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डाउनलोड करेंएक समय था जब संजय मिश्रा को सिर्फ हास्य कलाकार के रूप में पहचाना जाता था पर ‘आंखों देखी’, ‘मसान’ और ‘कड़वी हवा’ जैसी उनकी पिछली फिल्मों ने उन्हें कैरेक्टर एक्टर के तौर पर नया जन्म दिया है। अपनी इस नई उपलब्धि पर वे बेहद खुश हैं और कहते हैं...
‘अंग्रेजी में कहते हैं’ के बारे में बताइए?
इस फिल्म के बारे में सबसे पहली बात तो मुझे यह अच्छी लगी थी कि इसकी कहानी बहुत बढ़िया है। मेरे लिए बतौर एक्टर इसमें सबसे नई बात यह है कि पहली बार मैंने रोमांटिक रोल किया है। इसकी कहानी एक स्तर पर पहुंचने के बाद एक मैच्योर लव-स्टोरी में कन्वर्ट हो जाती है।
क्या अब आपको लगता है कि राइटर आपको ध्यान में रखकर आपके लिए रोल लिखते हैं?
हां, बिल्कुल। एक एक्टर के लिए सबसे बड़ी बात यही होती है कि वह उस पोजीशन पर पहुंच जाए जहां उसके लिए रोल लिखे जाने लगें।
अगली फिल्म ‘कामयाब’ के बारे में बताएंगे?
यह फिल्म कैरेक्टर एक्टर की लाइफ पर बेस्ड है, जिसे आप अंग्रेजी में कंटेंट ओरिएंटेड फिल्म कहते हैं। सिनेमा में जो कैरेक्टर एक्टर होते हैं, इस फिल्म में उनकी कहानी है। इस फिल्म को ‘दृश्यम फिल्म्स’ प्रोड्यूस कर रहा है और रजत कपूर निर्देशित एवं मेरी मुख्य भूमिका वाली ‘आंखों देखी’ के निर्देशक हार्दिक मेहता इसे निर्देशित कर रहे हैं।
जिस तरह आज आपका चेहरा बैनर-पोस्टर पर छपता है क्या आपको लगता है कि आप अलग तरह की सिनेमा के पोस्टर-बॉय बन गए हैं...?
हां, शायद...! मैं मानता हूं कि ‘आंखों देखी’ ने बतौर अभिनेता मुझे एक स्तर दे दिया है। पहले हिंदी अखबार के लोग मुझे सिर्फ हास्य कलाकार के रूप में जानते थे। वे मुझे एक सीमित दायरे में ही देखा करते थे। पर "आंखों देखी’ के बाद एक अभिनेता के तौर मैंने जो हासिल किया उसके उपलक्ष्या में मुझे ‘कड़वी हवा’, ‘मसान’ और ‘अंग्रेजी में कहते हैं’ जैसी फिल्में मिलीं, जो मेरे ही किरदार पर आधारित थीं। जाहिर-सी बात है कि जब आपके मुख्य किरदार वाली फिल्म का पोस्टर बनेगा तो आपका ही चेहरा उस पर चस्पां होगा। यह कंटेंट बेस्ड फिल्मों की जीत है, मेरी नहीं।
संजय मिश्रा को यह जो सफलता मिल रही है क्या वे इससे इतराने लगे हैं? या लोगों ने आप पर तानाकशी करना शुरू कर दिया है?
नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। आज से 15 साल पहले मैं जो काम किया करता था, आज भी वही कर रहा हूं। भले ही आज फिल्म का विषय और चरित्र मेरी मुख्य भूमिका पर आधारित होता है पर इसमें इतराने की क्या बात है? अगर मुझे एक रात में सफलता मिली होती तो मैं पागल हो सकता था। अब आगे क्या होगा..., यह सोचने में मुझे कई रातें लगीं।
तो क्या आप अपने फिल्मी कॅरिअर को दो पारी में बांटकर देखते हैं?
नहीं, पारी तो मैं एक ही मानता हूं, क्योंकि साल भर में कम से कम एक बार तो बीच में भटक ही जाता हूं। आदमी को बीच-बीच में भटकते रहना चाहिए।
इस भटकाव की कोई खास वजह?
नहीं-नहीं, ऐसी काेई खास वजह नहीं है। बस जब काम करते-करते और एक रोजमर्रा में काफी दिन फंसने के बाद मन ऊब सा जाता है तो मैं एक भटकाव के लिए तैयार हो जाता हूं। कई लोग परिवार के साथ छुटि्टयां मनाते हैं पर मैं अकेले ही गायब हो जाता हूं।
तो बच्चों और परिवार के साथ कहां जाते हैं?
बच्चों को तो वही जगहें अच्छी लगती हैं, जहां झूले और स्लाइडिंग होती हैं। उन्हें ऐसी जगहोंं पर लेकर जाता हूं। आजकल तो वे डिडिहाट (उत्तराखंड) अपने ननिहाल गए हुए हैं।
आप अपकमिंग प्रोजेक्ट के बारे में बताएं?
इन दिनों में ‘कामयाब’ की डबिंग कर रहा हूं और ‘धमाल 2’ की शूटिंग जल्द ही मुंबई में शुरू करने वाला हूं। इस फिल्म में कई सारे कलाकार होंगे।
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