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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: रफाल सौदा 2019 का बोफोर्स नहीं बन सकता

संदर्भ: सात दशक सत्ता में रही कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के लिए वीपी सिंह जैसी भूमिका अपनाना मुश्किल

Danik Bhaskar | Sep 07, 2018, 12:48 AM IST
राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रका राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रका

राहुल गांधी तब सिर्फ 17 साल के थे जब बोफोर्स घोटाले का पहली बार धमाका हुआ था। यह भ्रष्टाचार का ऐसा आरोप था, जो आगे जाकर उनके पिता राजीव गांधी की प्रतिष्ठा पर दाग लगाने के साथ अंतत: 1989 के चुनाव में कांग्रेस की हार का कारण बनने वाला था। अब तीन दशक के बाद लगता है कांग्रेस अध्यक्ष रफाल सौदे को 2019 के अपने चुनाव अभियान के केंद्र में रखकर अपने पिता के राजनीतिक पतन का बदला लेने पर तुले दिखाई देते हैं। किंतु क्या वाकई 2019 फिर से 1989 का दोहराव साबित होने वाला है और क्या रफाल हमारे समय का बोफोर्स होगा? इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि क्या नरेन्द्र मोदी की सरकार उतनी कमजोर दिखाई देती है, जितनी इतने बरसों पहले राजीव की सरकार दिखती थी?


आइए, पहले समानताएं देखें। राजीव गांधी और नरेन्द्र मोदी दोनों ने बहुमत की सरकारों का नेतृत्व किया। इतने संसदीय बहुमत के साथ कि तत्काल उनके शासन को कोई खतरा पैदा नहीं हो सकता था। दोनों बदलाव के वाहक होने का वादा करके सत्ता में आए थे : उनकी सार्वजनिक छवि के केंद्र में था घोर भ्रष्टाचार विरोध। दोनों ने अपने कार्यकाल के आधे सफर में देखा कि किसी तरह का सत्ता विरोध पैदा हो रहा है। भ्रष्टाचार के आरोप कार्यकाल के मध्य बिंदु पर उभर रहे हैं (राजीव के मामले में 1987, मोदी के मामले में 2017)। दोनों नेताओं को रक्षा सौदे के समान विवादों में घसीटा गया, जबकि सशस्त्र बलों की जरूरतों पर कोई सवाल नहीं है। 1980 के दशक के भारत को होवित्जर तोपों की उसी तरह अत्यधिक जरूरत (जैसा बाद में 1999 के करगिल युद्ध में साबित हुआ) थी जैसे आज वायुसेना की घटी हुई स्वॉड्रन क्षमता मजबूत करने के लिए रफाल विमानों की है। दोनों मामलों में सौदों के दूसरे छोर पर एक यूरोपीय सरकार (फ्रांस और स्वीडन) रही है। दोनों मामलों में अनुबंध की शर्तें गोपनीयता के आवरण में रहीं, जिसके कारण उन पर आरोप के लगे कि उनके पास छिपाने के लिए कुछ है।
लेकिन, उल्लेखनीय फर्क भी है। बोफोर्स सौदे में भ्रष्टाचार का आरोप सबसे पहले स्वीडिश रेडियो ने लगाया था कि स्वीडन की हथियार कंपनी ने भारतीयों सहित विभिन्न देशों के राजनेताओं को रिश्वत दी है। उसके बाद विस्तृत खोजपरक रिपोर्टों की शृंखला ने सौदे में रिश्वत के भुगतान और बिचौलियों की मौजूदगियों को स्थापित कर दिया। रफाल केस में अभी तक पैसे देने का ऐसा सिलसिला नहीं स्थापित हुआ है। मुलत: आरोप यह है कि सौदे में सरकार के निकटवर्ती व्यवसायी को अनुचित फायदा दिया गया है। संभव है कि बाद में लेन-देन का कोई सीधा और ठोस सबूत सामने आए।
फिर बोफोर्स मामले में तब के रक्षा मंत्री वीपी सिंह नाटकीय ढंग से इस्तीफा देकर सरकार पर लगातार विपक्षी हमलों के केंद्र बन गए। यहां पर ऐसी विपक्षी एकता का कोई सबूत नहीं है। रफाल अभियान कांग्रेस द्वारा लगभग अकेले चलाया जा रहा है और क्षेत्रीय दल ज्यादातर इससे दूर ही रहे हैं। तब विपक्ष ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार संसद के पूरे सत्र का वहिष्कार किया लेकिन, अब कांग्रेस सदन के भीतर इसी तरह का विरोध खड़ा करने में नाकाम रही है। उस समय वीपी सिंह दक्षिणपंथ से लेकर वामपंथ तक विभिन्न दलों को एक गठबंधन में साथ लाने में कामयाब रहे। कांग्रेस उस वक्त की एकमात्र प्रभावी ताकत थी, जिसके कारण विपक्षी दल एकजुट होने के लिए लगभग मजबूर थे। अब विपक्षी एकता के उतने सबूत नहीं मिलते,जैसा कि हाल के राज्यसभा उपसभापति के चुनाव में साबित हुआ। अब यह मोदी विरोध का एक तत्व है, जो धीरे-धीरे विपक्ष के एक तबके को साथ ला रहा है लेकिन, कांग्रेस वैसी चुंबकीय भूमिका में नहीं है, जो वीपी सिंह के जनता दल ने 1980 के उत्तरार्ध में निभाई थी। न राहुल गांधी को किसी आकार ले रहे गठजोड़ के स्वाभाविक नेता के रूप में स्वीकार किया गया है। यह भी संभव है कि कुछ विपक्षी नेताओं के बिज़नेस हित इस तरह जुड़े हों कि वे लाल झंडा उठाने के इच्छुक न हों।
अब हम दोनों विवादों के कुछ प्रमुख किरदारों पर आते हैं। राजीव गांधी मोदीजी की तरह पेशेवर राजनेता नहीं थे। शायद उनमें गलाकाट स्पर्धा का वह तत्व नहीं था, जो मौजूदा प्रधानमंत्री अपनी राजनीति में लाए हैं। इसके कारण वे खुले पड़ गए खासतौर पर तब जब उनके प्रमुख सहयोगी उन्हें छोड़कर जाने लगे। इसके विपरीत मोदी अपनी राजनीति में रुतबे और भय का तत्व लाए हैं, जिससे उन्हें राजनीतिक संसार में कद्दावर छवि मिली। जबकि राजीव जल्द ही बचाव की ओर धकेल दिए गए और सफाई देने पर मजबूर हुए। मोदी ने बेधड़क सामना करने का निश्चय किया, इस जबर्दस्त आत्मविश्वास के साथ कि भ्रष्टाचार के खिलाफ योद्धा होने की उनकी छवि पर विपक्षी इतनी आसानी से दाग नहीं लगा सकते। इससे हम अंतिम अवलोकन पर पहुंचते हैं। 1989 में वीपी सिंह सफल हुए, क्योंकि उन्होंने बड़ी चतुराई से खुद को ऐसे चुनौती देने वाले के रूप में पेश किया, जो भ्रष्टाचार के मुद्‌दे पर उच्च नैतिक भूमिका ले सके।
राहुल गांधी सत्ता में नहीं हैं लेकिन, कांग्रेस के भूतकाल के भ्रष्टाचार के मामले का बोझ उन्हें भारी पड़ रहा है। भारतीय मध्यवर्ग ने तब वीपी सिंह को गले लगाया, जब उन्होंने नाटकीय रूप से यह कहा कि उनकी जेब में स्विस बैंक में बोफोर्स के भुगतान का खाता नंबर है, क्योंकि तब वे ‘सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी’ भावना के प्रतीक बन चुके थे। इसने जनता को उसी तरह आकर्षित किया जैसे बरसों बाद बुजुर्ग अण्णा हजारे ने किया। यह वह भूमिका है, जिसकी नकल करना कांग्रेस नेतृत्व के लिए कठिन है। क्योंकि जब आप ऐसे दल का प्रतिनिधित्व करते हों, जो पिछले सात दशकों में सत्ता में रही हो तो आप खुद को क्रोधित ‘बाहरी’ व्यक्ति के रूप में पुन: कैसे स्थापित कर सकते हैं? यह सवाल राहुल गांधी की 2019 की चुनौती के केंद्र में है।
पुनश्च: बोफोर्स कांड टेलीविजन आने के पहले के दौर में उजागर हुआ, जिसमें कुछ मुट्‌ठीभर अंग्रेजी अखबार खबरों का एजेंडा तय कर सकते थे। आज के अधिक उन्मादी, अस्त-व्यस्त और दूसरों को पसंद न आने वाली बातें कहने के ‘लोकतांत्रिक’ माहौल में जहां कोई भी खबर कुछ देर ही लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती हो, रफाल जैसे पेचीदा केस हिस्ट्री वाले मुद्‌दे का वैसा ही असर होने की संभावना नहीं है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)