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हाउसिंग बोर्ड और आरडीए कॉलोनियों के 10 हजार पुराने मकानों की रजिस्ट्री पर लगी रोक

3 वर्ष पहले
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रायपुर.   छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड और रायपुर विकास प्राधिकरण आरडीए की पुरानी कॉलोनियों के करीब दस हजार मकानों के रीसेल होने के बाद उनकी रजिस्ट्री पर रोक लगा दी गई है। 1974 के आसपास बनी इन कॉलोनियों की जमीन सरकारी रिकार्ड में अभी भी कृषि भूमि है। इन कॉलोनियों का टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग से ले आउट भी पास नहीं कराया गया।

 

इस तकनीकी पेंच का खुलासा तब हुआ जब यहां के मकानों के रीसेल के बाद खरीदी-बिक्री करने वाले दोबारा रजिस्ट्री कराने पहुंचे। उनसे डायवर्सन और ले आउट के दस्तावेज मांगे गए। किसी के पास डायवर्सन और ले आउट के दस्तावेज ही नहीं हैं। रजिस्ट्री दफ्तर में दस हजार से ज्यादा आवेदन अटके हैं, लेकिन दस्तावेजों की कमी के कारण अफसरों ने रजिस्ट्री पर रोक लगा दी है।


दोनों विभागों के पास दस्तावेज नहीं

रजिस्ट्री अटकने के कारण बरसों पहले सरकारी एजेंसी से प्रापर्टी खरीदने वाले अब जरूरत के समय अपनी संपत्ति बेच नहीं पा रहे हैं। हालांकि जब रजिस्ट्री के लिए लोगों की संख्या बढ़ने लगी तब जिला पंजीयक ने हाउसिंग बोर्ड और आरडीए के सीईओ को चिट्ठी लिखकर डायवर्सन और ले आउट के दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा। दोनों विभागों के पास दस्तावेज नहीं है, इस वजह से अफसरों ने पूरे मामले को दबाकर चुप्पी साध ली। दूसरी ओर लोग परेशान होकर इस दफ्तर से उस दफ्तर भटक रहे हैं। शहर में शंकरनगर, डीडी नगर, अवंति विहार, टाटीबंध, कबीरनगर समेत दर्जनभर से ज्यादा कॉलोनियां ऐसी हैं जो तीन दशक से ज्यादा पुरानी हैं। उस समय मकान बनाने या रजिस्ट्री के नियम इतने सख्त नहीं थे। लोगों की रजिस्ट्रियां आसानी से हो जाती थीं। सरकारी कॉलोनियां होने की वजह से दूसरे विभाग वाले भी कोई आपत्ति नहीं लगाते थे। आरडीए और हाउसिंग बोर्ड ने इसी लचीले नियमों के कारण कॉलोनियां कृषि जमीन पर बना दी, जबकि इनका नियमानुसार डायवर्सन करवाया जाना था।

 

मकानों की बिक्री में गलती अफसरों की, लोगों को परेशान न किया जाए  

 

1. शंकरनगर के इंजीनियर महेश देवांगन ने बताया कि लोग सरकारी एजेंसियों से आंख बंद कर मकान या जमीन खरीदते हैं। उसमें किसी भी तरह के फर्जीवाड़ा की संभावना नहीं होती है। ऐसे में जरूरत के समय में अगर अपनी ही संपत्ति की बिक्री नहीं कर पाए तो फिर पुराना निवेश करने का फायदा ही क्या? 
2. टाटीबंध के  कारोबारी हरजीत सिंग पनैच का कहना है जमीन या मकान लेने से पहले अफसरों ने लोगों को पूरा भरोसा दिलाया होगा। ऐसे में अफसरों की गलती का खामियाजा आम लोग कैसे भुगत सकते हैं। 
3. अवंति विहार निवासी राजीव पाठक का कहना है किसी भी जमीन के नामांतरण, डायवर्सन या उसके ले-आउट का एप्रूवल लेने में महीनों लग जाते हैं। ऐसे में जिसे अभी तत्काल मकान बेचना है तो उसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे उसकी परेशानी कम हो सके।  

 

 

एक्सपर्ट की राय  
सिविल मामलों के अधिवक्ता किशोर सिन्हा के मुताबिक जिस जमीन पर तीन साल तक लगातार खेती न हो तो उसे कृषि जमीन नहीं माना जाता है। इस आधार पर डायवर्सन किया जा सकता है। नियमों से जो लोग प्रभावित हैं उन्हें राजस्व सचिव और कलेक्टर को इस बात की जानकारी देकर आवश्यक सुझाव लेना चाहिए। अफसर इस मामले में सरकारी एजेंसियों को निर्देश दे सकते हैं। इसके बावजूद मामला नहीं सुलझता है तो प्रभावित लोग कोर्ट में याचिका भी दायर कर सकते हैं।

 

इस नियम से बढ़ीं मुश्किलें  
सरकार ने 2200 वर्गफीट से कम कृषि जमीन की रजिस्ट्री, नामांतरण और डायवर्सन पर रोक लगा रखी है। यही नियम लोगों पर बेहद भारी पड़ रहा है।  हाउसिंग बोर्ड और आरडीए की पुरानी कॉलोनियों में मकान 500, 1000 और 1500 वर्गफीट तक ही जमीन पर बने हैं। यानी 2200 वर्गफीट से कम। सरकारी रिकार्ड में यह जमीन अभी भी कृषि की है। इस वजह से जब खसरा नंबर का मिलान किया जा रहा है तो जमीन कृषि ही निकलती है। इसी वजह से ऐसे मकानों की दोबारा रजिस्ट्री पर रोक लगा दी गई है। इसी तरह रजिस्ट्री कराने से पहले कंप्यूटर सिस्टम कॉलोनियों के मकानों पर ले-आउट एप्रूवल है या नहीं इसकी जानकारी मांगता है।
 रजिस्ट्री दस्तावेजों के साथ ले-आउट एप्रूवल का प्लान नहीं मिलता है। इससे सिस्टम आगे की प्रक्रिया के लिए नहीं बढ़ पाता। इस वजह से भी रजिस्ट्री में पेंच आया है।  

 

 

जिला पंजीयक बीएस नायक ने बतााय कि हाउसिंग बोर्ड और आरडीए की दशकों पुरानी कॉलोनियों के मकानों के रीसेल की ही रजिस्ट्री पर रोक लगाई है। पुराने मकानों की रजिस्ट्री के साथ डायवर्सन और ले आउट एप्रूवल की कॉपी नहीं लगाई जा रही है। इस वजह से रजिस्ट्री नहीं हो रही है। 

छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड के सीईओ सीएस बाजवा ने बताया कि हाउसिंग बोर्ड के सभी कार्यपालन अभियंताओं से कहा गया है कि वे पुरानी कॉलोनियों के रिकार्ड अपडेट करें। जहां कृषि जमीन है उसका डायवर्सन कराए और जहां ले आउट एप्रूवड नहीं था उसे भी मंजूर कराएं। 



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