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केजरीवाल जीते तो हारा कौन: शिव सेना

6 वर्ष पहले
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अश्विन अघोर

मुंबई से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने केवल दिल्ली में ही भाजपा की परेशानियां नहीं बढ़ाई हैं बल्कि भाजपा के नेतृत्व को महाराष्ट्र में शिव सेना के हमले भी झेलने पड़ रहे हैं.

अपने मुखपत्र \'सामना\' के संपादकीय में शिव सेना ने कहा है कि दिल्ली में जो हुआ उसकी शुरुआत तीन महीने पहले महाराष्ट्र में हो चुकी थी.

जबसे महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव हुए, भाजपा ने आखरी मौके तक शिव सेना को सत्ता से दूर रखा और जब सत्ता में शामिल किया तब भी सेना के हाथ कुछ खास नहीं लगा.

इसके बाद से ही शिव सेना नेतृत्व अलग अलग मौकों पर अपनी नाराजगी जाहिर करता रहा है. लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजा शिव सेना के लिए भाजपा के साथ अपना हिसाब-किताब बराबर करने का एक सुनहरा अवसर बन कर आया है.

नरेंद्र मोदी की आलोचना

शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने नतीजों के बाद आनन-फानन में पत्रकार सम्मेलन बुलाकर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर आलोचना की.

उन्होंने कहा,\'\'दिल्ली विधानसभा चुनाव के नातीजों से भाजपा को सीख लेनी चाहिए कि लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है. उसे नजरंदाज करने की भूल कोई न करे. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हार है. दिल्ली की जनता ने यह साबित कर दिया है कि सुनामी किसी भी लहर से बड़ी होती है.\'\'

गौरतलब है कि उद्धव ठाकरे ने न सिर्फ पत्रकार सम्मेलन में बल्कि पार्टी के मुखपत्र सामना के संपादकीय में भी भाजपा की जमकर आलोचना की है.

भाजपा की मांग

उधर भाजपा विधायक आशीष शेलर ने तो यहाँ तक कह डाला कि अगर शिव सेना के नेताओं में हिम्मत है तो सरकार से इस्तीफ़ा दे दें.

सामना के संपादकीय में कहा गया - \'\'केजरीवाल जीते, तो हारा कौन? भाजपा नेता कहते हैं, यह नरेंद्र मोदी की हार नहीं है. अगर ऐसा है तो फिर यह किसकी हार है? दिल्ली के नतीजे बहुत कुछ सिखाते हैं.\"

सामना ने कहा है कि लोकसभा चुनाव के वादे पूरे न करना बना दिल्ली में हार की वजह

संपादकीय में कहा गया है कि दिल्ली के नतीजे इस बात का भी प्रमाण हैं कि भाजपा कार्यकर्ताओं में ज़बरदस्त नाराज़गी है.

आगे कहा गया है - \"भाजपा नेतृत्व को चाहिए कि वह इन नातीजों से यह सीख ले कि हर बार बाहर का उम्मीदवार कार्यकर्ता और जनता पर लाद नहीं सकते. जनता से हमेशा समर्थन की उम्मीद नहीं रख सकते. दिल्ली किसी की जागीर नहीं और कोई इस पर हक़ न जताए.\"

मुखपत्र के मुताबिक दिल्ली चुनावों में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह का प्रबंधन कौशल दांव पर लगा था. केजरीवाल जैसे फटेहाल आदमी ने दोनों को धूल चटा दी.

सामना के मुताबिक़, प्रचार के दौरान केजरीवाल और राहुल गांधी की नकारात्मक आलोचना और लोकसभा चुनाव के दौरान किए गए वादे पूरे न करना भाजपा की हार की अहम वजह हैं.

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