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सिर्फ लोकप्रिय होने की कोशिश है रेल बजट

9 वर्ष पहले
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प्रणजय गुहा ठाकुरता आर्थिक मामलों के जाने माने पत्रकार हैं.

रेल मंत्री रेल बजट के लिए ज़रिए लोकप्रिय होना चाहते हैं और रेल बजट को ऐसे ही देखा जाना चाहिए.

जो कठिन फैसले लेने थे किराया बढा़ने के वो उन्होंने पिछले महीने ही ले लिया था लेकिन वित्तीय घाटा कम करने जो उपाय उन्होंने सुझाए वो संभव होते दिखते नहीं हैं.

यात्री किराया बढ़ाने से रेल को 6600 करोड़ रुपए मिलेंगे लेकिन डीजल और बिजली का खर्चा आने वाले साल में 5100 करोड़ रुपए खर्च हो जाएंगे.

रेलवे का ऑपरेटिंग रेशियो यानी आय और खर्च की स्थिति हमेशा ही खराब रही है. यानी आय होती है 100 रुपए और खर्च 90 रुपए तो दस ही रुपए बचते हैं निवेश के लिए. ये कहीं से भी ठीक स्थिति नहीं है.

रेल मंत्री बहुत आशावादी हैं. वो आशा करते हैं कि खर्च में कमी हो जाएगी. उन्होंने नए रेल क्रांसिंग बनाने की बात की है लेकिन उसके लिए 3500 करोड़ रुपया लगेगा वो कहां से आएगा.

रेल मंत्री का कहना है कि रेल का स्वास्थ्य ठीक होगा लेकिन कैसे होगा ये कहना मुश्किल है. डाइरेक्ट रेलवे फ्राइट की बात होती रही है लेकिन सिर्फ कानपुर से खुर्जा तक को मंजूरी मिली है. सिर्फ एक जगह. इसके बाद अगले कुछ वर्षों में भी सिर्फ आधे और रास्तों का ठेका दिया जाएगा.

विरोध

विपक्ष विरोध कर रहा है. विपक्ष ने नारे लगाए. अब हुआ ये है कि सरकार कह रही है कि कुछ बढ़ाया नहीं है लेकिन बढाया तो सबकुछ है.

लोग बहुत दुखी हैं रेलवे से. रेल में सुविधाएं नहीं हैं. ऐसा नहीं है कि लोगों के पास पैसा नहीं है रेल किराया देने के लिए लेकिन सुविधाएं तो कोई उपलब्ध कराता नहीं है.

राजनीति तो हुआ ही है रेल बजट में. हर रेल मंत्री ऐसा करता है. लालू के समय बिहार के लिए और ममता के समय बंगाल के लिए ज्यादा काम हुआ ये सब जानते हैं. पवन बंसल ने भी यही किया लेकिन कहते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं किया.

सिर्फ लाल बहादुर शास्त्री और मधु दंडवते जब रेल मंत्री थे उन्होंने अपने क्षेत्र और राज्य के लिए कुछ नहीं किया था.

तो बंसल जी ने भी वही किया. अपने कांग्रेस पार्टी के राज्यों के लिए ज्यादा किया.

एक और बात जो ज़रुरी है वो है कि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की जो बात हुई है. विदेशों में निजी क्षेत्र की कंपनी जो काम करती है वो मुनाफे के लिए. अब सरकार निजी क्षेत्र को फुट ओवर ब्रिज बनाने का काम देगी तो फायदा किसको होगा. ये काम तो सरकार को करना होगा.

(पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता के साथ बीबीसी संवाददाता सुशील झा की बातचीत पर आधारित)