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डाउनलोड करेंज़ुबैर अहमद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बुधवार को पहली बार भारत आ रहे हैं.
इसके काफ़ी बाद यानी 26 जनवरी को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस पर भारत के मेहमान के तौर पर दिल्ली आएँगे.
लेकिन भारतीय मीडिया में अमरीकी राष्ट्रपति के भारत के दौरे की चर्चा कहीं अधिक है.
इसका एक मतलब तो साफ़ है कि अब भारत का झुकाव अमरीका की तरफ़ अधिक है और अगर दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार पर निगाह डालें तो ये रूस से कई गुना ज़्यादा भी है.
पुतिन मोदी के साथ सालाना शिखर सम्मलेन में भाग लेने आ रहे हैं. इससे पहले वो 2012 में दिल्ली आए थे. तो क्या इस दौरे से दोनों देशों के बीच रिश्ते में एक नई गर्मजोशी आएगी?
पढ़ें विस्तार सेएक समय था जब भारत का झुकाव पहले सोवियत यूनियन और बाद में इसके टूटने पर रूस की तरफ़ था.
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद रूसी टेक्नोलॉजी की मदद से रखी गई थी. चाहे बिजली घरों का निर्माण हो या फिर इस्पात के कारखाने, सभी रूस के सहयोग से बनाए गए थे.
लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) पर आधारित भारत की नई अर्थव्यवस्था के ढाँचे में अमरीका की छाप साफ़ नज़र आती है. आधुनिक भारत अमरीका से अधिक जुड़ा है. इसकी विदेश नीति और फलते-फूलते आपसी व्यापार में भी इसकी झलक साफ़ दिखाई देती है.
लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि भारत-रूस रिश्ता खटाई में पड़ गया है.
समझौतों पर हस्ताक्षरइस हफ़्ते रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन दो दिन के सरकारी दौरे पर भारत आ रहे हैं.
वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ 15वें वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने आ रहे हैं.
दोनों देशों के अधिकारियों ने पिछले हफ़्ते ये घोषणा की थी कि नरेंद्र मोदी और व्लादीमिर पुतिन 15 समझौतों पर हस्ताक्षर करेंगे.
लेकिन इससे भी बढ़ कर दोनों नेताओं की कोशिश होगी इस रिश्ते में एक नई जान फूंकने की. इसके लिए मोदी अब तक दो बार पुतिन से मिल चुके हैं.
पहली बार ब्राज़ील में ब्रिक्स देशों के सम्मलेन में जब पुतिन ने मोदी को एक घंटे इंतज़ार कराया था और दूसरी बार ब्रिस्बेन में ऑस्ट्रेलिया में जी-20 देशों के सम्मलेन में.
भारतीय प्रधानमंत्री ने जिस तरह से अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से दोस्ती निजी अंदाज़ की बनाई है, उन्हें इस शिखर सम्मलेन में पुउस तरह से तिन से बनाने का अवसर मिलेगा.
कमजोर रूबललेकिन शायद पुतिन को मोदी से दोस्ती बढ़ाने की ज़रूरत अधिक है. यूक्रेन के मामले में पश्चिमी देशों के रूस के ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबन्ध से रूसी अर्थव्यवस्था बुरे हाल में है.
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में ज़बरदस्त गिरावट से भी रूस की आर्थिक स्थिति डांवाडोल है, क्योंकि वो कच्चे तेल का निर्यात करने वाला एक बड़ा देश है.
रूसी मुद्रा रूबल इस समय काफ़ी कमज़ोर है. ऐसे में रूस की कोशिश होगी कि वो भारत को सैन्य और अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी और व्यापार में अधिक सहयोग की पेशकश करे.
नरेंद्र मोदी अब तक कूटनीति के क्षेत्र में कामयाब रहे हैं. वो अंतरराष्ट्रीय नेताओं से दोस्ती करने में आगे रहे हैं. अपनी भावनाओं को कम ही ज़ाहिर करने वाले पुतिन कम बोलने वाले नेताओं में से एक हैं.
\'पर्सनल टच\'ब्रिक्स नेताओं के साथ नरेंद्र मोदी.
मोदी बोलने के लिए जाने जाते हैं और अब तक अंतरराष्ट्रीय मंच पर या नेताओं से मुलाक़ात के दौरान वो गर्मजोशी भी दिखा चुके हैं.
भारत-रूस रिश्तों पर नज़र रखने वालों के अनुसार पुतिन के साथ भी वो गर्मजोशी दिखाएंगे.
मोदी को ये भी अंदाज़ा होगा कि अक़्सर पश्चिमी मीडिया की एक तरफ़ा रिपोर्टों के बावजूद पुतिन भारत में एक लोकप्रिय नेता हैं.
तो मोदी भी उनसे एक ऐसा रिश्ता बनाने की कोशिश करेंगे जिसमें \'पर्सनल टच\' होगा.
इस दौर में ये संभव है कि पुतिन रूस में 2015 का वर्ष भारतीय वर्ष घोषित करें. मोदी को पुतिन का ये बेहतरीन तोहफा हो सकता है.
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