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स्ट्रेस्ड लोन पर रिजर्व बैंक के नए नियम से घट सकते हैं रोजगार, बैंकों को घाटे की आशंका

3 वर्ष पहले
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नई दिल्ली.   बैड लोन एवं स्ट्रेस्ड एसेट को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक के नए नियम से रोजगार में कमी के साथ बैंकों को घाटे की आशंका बढ़ गई है। यही वजह है कि वित्त मंत्रालय अब इन नियमों में ढील का दबाव बना रहा है। पंजाब नेशनल बैंक से जुड़े नीरव मोदी घोटाले के बाद आरबीआई ने लोन रिस्ट्रक्चरिंग के प्रावधान को काफी कठोर बना दिया है। इस साल फरवरी में आरबीआई की तरफ से जारी नए नियम के तहत कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग (सीडीआर), स्ट्रैटेजिक डेट रिस्ट्रक्चरिंग (एसडीआर), स्कीम फॉर सस्टेनेबल रिस्ट्रक्चरिंग ऑफ स्ट्रेस्ड एसेट व ज्वाइंट लेंडर्स फोरम को रद्द कर दिया था जिसका इस्तेमाल बैंक डेड डिफॉल्ट की रिस्ट्रक्चरिंग में कर रहे थे। 

 

 

नया नियम : कंपनियों को क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से लेना होगा प्रमाण पता

- आरबीआई के नए नियम के मुताबिक बड़ी राशि का कर्जलेने वाली स्ट्रेस्ड कंपनियों को कर्ज का रिस्ट्रक्चरिंग कराने के लिए किसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी प्रमाण पत्र लेना होगा। अगर कंपनी का कर्ज पांच अरब या इससे अधिक है तो उस कंपनी को कर्ज की रिस्ट्रक्चरिंग के लिए दो क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से इंडीपेंडेंट क्रेडिट इवैल्यूएशन (आईसीई) करवाना होगा। बाकी को एक आईसीई लेना होगा।

- आरबीआई ने नए निर्देश में यह भी कहा है कि अब कर्ज लेने वाली कंपनियों के कर्ज की रिस्ट्रक्चरिंग तभी होगी जब वह कंपनी किसी अन्य कर्जदाता का डिफॉल्टर नहीं हो।

- इसके अलावा, अगर किसी कंपनी का कई बैंकों से कर्ज चल रहा है तो सभी बैंकों को इस बात की जानकारी दी जाएगी कि अमुक बैंक की तरफ से इस कंपनी के कर्ज की रिस्ट्रक्चरिंग की गई है।

 

स्ट्रेस्ड प्रोजेक्ट की पहचान के नए निर्देश

- आरबीआई ने स्ट्रेस्ड कर्ज की शुरुआत में ही पहचान के लिए भी नए निर्देश दिए हैं। इसके मुताबिक अगर कोई कंपनी मूलधन या ब्याज के किस्त की अदायगी में एक दिन की भी देरी करती है तो वह शक के दायरे में आ जाएगी। - कंपनियों के मुताबिक एक माह के बाद ही ब्याज के किस्त चुकाए जाते हैं। ऐसे में अगर 31वें दिन किस्त नहीं आने पर वह कंपनी शक के दायरे में आ जाएगी। ऐसा होने पर बैंक को इसकी जानकारी सेंट्रल रेपोजेटरी ऑफ इनफॉर्मेशन ऑन लार्ज क्रेडिट (सीआरआईएलसी) को देनी होगी। 01 अप्रैल, 2018 से यह अनिवार्य कर दिया गया है। 

- नए नियम के मुताबिक पांच करोड़ से इससे अधिक के कर्ज के मामले में साप्ताहिक रिपोर्टिंग का प्रावधान रखा गया है। नियम को इस साल 23 फरवरी से लागू कर दिया गया है।

- स्ट्रेस्ड कंपनियों का कहना हैकि आरबीआई ने स्ट्रेस्ड एसेट के समाधान के लिए निर्देश तो जारी कर दिए, लेकिन इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि कोई भी उद्योगपति खुद ही मुश्किलों को न्योता नहीं देता। ऐसी स्थिति काफी हद तक अर्थव्यवस्था की प्रगति और सरकार की नीतियों पर निर्भर करती हैं।

 

3 साल में लोन 9 लाख करोड़ पहुंचा

-  आरबीआई के नए नियम से रोजगार में कमी की आशंका बढ़ गई है। उनका कहना हैकि स्ट्रेस्ड लोन की रिस्ट्रक्चरिंग नहीं होने पर कंपनियां अपने प्रोजेक्ट को पूरा नहीं कर पाएंगी, वहीं बैंक की तरफ से लोन रिस्ट्रक्चर नहीं होने की वजह से बैंक को घाटे का सामना करना पड़ सकता है।

- रिस्ट्रक्चरिंग नहीं कर पाने की वजह से बैड लोन बढ़ेगा जो उनके मुनाफे को प्रभावित करेगा। प्रोजेक्ट पूरा नहीं होने से सबसे अधिक रोजगार पर असर होगा।

- बैड लोन व एनपीए के नए प्रावधान से छोटे उद्यमी भी इसकी चपेट में आ जाएंगे और उन्हें कर्जमिलना आसान नहीं रह जाएगा।

 

तीन सालों में बैंकों के बैड लोन 9 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंचे

आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक,  इस वजह से सरकार भी चाहती है कि आरबीआई स्ट्रेस्ड लोन के रिस्ट्रक्चरिंग प्रावधान में ढील दे। बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों के मुताबिक पिछले तीन सालों में बैंकों के बैड लोन 9 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच गए। आरबीआई के नए नियम से इस साल बैड लोन 10 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच सकता है।

 

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