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फसल कटाई के लिए मजदूर नहीं, हर बादल चिंता बढ़ाता जा रहा, जेब भी खाली

Alwar News - कोरोना के लॉकडाउन और बिगड़ते मौसम ने किसानों को बड़े संकट में डाल दिया है। उनकी तैयार फसल खेतों में खड़ी है, लेकिन...

Mar 27, 2020, 09:26 AM IST
Ramgarh News - rajasthan news not every laborer for harvesting every cloud continues to worry pockets are also empty

कोरोना के लॉकडाउन और बिगड़ते मौसम ने किसानों को बड़े संकट में डाल दिया है। उनकी तैयार फसल खेतों में खड़ी है, लेकिन कटाई के लिए मजदूर नहीं मिल रहे। बीते 48 घंटे में दो बार बारिश और ओलों से नुकसान बढ़ता जा रहा है। क्षेत्र में सरसों की आधी फसल तैयार होकर घर आ गई है, लेकिन गेहूं और पछेती सरसों में किसान की किस्मत दांव पर लगी है। मंडियां खुली होने पर यह सरसों बेचकर किसानों को नकदी मिल जाती। इससे गेहूं व जाै की मजदूरी देकर लावणी करा ली जाती। ये काम भी नहीं हो पाया। मंडियां बंद रहने से इस संकट की घड़ी में जरूरी नकदी ना मजदूरों के पास हैं और ना किसान को मिल पाई है। अादिनांका गांव में किसान परिवार के मुखिया बाबूलाल यादव कहते हैं कि काेराेना की यह लाइलाज बीमारी जमींदार के लिए मुसीबत बन गई है। मजदूर के घर में भी पैसा नहीं पहुंचा है। यादव नगर निवासी माेहरसिंह यादव के अनुसार खेताें में शेष सरसाें थ्रेसरिंग के लिए कट व सूखकर तैयार है, लेकिन सुबह अाैर फिर सांझ ढलते ही बरसात के रूख के कारण थ्रेसरिंग नहीं कर पा रहे हैं। यही हाल गेहूं व जाै की फसल का है। काेराेना के चलते एक ताे लावणी के लिए मजदूर पूरा नहीं मिल रहा। फिर डर यह है कि गेहूं के कटने के बाद अगर बरसात हाेती है ताे नुकसान ज्यादा हाेता है।

अब तो खेत में भगवान के हवाले है मेहनत

किसानों का कहना है कि सामान्य बारिश से खड़ी फसल काे नुकसान की संभावना कम है। रामगढ़ क्षेत्र में ओलो की मार से अब तक बची रही गेहूं व जाै की फसल पर अब ओले गिरे तो कुछ नहीं बचेगा। जिनके परिवारों में लोग हैं या खेती छोटी है वे जैसे-तैसे कटाई कर फसल लाने में जुटे हैं। बाकी के पास पकी हुई फसल खेत में भगवान के भरोसे छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं।

लक्ष्मणगढ़. खेतों में इन महिलाओं ने फसल की कटाई के दौरान भी एक-एक मीटर का फासला रख सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया।

लॉकडाउन का समर्थन, हमारे लिए भी सोचे सरकार

लक्ष्मणगढ़| ईटेड़ा के किसान अरविन्द शर्मा, लक्ष्मणगढ़ के मंगल प्रजापत और पोल्या खां का कहना है कि जान है तो जहान है। हम लाॅकडाउन का समर्थन करते हैं। मगर फसल नुकसान को नहीं बचाएंगे तो खाएंगे क्या। किसान की तो कमाई और पूंजी फसल ही है। बदलते मौसम के कारण फसल को बचाना मुश्किल हो रहा है। सरकार जब दुकानों से होम डिलीवरी करा रही है तो किसानों के लिए खेतों से ही फसल खरीद की व्यवस्था क्यों नहीं कर पा रही।

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