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शाहिद कपूर के बारे में बोली सौतेली बहन, 'मैं उनसे कोई सलाह नहीं लेती'

3 वर्ष पहले
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पंकज कपूर और सुप्रिया पाठक की बेटी सनाह कपूर ने बताया कि क्यों वे अपनी जिंदगी के अहम फैसलों में परिवार के किसी सदस्य से सलाह नहीं लेती। उनसे हुई बताचीत...

 

कभी आपको किसी जरूरी सलाह की जरूरत पड़ेगी तो किसके पास जाएंगी?

जब कभी मैं अपनी एक्टिंग से जुड़ी किसी परेशानी में होती हूं तो मैं पापा से बात करती हूं।

 

भाई शाहिद कपूर से एक्टिंग के टिप्स लेती हैं?

 नहीं, मैं शाहिद से सलाह नहीं लेती। मैं अपनी स्क्रिप्ट पर भी शाहिद से चर्चा नहीं करती। हमारे घर पर सिर्फ घर की बात होती है। जब भी हम मिलते है, तब नॉर्मल भाई-बहन की तरह मिलते हैं। हां,हम इंटरनेशनल सिनेमा के बारे में जरूर बात करते हैं। मैं अपने प्रोफेशनल डिसीजन खुद लेती हूं। मेरे पेरेंट्स ने मेरी अपब्रिंगिंग एेसे ही की है। मैं अपनी जिंदगी के बारे में खुद सोच सकती हूं और खुद फैसले लेती हूं। शाहिद और मेरे बीच एज डिफ़रेंस काफी है लेकिन तब भी हम दोस्त की तरह हैं,मैं उनसे ऐसी बातें भी शेयर कर लेती हूं जो अपने मम्मी-पापा से नहीं कह सकती हूं।आपको बता दें दोनों में करीब 11 साल का एज डिफ़रेंस है। शाहिद 37 साल के हैं जबकि सनाह अभी 26 साल की हैं।

 

‘शानदार' और ‘खजूर पे अटके' में लगभग तीन साल का गैप है, तो इतने लंबे समय तक परदे पर न आने की क्या वजह रही?

मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर रही थी इसलिए मैंने यह ब्रेक लिया था। पढ़ाई कंप्लीट करने के बाद मैंने अपने एक्टिंग स्किल बेहतर करने के लिए थिएटर ज्वाइन कर लिया। 

 

‘शानदार' के बाद कोई ऑफर आया था?

बॉलीवुड इंडस्ट्री अजीब तरीके से काम करती है। इसका अपना ही तरीका है और ये अपने हिसाब से चलती है। ‘शानदार' के बाद कुछ आॅफर आए थे, लेकिन कोई ऐसा नहीं था जो मजेदार हो। ज्यादातर ऑफर्स "शानदार' के किरदार जैसे ही थे इसलिए मैंने रिजेक्ट कर दिए। एक-दो ही प्रोजेक्ट थे जो मुझे पसंद आए लेकिन उसमें प्रोड्यूसर और डायरेक्ट के बीच में ही लड़ाई हो गई। पूरी इंडस्ट्री में उस दौरान ड्रामा चला और अंत में मैं वो प्रोजेक्ट नहीं कर पाई।

 

क्या इंडस्ट्री में'टाइपकास्टिंग' ज्यादा चलन में है?

ऐसा होता है, 'टाइपकास्टिंग' का चलन हमारी इंडस्ट्री में है। अगर कोई एक्टर किसी रोल में ज्यादा अच्छा नजर आ जाता तो सभी उसे बार-बार उसी तरह के रोल ऑफर करते हैं। मुझे लगता है कि हमें यह चलन तोड़ना चाहिए और मैंने इसे तोड़ने की शुरुआत फिल्म ‘खजूर पे अटके' से की है। 

 

 

 

 

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