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दरें बढ़ाने से रिजर्व बैंक की बेचैनी एक बार फिर उजागर: भास्कर संपादकीय

सार्वजनिक क्षेत्र के तमाम बैंकों ने अपनी ब्याज दरों में वृद्धि कुछ दिन पहले ही शुरू कर दी थी।

Bhaskar News | Last Modified - Jun 08, 2018, 01:31 AM IST

दरें बढ़ाने से रिजर्व बैंक की बेचैनी एक बार फिर उजागर: भास्कर संपादकीय

राजनीतिक रूप से दहाड़ने वाली मोदी सरकार आर्थिक रूप से चिंतित है, यह बात भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने से जाहिर हो गई। राजग के चार साल के शासनकाल में पहली बार रेपो रेट में इतनी तीव्र वृद्धि की गई है। अप्रैल के महीने में जो दरें 6.0 प्रतिशत पर थीं, उसे जून के पहले हफ्ते में 6.25 कर दिया गया है। स्पष्ट है कि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय और विश्व बैंक की तरफ से आर्थिक वृद्धि की असरदार भविष्यवाणी के बावजूद सरकार और केंद्रीय बैंक को तेल की बढ़ती कीमतों का खतरा सता रहा है।

केंद्रीय बैंक के इसी व्यवहार को बाजार और उसके पर्यवेक्षकों ने अच्छा नहीं माना है। बाजार के प्रतिनिधियों का कहना है कि केंद्रीय बैंक का व्यवहार प्रत्याशित होना चाहिए न कि अप्रत्याशित। अगर बैंक ने अप्रैल माह में यह अनुमान लगाया था कि वित्त वर्ष के उत्तरार्ध में मुद्रास्फीति बहुत तेजी से नहीं बढ़ेगी तो फिर उसका अनुमान इतने जल्दी बदल कैसे गया। निश्चित तौर पर उसे तेल के मूल्यों में वृद्धि की रफ्तार का सही अनुमान नहीं था।

आंकड़ों से कहीं ज्यादा उस विश्लेषण पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है जो रिजर्व बैंक की छह सदस्यीय मुद्रा नीति समिति (एमपीसी) ने प्रस्तुत किया है। मुद्रा नीति का उद्देश्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को बढ़ने से रोकना होता है और उसके लिए वह तरह-तरह से उपायों का सहारा लेती है। बैंक को अनुमान है कि सीपीआई 3.1 प्रतिशत से 5.7 प्रतिशत तक जा सकता है, क्योंकि महंगाई की सालाना वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत तक पहुंचने लगी है। हालांकि, सार्वजनिक क्षेत्र के तमाम बैंकों ने अपनी ब्याज दरों में वृद्धि कुछ दिन पहले ही शुरू कर दी थी, लेकिन इस फैसले के बाद उसमें और उछाल आएगा। इसके प्रभाव में पहले से ही संकट का सामना कर रहे रियल सेक्टर में सुस्ती आएगी।

इससे बचने की उम्मीद कर्ज सीमा के स्तर को 28 लाख से बढ़ाकर 35 लाख किए जाने से है, क्योंकि इससे काफी ग्राहकों को कर्ज पर कम ब्याज देना होगा। इसी के साथ कर्ज देने की प्राथमिकता वाली नीति भी इसे एक हद तक रोक सकती है। अब 40 प्रतिशत कर्ज छोटे उद्यमियों, कृषि और कमजोर वर्गों को दिए जाने का लक्ष्य है। दूसरी तरफ, रेपो दरों के बढ़ने से बचत पर भी ब्याज बढ़ेगा और ग्राहकों को लाभ होगा इसलिए स्थिति उतनी चिंताजनक भी नहीं है।

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