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हाड़ो ले डूब्यो गणगौर-घरों में ही पूजेंगे ईसर-पार्वती, नहीं निकलेगी सवारी

Bundi News - गणगौर शुक्रवार को मनाई जाएगी, पर इस बार कहीं गणगौर की सवारी नहीं निकलेगी, महिलाएं घरों में ही गणगौर पूजेंगी। शहर...

Mar 27, 2020, 07:17 AM IST
Bundi News - rajasthan news hado le dubio gangaur isar parvati will worship in the houses the ride will not come out

गणगौर शुक्रवार को मनाई जाएगी, पर इस बार कहीं गणगौर की सवारी नहीं निकलेगी, महिलाएं घरों में ही गणगौर पूजेंगी। शहर में जीनगर समाज की ओर से निकाली जाने वाली गणगौर की सवारी स्थगित कर दी गई है।

महिलाएं-युवतियां घरों में ही ईसर-पार्वती की पूजा करेगी। जिन घरों में 16 दिन से गणगौर पूजन चल रहा है, वहीं पड़ाेसी महिलाएं पूजा की थाली में शुद्ध जल, फूल-पत्ते, मेहंदी, काजल, रोली-मोली, गुड़-चावल, वस्त्र, दूब, गुणे सजाकर पूजा करेंगी। गुणे, आटे, बेसन के व्यंजन से गवरजा का पूजन करेंगी। सुहागिनें 16 गुणे चढ़ाएंगी, जबकि कुंआरी कन्याएं 8 गुणों का भाेग लगाएंगी। ईसर-गणगौर की प्रतिमा सजाने के बाद पाटों पर रखकर घूमर-सालेड़ा लेंगी।

किसी जमाने में हाड़ा परिवार की गणगौर इतनी प्रसिद्ध थी कि जयपुर से पहले बूंदी का नाम आता था, पर बूंदी नरेश महाराव बुद्धसिंह के छोटे भाई की इसी दिन एक हादसे में मौत के बाद पड़ी आंट आज भी लोग मान रहे हैं। महाराव बुद्धसिंह के 1695-1738 के दौर में उनके छोटे भ्राता जोधसिंह जैतसागर में सरदार और रूपसियों के साथ गणगौर का दरीबाना लगाकर सैर कर रहे थे। जोधसिंह के आदेश पर राजकीय हाथी को सुरापान कराकर युद्ध प्रदर्शन के लिए तालाब में उतारा गया, लेकिन मदमस्त हाथी ने तालाब में उतरकर नाव को ही उलट दिया। इस दुर्घटना में जोधसिंह और कुछ जागीरदारों की मृत्यु हो गई। गणगौर की स्वर्गाभूमित प्रतिमा जैतसागर में समा गई। तब से गणगौर की आंट पड़ गई। 8 मार्च 1895 को गणगौर के दिन बूंदी नरेश रघुराजसिंह के घर पुत्र जन्म के बाद गणगौर से आंट हट गई, पर बूंदी के लोगों ने गणगौर पर सार्वजनिक उत्सव नहीं मनाया। राज परिवार ने गणगौर मनाना बंद कर दिया, लेकिन जिन्होंने घटना से पूर्व गणगौर की पूजा कर ली थी, उन परिवारों में इसे मनाया जाता है। गणगौर के दिन हुए हादसे के बाद हंसादेवी मंदिर के पास अगड़ में हाथियों की लड़ाई का रोमांच भी खत्म हो गया। हाथी की वजह से हुए हादसे के बाद बूंदी नरेश ने मनोरंजन के रूप में हाथियों की लड़ाई भी बंद करवा दी थी।

(भीया गांव में इस बार नहीं सुनाई नहीं देगा डू-डू-डू डूई...पढ़ें पेज 12 पर)

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