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बीबीसी संवाददाता
संथाल भारत के सबसे पुराने और सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक हैं. उनके बारे में चार्ल्स डिकेंस ने एक पत्रिका में लिखा है, “उनके बीच भी अब सम्मान भावना दिखती है, वो शिकार के लिए ज़हरीले तीरों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ उन्हें कभी नहीं इस्तेमाल करते हैं.”
वो लिखते हैं कि “अगर ये बात सही है तो वो हमारे सभ्य दुश्मन रूसियों से कहीं ज़्यादा सम्मान के हक़दार हैं जो इस तरह के हथियार दुश्मनों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल न करने को मूर्खता मानेंगे और कहेंगे कि ये लड़ाई नहीं है.”
संथालों ने विद्रोह भी किया और 1855 में ब्रितानी राज के ख़िलाफ़ इस विद्रोह का नेतृत्व चार भाइयों ने किया था जिसके कारण उस इलाके में मार्शल लॉ लगाना पड़ा था.
संथाल लोग अब भी भारत के सबसे बड़ा और सबसे पुराना आदिवासी समुदाया माने जाते हैं. उनकी आबादी 15 करोड़ के आसपास है जो पांच राज्यों और मुख्यतः पूर्वी भारत में रहते हैं.
इसलिए जब ख़बर आई कि एक मुखिया के नेतृत्व में कुछ संथाल ग्रामीणों ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में एक संथाल महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया है, तो ख़ासी हैरानी हुई.
महिला का इसलिए कथित रूप से बलात्कार किया गया क्योंकि उसके रिश्ते किसी गैर-आदिवासी पुरूष के साथ थे.
नहीं रही हिंसा की संस्कृतिपंचायत के कहने पर इज़्ज़त के नाम पर हत्या के मामले उत्तर भारत में कई बार सुनने को मिलते हैं लेकिन संथाल समुदाय के बारे में कभी ऐसा कुछ सुनने को नहीं मिला.
आदिवासियों में अपने समुदाय में ही शादी करने का चलन रहा है.
लेकिन संथाल महिला के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना पर पश्चिम बंगाल में 60 लाख की आबादी वाले समुदाय के प्रमुख नित्यानंदा हेमब्रोन ने मुझसे कहा, “हमारे समुदाय में इस तरह की घटना बहुत ही निंदनीय है.”
वो बताते हैं, “हमारे यहां समुदाय से बाहर शादी करने वाले पुरूषों और महिलाओं को बता दिया जाता है कि वो और अपने जीवन साथी के साथ समुदाय के अनुष्ठानों का हिस्सा नहीं बन सकते हैं. अगर वो इस बात से सहमत नहीं होते हैं तो वो समुदाय से दूर शांतिपूर्ण तरीके से रह सकते हैं. लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि पंचायत उनके ख़िलाफ़ किसी तरह की हिंसा का आदेश दे.”
संथाल लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से रहने के लिए जाना जाता है. वो कई तरह के अनुष्ठानों का पालन करते हैं लेकिन उनके यहां किसी तरह की जाति आधारित व्यवस्था नहीं होती है और न ही ऐसे कोई आपसी संघर्ष होते हैं जो भारत में बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच देखे जाते हैं.
भारत के कई राज्यों में रहते हैं संथाल आदिवासी
वो चावल, गाय का मांस, और अन्य जानवरों के साथ साथ पक्षियों का मांस खाते हैं. वो कुलों और उप कुलों में बंटे होते हैं. वो अपने गांव का प्रमुख चुनते हैं.
वे छोटे छोटे समूहों में काम करते हैं जो आम तौर पर तीन या चार लोगों से मिल बने होते हैं. इस समूहों को मिलाकर फिर परिषद बनती है जो आपसी झगड़ों को सुलझाने का काम करती है.
तनाव और भ्रमसंथाल समुदाय के साथ काम करने वाले शोधकर्ता कुणाल देब कहते हैं, “उनके यहां पांच स्तरों वाली समुदाय प्रमुखों की स्वशासन व्यवस्था होती जो आपसी विवादों को सुलझाती है. ये बहुत लोकतांत्रिक होती है. इसलिए कभई ऐसी हिंसक बात सुनने को नहीं मिली है.”
लेकिन पिछले एक दशक में संथाल समुदाय में भी बदलाव दिखे हैं जिसकी बड़ी वजह तेज़ी से बदलता समाज है जो आधुनिकता और परंपरा को लेकर एक भ्रामक संदेश देता है.
2010 में बीरभूम जिले में तीन संथाल महिलाओं को लोगों की भीड़ के सामने नंगा कर घुमाया गया. उन पर अन्य समुदाय के लोगों के साथ नज़दीकी रिश्ते कामय करने का आरोप था.
बीरभूम में संथाल और मुसलमानों के बीच तनाव भी रहा है.
देब कहते हैं, “मैं उस मामले के बारे में जानता हूं जब संथाल महिलाओं को बीरभूम में मुसलमान व्यक्ति के साथ खाना खाते देखने के बाद नंगा कर घुमाया गया था. संथाल लोगों का कहना है मुसलमान अक्सर संथाल महिलाओं से शादी के वादे करते हैं ताकि वो उनकी ज़मीन को हासिल कर सकें. वहीं मुसलमान इस बात से इनकार करते हैं.”
कभी दुनिया से अलग थलग मज़े से रहने वाले संथाल लोगों का दुनिया से वास्ता बढ़ता जा रहा है और इससे उनकी परेशानियां भी बढ़ रही हैं.
समुदाय के बुज़ुर्गों का कहना है कि टीवी और वीडियो कैसेट प्येलर के चलते अन्य चीजों के अलावा अश्लीलता भी युवाओं तक पहुंच रही है. अब बहुत से संथाल लोगों के पास मोबाइल फोन भी हैं, जिनका इस्तेमाल वो संगीत सुनने और वीडियो देखने के लिए करते हैं,
देब कहते हैं, “समुदाय में बहुत अधिक तनाव और भ्रम है और इसकी वजह बाहर की दुनिया से उनका बढ़ता हुआ संपर्क.”
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