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प्रीतीश नंदी का कॉलम: जीवन सार्थक बनाने वाले लोग ही प्रभावशाली

संदर्भ: क्या देश में वसूले गए टैक्स और एफडीआई के अलावा किसी चीज का कोई महत्व नहीं है?

प्रीतीश नंदी | Last Modified - May 02, 2018, 01:24 AM IST

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    प्रीतीश नंदी, वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म निर्माता

    मैं बीते दिनों एक लोकप्रिय पत्रिका में जारी 2018 की राष्ट्र के प्रभावशाली लोगों की सूची देख रहा था। मजेदार बात यह है कि सूची के 50 लोगों में से 33, खासतौर पर सूची में जो सबसे ऊपर की पायदानों पर हैं, वे बिज़नेस के लोग हैं। नहीं, उन्हें लेकर मेरी कोई शिकायत नहीं है। वे वही करते हैं जो उन्हें करना होता है लेकिन, जिस चीज ने मुझे चौंकाया वह यह था कि सूची के शीर्ष 25 में से 22 उसी श्रेणी के लोग हैं। हाल के दिनों तक इन सूचियों के बारे में यह बात नहीं थी।


    सूची में दस अभिनेता, एक क्रिकेटर, एक आध्यात्मिक गुरु, बैडमिंटन कोच, सुप्रीम कोर्ट के एक वकील, एक बुद्धिजीवी और सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह कि उसमें सिर्फ दो राजनेता हैं : 10वें क्रमांक पर सुब्रह्मण्यम स्वामी और 32वें पर शशि थरूर। 2003 में सबसे पहले यह सूची नज़र आई थी तब से केवल आठ लोगों को स्थायी जगह मिली है- छह बिज़नेसमैन और दो अभिनेता। शेष तो आते-जाते रहते हैं जैसा कि प्रुफॉक (एलियट की एक कविता का सूत्रधार) कहता है- कमरे में माइकलएजेंलो पर चर्चा करती महिलाएं। इसे ही आप पावर का अस्थिर चरित्र कहेंगे। ऊंचे और शक्तिशाली लोग ही बुरी तरह नीचे गिरते हैं।

    सबसे क्रूर तो शायद रतन टाटा का सूची से बाहर होना है (पिछले साल वे नंबर 2 थे)। उसी तरह प्रताप रेड्डी भी हैं पर वे सूची में कभी बहुत ऊपर नहीं रहे। जिनके बाहर होने का सबसे ज्यादा अनुमान था, वे अरुंधति भट्टाचार्य, विशाल सिक्का और विनोद राय रहे। जो यह दर्शाता है कि आप अपने जॉब के अनुसार ही प्रभावशाली हैं। बीसीसीआई का अध्यक्ष होना, उस व्यक्ति की तुलना में आधा भी आकर्षण नहीं रखता, जिसने 2जी घोटाले का भांडाफोड़ किया था। खासतौर पर तब कि जिन्हें पकड़ने का दावा किया गया उन्हें कोर्ट ने निर्दोष पाया। हरीश साल्वे की जगह दुष्यंत दवे ने ले ली, जो रोचक है, क्योंकि दवे आज व्यवस्था के खिलाफ सबसे मजबूत आवाज हैं।

    सूची से बाहर होने वालों में एक और रोचक व्यक्ति हंै और वे है हिंदुत्ववादी विचारक स्वामीनाथन गुरुमूर्ति, जो पिछले साल 30वें नंबर पर थे। क्या इसका मतलब यह है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर सरकार के जुनून से स्वदेशी जागरण मंच ने हार मान ली है? शायद प्रधानमंत्री मोदी के भारत में भी ‘लेसी फे’ (चीजों में दखल न देकर उन्हें उनके रास्ते पर जाने देना) ज़ड़ पकड़ रहा है। इससे साफ हो सकता है कि क्यों सूची में बिज़नेस के इतने सारे लोग हैं। जहां तक युवाओं का सवाल है, जिन्हें लुभाने का सरकार दावा करती है, सूची में 50 में से 40 लोग 50 की उम्र से काफी ऊपर है।


    इससे प्रश्न खड़ा होता है कि भारत में वाकई क्या बदला है? ज्यादा कुछ नहीं , क्योंकि 50 की सूची में सिर्फ चार मुस्लिम है (मुझे लगता है पिछले साल की तरह) और न कोई दलित है, न आदिवासी और न पिछली जातियों या समुदायों के ऐसे लोग हैं, जिन्होंने सफलतापूर्वक प्रभावशाली वर्ग में जगह बनाई हो। पूर्वोत्तर से भी कोई नहीं है। दक्षिण में मुश्किल से 12 लोग हैं और पूर्व से एक अदम्य व्यक्तित्व चंद्रशेखर घोष ने रिटायर्ड अरुंधति भट्टाचार्य की जगह ली है। दोनों बंगाल के बैंकर हैं पर फर्क यही है कि घोष बेदाग प्रतिष्ठा के बैंकिंग आंत्रप्रेन्योर हैं जबकि भट्टाचार्य एक और ऐसी बैंक अधिकारी थीं, जिन्होंने 36 साल काम करके सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक के शीर्ष पर जगह बनाई, जो सर्वाधिक एनपीए वाले बैंकों में से है।


    मैं इस सूची का विश्लेषण क्यों कर रहा हू? सीधी-सी बात है, ऐसी सूचियां आपको हमेशा संकेत देती है कि राष्ट्र किस दिशा में जा रहा है और भारत में सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों की सूची तो यह काम और भी अधिक कारगर ढंग से करती है। मेरे समय में ऐसी किसी सूची में जो लोग होते उनमें सत्यजीत रे और रविशंकर, अमर्त्य सेन व बाबा आमटे, यूअार अनंतमूर्ति व एमएफ हुसैन होते। यह सच है कि उनमें से कुछ लोग गुजर चुके हैं पर उसका यह मतलब तो नहीं कि कला, संस्कृति और सामाजिक योगदान के लिए आज के प्रभावशाली क्षेत्र में कोई जगह नहीं है? क्या लेखकों व संगीतकारों, फिल्म निर्माता व नाट्यलेखक, अर्थशास्त्री व इतिहासकार, पर्यावरणविद तथा दार्शनिकों को अब न्यू इंडिया के निर्माण में अपनी भूमिका त्याग देनी चाहिए? क्या नई परिस्थितियों में वे अप्रासंगिक हो गए हैं, जिनमें केवल एक प्रभावी विचारधारा को राज्य-व्यवस्था की मंजूरी है अौर एकत्रित टैक्स की गिनती और एफडीआई के प्रवाह के अलावा किसी चीज का कोई महत्व नहीं है?


    हां, भारत बदल गया है। यह मैं अपने चारों तरफ देख रहा हूं। चमचमाती नई इमारतें उभर रही हैं। प्रत्येक दूसरी से ऊंची (और भद्दी) है। स्मार्ट शहर बन रहे हैं। जंगल सिकुड़ रहे हैं। पेड़ काटे जा रहे हैं। हाईवे बनाए जा रहे हैं। महिलाओं के खिलाफ जघन्यतम अपराध बढ़ रहे हैं। नौकरियां गायब हो रही हैं। जहां-तहां स्टार्टअप आ रहे हैं। किसान कीटनाशक पी रहे हैं। और राजनेता तीर्थ यात्राओं पर जा रहे हैं। आप और हम अब गरिमामय व्यक्तित्व नहीं रहे, जो हम कभी होते थे। अब हमें बलपूर्वक 12 अंकों की पहचान का डॉग कॉलर पहना दिया गया है। हम जो भी करते हैं यह उस पर निगाह रखता है। और लाखों लोग जिस क्रूर ऑरवेलियन आइडिया का विरोध करते हैं, उसे बनाने वाला पावर लिस्ट में 7वें स्थान पर है। शायद इसलिए कि उन्होंने लगातार दो सरकारों को (दोनों एक-दूसरे से एकदम भिन्न) यकीन दिला दिया कि उनका यह मूर्खतापूर्ण आइडिया सुशासन में सहायक होगा। मेरे लिए तो यह राज्य की निगरानी को बढ़ावा देने वाला साधन है।


    फिर भारत को छोड़कर दुनिया के किसी राष्ट्र में सबसे धनी आदमी को सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाता। यहां तक कि दुनिया का सबसे धनी व्यक्ति भी अपने देश में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति नहीं है। क्योंकि, संपत्ति को इकट्‌ठा कर लेने को कभी प्रभाव का संकेतक नहीं माना जाता। प्रतिभा, रचनात्मकता और परोपकारिता को जरूर माना जाता है।


    जब पावर जीवन को सुंदर और सार्थक बनाने वालों से हटकर उन लोगों की ओर चला जाता है, जो संपत्ति निर्मित करने व उसे बढ़ाने पर गर्व करते हैं तो लगता है कि राष्ट्र अपने लिए नई पहचान खोजने की कोशिश कर रहा है- जो इसके मूल चरित्र, वास्तविक अास्थाओं से बहुत बहुत दूर है। मेरे लिए तो यही सबसे बड़ा नुकसान है।

    (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

    प्रीतीश नंदी
    वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म निर्माता
    pritishnandy@gmail.com​

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