बेजान ही दिखती है। भीतरी कलह जारी है, उस कर्नाटक में भी जहां जद (यू) की मदद से वह सत्ता में आने में जैसे-तैसे कामयाब रही है। इन दिनों कुमारस्वामी दुखी दिखाई देते हैं।


लेकिन, एक चीज राहुल के पक्ष में जाती दिखती है। वे सही मुद्‌दे उठा रहे हैं और उस तरह की तीखी बातें कह रहे हैं, जो आम आदमी सुनना चाहता है। उनकी राय लोकप्रिय भावना से मेल खा रही है। लोग हर सुबह मॉब लिंचिंग और दुष्कर्म के बारे में सुनकर परेशान हैं। वे भाजपा नेताओं के नफरत भरे बयानों से ऊब गए हैं। वे खुलेआम, बिना किसी भय के भयानक अपराध किए जाने से रुष्ट हैं। वे उनसे भी नाराज हैं, जो निर्लज्जता से ऐसे लोगों का बचाव कर रहे हैं। उन्हें अपेक्षा होती है कि सरकार उन्हें दंडित करेगी लेकिन, यह हो नहीं रहा है। इसकी बजाय मंत्री अपराधियों को हार पहना रहे हैं और स्थानीय विधायक खुलेआम उनका समर्थन कर रहे हैं, उनके मुकदमों की फीस चुकाने की पेशकश कर रहे हैं। नहीं, मैं नहीं सोचता कि सड़कों पर हो रहे हर अपराध के लिए आप नरेन्द्र मोदी को दोष दे सकते हैं। लेकिन, वे हमेशा की तरह ऐसी भयानक चीजों की अनदेखी करते रहेंगे, तो यह उन्हें वैसी ही चोट पहुंचाएगा जैसे भ्रष्टाचार ने मनमोहन सिंह को पहुंचाई थी। चाहे सिंह के कट्‌टर शत्रु भी उन्हें भ्रष्ट न कहें। उनकी नाकामी यह थी कि उन्होंने भ्रष्टों पर लगाम नहीं लगाई या उनके लिए सजा सुनिश्चित नहीं की। मोदी वही गलती कर रहे हैं। वे अनदेखी करके या यह जताकर कि वे नहीं जानते कि उनके समर्थक या पार्टी के लोग क्या कर रहे हैं, बुरे लोगों को बुरे काम करके बच निकलने दे रहे हैं।


मजेदार बात यह है कि मोदी को असल में इन लोगों की जरूरत ही नहीं है। उन्हें पार्टी की जितनी जरूरत है उससे ज्यादा भाजपा को उनकी जरूरत है। यही बात उनके मंत्रियों के लिए सही है। कम से कम उनके छवि निर्माताओं और उत्साही ट्रोल ने उनकी अजेय होने की यह छवि बना दी है। इसलिए लोग हैरान हैं कि वे सर्वाधिक घृणित अपराध करने वालों को क्यों बचकर जाने दे रहे हैं, जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि चुनाव के वक्त यह उन्हें दिक्कत देगा। सांप्रदायिकता का ज्वार बनाए रखना ही भारत में चुनाव जीतने का एकमात्र तरीका नहीं है। जब उनके समर्थक युवा छात्रों, दलितों, आदिवासियों, किसानों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और राष्ट्र के छोटे पर प्रभावशाली बुद्धिजीवी वर्ग पर हमले करते हैं तो इससे मोदी को नुकसान ही होगा, फिर चाहे अल्पावधि में उन्हें दहलीज पर खड़े इन बर्बर लोगों का समर्थन मिले।


राहुल गांधी इन अपराधों की जिम्मेदारी सरकार चलाने वालों पर डालकर चतुराई दिखा रहे हैं। यही कोई भी चतुर नेता करेगा। अपराध तो अपराध और उनके दोषी फुर्ती से कानून के कठघरे में लाए जाने चाहिए। जाहिर है कि सरकार यदि उन्हें कठघरे में नहीं लाती तो उसे दोषी माना जाएगा। जैसे मनमोहन सिंह को यूपीए-2 के अंतिम दो वर्षों में हर भ्रष्टाचार के लिए दोषी ठहराया गया था,जबकि हर कोई जानता था कि वे बेदाग हैं। लोग आपको चुपचाप देख रहे हैं, आप जो भी कर रहे हैं उस पर गौर कर रहे हैं। वे आज चुप हैं शायद डर से या इसलिए कि उन्हें अब भी आप पर भरोसा है। लेकिन, आपके कमजोर होते जाने के साथ यह डर दूर हो जाएगा। भरोसे की जगह गुस्सा और हताशा ले लेगी। ऐसे नागरिकों से ज्यादा गुस्सा किसी का नहीं होता, जिसे लगता है कि उनके वोट पाने वालों ने उन्हें नीचा दिखाया है। यह हमने 1977 में देखा। यह हमने 2014 में देखा। मुझे लगता है कि यह हम 2019 में भी देख सकते हैं यदि काम न करने और शेखी बघारने वाली यह सरकार अतिशयोक्तियों से संचालित होना बंद नहीं करती। शेखी बघारने से जीत नहीं मिलती पर उम्मीद जगाने से मिलती है। उम्मीद के साथ हमेशा बदलाव आता है। यह ऐसी बात है जो स्वतंत्रता के 71 वर्षों में हमने सीखी है।

राहुल ने हाल ही में बुद्धिमानी दिखाते हुए स्वीकार किया कि नेताओं के घमंड और भीतरी कलह के कारण कांग्रेस 2014 में हारी। लगता है कि वे उन लोगों का भरोसा फिर जीतना चाहते हैं, जिन्होंने 71 में से 60 उन बातों के लिए वोट दिए, जिनका कांग्रेस प्रतिनिधित्व करती है। यदि कड़ी टक्कर दी जाए और लोगों को यकीन हो जाए कि राहुल अपनी पार्टी के नेताओं का घमंड खत्म कर सकते हैं और उनके भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकते हैं तो 2019 का चुनाव देखने लायक होगा। बाइबल की कथा में मामूली गुलेल ने गोलिएथ जैसे दैत्य का नाश कर दिया था। कौन जानता है कि कौन-सी चीज यह सरकार गिरा सकती है?
(यह लेखक के अपने विचार हैं)