छतों पर छाने लगी रौनक, लगता है सारे मकान अब घर हो गए हैं

Churu News - मिर्ज़ा गालिब ने क्या खूब लिखा- “कोई वीरानी सी वीरानी है, दहशत को देख के घर याद आया।’’ आज कोरोना की दहशत और...

Mar 27, 2020, 10:06 AM IST
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मिर्ज़ा गालिब ने क्या खूब लिखा-

“कोई वीरानी सी वीरानी है,
दहशत को देख के घर याद आया।’’

आज कोरोना की दहशत और ‘लॉकडाउन’ के कारण जिंदगी की रफ्तार रूक गई। कोरोना वायरस की इस वैश्विक विपदा के कारण मानवता पर आए संकट से हम सब मिलकर लड़ रहे हैं। हम सबके लिए यह सब अप्रत्याशित सा है। कभी कल्पना भी नहीं थी कि इस तरह से हमें रहना होगा।

सिक्के के दो पहलू की तरह हर कार्य के नकारात्मक और सकारात्मक दो पहलू होते हैं। इस दौर में जब जीवन बचाने की जद्दोजहद में हम सबको समय ने अपनों के बीच जीवन जीने का बेहतरीन मौका दिया है। पहले घर के दरवाजे बाहर से बंद होते तो जिंदगी सड़क पर टहलती रहती। अब दरवाजे भीतर से बंद है तो जिंदगी घर में चहचहा रही हैं। मैंने अपने घर “ज्योतिर्मय” में जिस जगह अपना स्टडी रूम बनाया था, वहां कभी बैठ कर कुछ लिख पढ़ नहीं सका। मगर पिछले पांच दिनों में मेरा अधिकतर समय वहां बीत रहा है। अभी भी बालकाॅनी के पास वाले उसी कमरे में आज लंच में भरपेट छोले-भटूरे खाकर गली में पसरे सन्नाटे में बदलते मौसम के मिजाज में से हो रही हल्की बूंदा-बांदी की टप-टपा-टप की आवाज मुझे किसी पार्श्व संगीत से भी ज्यादा सुखदायी महसूस हो रही है।

इफ्तिखार का यह शेर मुझे इस समय बहुत सामयिक लग रहा है-

“मिरे खुदा मुझे इतना तो मो’तबर कर दे,

मैं जिस मकान में रहता हूं उसे घर कर दे।’’

अब यूं लगता है कि सारे मकान अब घर हो गए है। देश के इस तालाबंदी के समय मैं रोज शाम अपने घर की छत पर जाने लगा हूं। पांच साल पहले छत पर एक झूला लगाया था। योजना थी कि रोज शाम को इस पर बैठूंगा।
पर कभी वह शाम आई नहीं। आज जब वो शाम आई
तो उसी झूले पर झूलता हुआ पता लगाने की कोशिश में हूं कि मैं जिंदगी के पीछे भागता रहा या जिंदगी मेरे पीछे? अब मेरे साथ मुनमुन, कर्तव्य व धर्मप|ी भी छत पर टहलने आने लगे है। प|ी ज्योति आते ही बोली-” ओह! सांस आ गई.. कितना सुखद माहौल हैं..सारी छते चहक रही है.. । “ यह सुन झूले पर बैठा हुआ अपनी मोबाइल स्क्रीन से आंखे हटा चारों तरफ नजर दौड़ाई तो लोग घरों की छत पर खड़े थे। वीरान और उदास घर की छत उत्सव से सजीव हो गई। यह छत ही है जो हमें मां के आंचल सी महफूज रखती है। मुझे छत पर खड़ा देख पड़ोसियों ने भी हिम्मत कर पूछ ही लिया

“अरे! आपका मन घर पर कैसे लगेगा?”

मैं मुस्कुरा कर कुछ बोलने के लिए उतर सोच रहा था कि उससे पहले प|ी बोल गई -” फंस गए, मजबूरी है.. क्या करें।’’ सब हंस पड़े। छतो पर हंसी की खनखनाहट मुझे इतनी अच्छी लगी कि इस गलत उतर को भी मैने स्वीकोक्ति दे दी।

गली से गुजरी पुलिस की गाड़ी के कर्कश होर्न से हमें वापस कोरोना, कर्फ्यू, लाॅकडाउन याद आ गया। देखा तो आपस में बच्चों के साथ बतियाते साढ़े सात बज गएे थे। छत की सीढ़ियां उतरते हुए कुछ महीने पहले ही ब्रेन ट्यूमर का आपरेशन करवा कर स्वस्थ हुई मेरी धर्मप|ी सहजता में हंसते हुए बोली कि कोरोना इतनी जानलेवा बीमारी है और इसे अभी आना था। पहले पता होता तो मै आपरेशन ही नहीं करवाती। जब कोरोना ही सभी को मारेगा तो मैं भला इतनी दुख क्यों पाती..। बच्चे हंसे और मैं भी हंस दिया। मुनमुन बोली कोरोना तो अब भाग जाएगा। हम सब भगा देंगे।

“अजब वो गुर्बत-ए-दीवार-ओ-बाम-ओ-दर थी कि हम मकान में रहे लेकिन कभी मकीं न बने।’’

डॉ. घनश्याम नाथ कच्छावा साहित्यकार, सुजानगढ़

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