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क्षेत्रीय भाषा करोड़ों लोगों तक पहुंचने की कुंजी

भारतीय इंटरनेट यूज़र 50-60 फीसदी औसत वक्त हिंदी व 35-43 फीसदी क्षेत्रीय भाषाओं के वीडियो को देता है।

उमंग बेदी | Last Modified - Apr 19, 2018, 01:45 AM IST

क्षेत्रीय भाषा करोड़ों लोगों तक पहुंचने की कुंजी

आप वित्तीय सेवाओं में बिज़नेस चला रहे हों या टेलीकॉम या एफएमसीजी सेक्टर में हों, तो उस भाषा में बोलना अत्यावश्यक है, जो उपभोक्ता समझता है, खासतौर पर भारत में जहां 1,635 (2001 की जनगणना के आंकड़े) बोली जाने वाली मातृ भाषाएं हैं। आज मोबाइल कंटेन्ट के आने के साथ अपनी भाषा में सामग्री पढ़ने-देखने वाले भारतीयों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जो ब्रैंड देश के एक अरब लोगों तक पहुंचना चाहता है, उसके लिए क्षेत्रीय भाषा में कंटेन्ट देना जरूरी हो गया है। आइए, चार प्रमुख ट्रेंड की चर्चा करें, जो उपभोक्ता की पसंद को आकार दे रहे हैं और देश भर में क्षेत्रीय भाषा के विस्फोट को अंजाम दे रहे हैं।

पहले की तुलना में मोबाइल फोन पर कहीं ज्यादा भारतीय कंटेन्ट का आनंद ले रहे हैं

भारतीय बाजार में इस वक्त इंटरनेट की पैठ और स्मार्ट फोन के प्रसार के मामले में असाधारण तेजी दिख रही है। जून 2018 तक मोबाइल फोन पर इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 47.8 करोड़ हो जाएंगे। यह ‘मोबाइल इंटरनेट इन इंडिया 2017’ रिपोर्ट का अनुमान है, जिसे आईएएमएआई (इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया) और केएएनटीएआर-आईएमआरबी ने संयुक्त रूप से प्रकाशित किया है। सस्ते स्मार्टफोन, तेज कनेक्टिविटी और किफायती इंटरनेट सेवाओं के कारण उपयोग बढ़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2017 तक भारत में मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 29.10 करोड़ शहरी और 18.70 करोड़ ग्रामीण यूज़र हैं। 59 फीसदी शहरी क्षेत्र में मोबाइल इंटरनेट पहुंचने के साथ अब वहां इसकी गति धीमी होगी, जबकि सिर्फ 18 फीसदी क्षेत्र में इंटरनेट पहुंचने के कारण अब ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धि होगी। मुझे उम्मीद है कि इसे प्रधानमंत्री के ‘डिजिटल इंडिया कार्यक्रम’ से भी बढ़ावा मिलेगा, जिसमें द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों में वाई-फाई कनेक्टिविटी को सुनिश्चित करने की विस्तृत योजना शामिल है। मैं देख रहा हूं कि ऐसे शहरों के लिए बनने वाला कंटेन्ट क्षेत्रीय भाषाओं में ही होगा।

75 फीसदी भारत स्थानीय भाषाओं में कंटेन्ट पसंद करता है

केपीएमजी और गूगल इन इंडिया द्वारा कराए गए 2017 के अध्ययन के मुताबिक भारतीय भाषाओं वाला इंटरनेट यूज़र बेस 2011 और 2016 के बीच 41 फीसदी की सम्मिलित वार्षिक दर से बढ़ा है। भारतीय भाषाओं के इंटरनेट उपभोक्ता 2011 के 4.20 करोड़ से बढ़कर 2016 के अंत में 23.40 करोड़ तक पहुंच गए। यह संख्या अंग्रेजी इंटरनेट उपभोक्ताओं (17.50 करोड़) से कहीं अधिक है। उम्मीद है कि 2021 तक भारतीय भाषाओं के यूज़र दोगुने से ज्यादा होकर 53.60 करोड़ हो जाएंगे, जबकि अंग्रेजी यूज़र की संख्या सिर्फ 19.90 करोड़ तक पहुंच पाएगी।

आईएएमएआई की रिपोर्ट ‘इंटरनेट इन इंडिक 2017’ कहती है कि भारत का बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेन्ट ले रहा है, जबकि इसमें शहरी भारत का ही हिस्सा 66 फीसदी है। यदि इंटरनेट को उनकी भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए, तो इंटरनेट का इस्तेमाल न करने वाले 20.50 करोड़ लोग डिजिटल हो जाएंगे। भारत के लिए इसके नतीजों की कल्पना कीजिए, जहां इस वक्त 1,635 बोलियां, 30 भाषाएं और 22 आधिकारिक भाषाएं हैं।

आज द्वितीय व तृतीय श्रेणी के शहर व ग्रामीण इलाकों की क्षेत्रीय भाषाओं के इन कटेन्ट उपभोक्ताओं को मोटतौर पर उस घटना से फायदा पहुंचा है, जिसे जियोफिकेशन के लोकप्रिय नाम से जाना जाता है।

इसके अलावा कम लागत वाले स्मार्टफोन के निर्माता ऐसे हैंडसेट ला रहे हैं, जो अधिक पहुंच व उपयोगिता को संभव बना रहे हैं, खासतौर पर भाषाई यूज़र के लिए। उदाहरण के लिए भारतीय बाजार के लोकप्रिय हैंडसेट निर्माताओं द्वारा अनुवाद व लिपि बदलने के साथ टेक्स्ट को भाषा में बदलने वाले इन-बिल्ट फीचर लॉन्च करना, इसी दिशा में एक कदम है।


देशी भाषाओं को सपोर्ट देने वाले मोबाइल एप्लीकेशन्स में वृद्धि

विशाल आबादी, बढ़ते मध्यवर्ग और स्मार्टफोन के गहरे प्रवेश के साथ भारत संभवत: टेक्नोलॉजी पर चलने वाले वैश्विक व्यवसायों के लिए सबसे बड़े बाजारों में से है। टेक्नोलॉजी के कई दिग्गज ऐसे फीचर वाले अपने मोबाइल अप्लीकेशन या प्लेटफॉर्म विकसित कर रहे हैं, जो स्थानीय भाषाओं को सपोर्ट करते हैं। भारतीय उद्यमी भी स्थानीय भाषाओं में इस्तेमाल के लिए एप डिज़ाइन करके स्मार्टफोन यूज़र्स को आकर्षित कर रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि संचार, मनोरंजन व सोशल मीडिया वेबसाइट व एप के अलावा समाचार व ब्लॉग जैसे अन्य डिजिटल कंटेन्ट भी सारी श्रेणियों में भारतीय भाषाओं का सबसे बड़ा वर्ग है।

आखिरकार वीडियो फॉर्मेट वाला कंटेन्ट आ ही गया

क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेन्ट के रुझान में वीडियो कंटेन्ट की बढ़ती लोकप्रियता का कोई कम योगदान नहीं है। आईएएमएआई की रिपोर्ट कहती है कि क्षेत्रीय भाषाओं में इंटरनेट का 70 फीसदी उपयोग संगीत, वीडियो या समाचारों के स्वरूपों तक सीमित है। यूज़र को आकर्षित करने वाला न्यूज कंटेन्ट टेक्स्ट, इमेज, इन्फोग्राफिक्स और वीडियो, जैसे विभिन्न फॉर्मेट में दिया जा रहा है। आईएएमएआई की रिपोर्ट यह भी कहती है कि ग्रामीण क्षेत्रों के 58 फीसदी इंटरनेट यूज़र वीडियो देखने इंटरनेट पर जाते हैं।


इनकार नहीं किया जा सकता है कि फॉर्मेट के रूप में वीडियो स्पष्ट विजेता है और इस क्षेत्र में उथल-पुथल मचाने वाला असली खिलाड़ी है, खासतौर पर द्वितीय व तृतीय श्रेणी शहरों में पहुंच के मामले में। केपीएमजी रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्रीय भाषा के वीडियो के दर्शक कई गुना बढ़ने की दहलीज पर हैं। आज उपभोक्ता अपने औसत वक्त का 50 से 60 फीसदी हिंदी वीडियो और 35 से 43 फीसदी अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के वीडियो देखने पर खर्च करते हैं, जबकि अंग्रेजी वीडियो को वे 5 से 7 फीसदी समय ही देते हैं।


ऐसा घटनाक्रम ग्लोबल ट्रेंड दिखातो हैं- वह यह कि उपभोक्ता उत्तरोत्तर स्थानीय भाषाओं में कंटेन्ट चाहता है। वैसे भी इंटरनेट पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दूसरी भाषा चीनी है! जैसा कि नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था, ‘यदि आप किसी व्यक्ति से उसे समझ में आने वाली भाषा में बात करते हैं, तो वह उसके दिमाग तक पहुंचती है। लेकिन यदि आप उससे उसी की भाषा में बात करें तो यह उसके दिल तक पहुंचती है।’ अब यही फलसफा भावी इंटरनेट को संचालित करने वाला है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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