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सड़कों पर आने के बहाने मत ढूंढों, संभले नहीं तो लाशों के ढेर लग जाएंगे: आचार्य

Banswara News - मोहन कॉलोनी स्थित भगवान आदिनाथ मंदिर में आचार्य पुलक सागर महाराज ने भास्कर के साथ प्रवचन साझा करते हुए पहले...

Mar 27, 2020, 06:46 AM IST

मोहन कॉलोनी स्थित भगवान आदिनाथ मंदिर में आचार्य पुलक सागर महाराज ने भास्कर के साथ प्रवचन साझा करते हुए पहले कोरोना वायरस के बचाव को लेकर बताया। आचार्य जी ने कहा कि कोरोना वायरस को लेकर भी सभी से सावधानी बरतनी है। आचार्य जी ने कहा कि हमारे महा पुरुषों ने भी जंगल में रहकर कैसे कैसे दिन गुजारे थे, बिना सब्जी के, बिना दूध के फिर हम 21 दिन क्यों नहीं गुजार सकते।

आचार्य जी ने कहा कि जो भी हमारे घरों में हैं, उसका उपयोग करो, सड़कों पर आने के बहाने मत ढूंढो नहीं तो जिंदगी उठने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। ऐसे मत सोचो की हमारे पास वायरस नहीं आएगा। कहीं भी कभी भी आ सकता है। अगर हम लोग संभले नहीं तो फिर यहां लाशों के ढेर लग जाएंगे। इसलिए भारत को बचाओ। साथ ही आचार्य जी ने कहा की किसी ने पूछा की दुख से मुक्ति कैसे मिले। आचार्य जी ने कहा कि दुख से मुक्ति मिलने सहज भी नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं हैं। दुख से मुक्ति संभव है, दुख से मुक्त हुआ जा सकता है। आचार्य जी ने कहा कि पहले ये देखे की सुख की उपलब्धता कैसे हो। यह समझ लेने अत्यंत आवश्यक है। दुख और सुख क्या है। दुख का मतलब है अभाव की जिंदगी जीना। अभाव पर ध्यान रखना,सदभाव को भूल जाना। जो तुम्हारे पास है उसकी फिक्र न करो। जो नहीं है उसकी चिंता करो। जो है उसको नजरअंदाज कर दो। जो नहीं है उसके पीछे भागो। जिसके तुम मालिक हो उसे भूल जाओ। जिसका पडौसी मालिक है उसका ख्याल रखो और उसके पकड़ने का अपनाने का प्रयास करो, अतीत के सपनों में खोए रहो यही दुख का कारण है। सुख का उपाय है सद भावना की जिंदगी जीना। जो है उसका आनंद लो। जितना है उसमें संतोष रखना। जो मिला खा लिया, कल की फिक्र नहीं रखना। जो पास नहीं है उसकी चिंता नहीं करना। वर्तमान में ही जीना। आचार्य जी ने कहा कि इस जीवन में हर इंसान दुखी है। क्योंकि वह अभाव में जीता है। वह अभाव की जिंदगी जीने का आदी हो गया है। जो तुम्हारे पास होता है उसकी तुम परवाह नहीं करते और उसके प्रति लापरवाह बन जाते हो। जो तुम्हारे पास नहीं होता उसके तुम पीछे भागते हो। उसको पाने के लिए तुम दिन रात एक कर देते हो। तुम्हारी रातों की नींद खो जाती है। दिन का अमन चैन खो जाता है। दुख के मुख्य कारण अपनी अधिक इच्छा है। दुख कहीं बाहर से नहीं आता बल्कि हमारी कामना से ही पैदा होता है। वह अपनी कल्पना से और वासना से आता है। दुख का उद्गम स्थल ही हम खुद ही हैं। सुख आकाश से नहीं टपकता और ना ही पाताल से आता है। सुख का आभास सत्ता नहीं सत्य है। भगवान महावीर ने भी कहा कि सुख तो सत्य में है। आचार्य जी ने कहा कि जिस तरह से शक्कर का रस शक्कर में है उसी प्रकार सुख का आनंद आत्मा में ही है। आपके पास नब्बे रुपए हैं और दूसरे के पास दस रुपये है तो तुम दस रुपए पाना चाहता हो जिससे की सौ रुपए पूरे हो सके। लेकिन तुम कितने भी दौड़ लो दस रुपए तुम्हें नहीं मिलने वाले हैं।

धर्म समाज संस्था**

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