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डाउनलोड करेंभोपाल. बड़े और छोटे तालाब के बाद राजधानी की तीसरी झील के रूप में भेल की सारंगपाणी झील को जाना जाता था, लेकिन देखरेख न होने के कारण अब इसका अस्तित्व ही खत्म हो रहा है। कारखाने से निकले गंदे पानी और वेस्ट के साथ ही पिपलानी का सीवेज भी झील में मिल रहा है। नतीजन यह झील सीवेज टैंक में तब्दील होती जा रही है। झील को दो बार पर्यटन केंद्र बनाने के लिए राज्य सरकार और भेल प्रशासन ने तैयारी तो शुरू की, दोनो ही बार बीच में काम बंद हो गया।
वर्ष 2015 में जापान सरकार ने 12 झीलों के संरक्षण की मंजूरी भी दी थी, जिसमें सारंगपाणी भी शामिल थी। इस योजना में जापान सरकार का पैसा लगना था, लेकिन भेल नगर प्रशासन ने मदद लेने से इंकार कर दिया और फिर इस ओर पलटकर नहीं देखा।
भेल के पूर्व जरनल मैनेजर एस सारंगपाणी, पूर्व रिजर्व बैंक गर्वनर रघुराम राजन के दादा थे। उन्हीं के नाम पर इस झील को सारंगपाणी नाम दिया गया। दो साल पहले राजन जब भोपाल आए थे तो वे अपने दादा के नाम बनी सारंगपाणि झील देखने पहुंचे थे, उस दौरान भेल प्रबंधन ने उन्हें भी झील के हालात सुधारने का आश्वासन दिया था, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ।
जिसने काम शुरू करवाया उसका तबादला
बंद करवा दी थी सीवेज लाइन... वर्ष 2001 में तत्कालीन भेल नगर प्रशासक एसके तिवारी ने झील में मिल रही पिपलानी की सीवेज लाइन को बंद करवा दिया था। नौकायन के लिए टेंडर की तैयारी भी चल रही थी, तभी उनका तबादला होने के कारण काम बंद हो गया और सीवेज लाइन भी दोबारा खोल दी गई।
भेल प्रबंधन ने हठधर्मिता के कारण काम नहीं होने दिया
- पूर्व नगर प्रशासक एसके तिवारी ने बताया कि सारंगपाणी झील को वर्ष 2001 में पर्यटन केंद्र बनाने के लिए कार्य शुरू किया था, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। झील सिर्फ सीवेज टैंक बनकर रह गई।
- पूर्व मेयर कृष्णा गौर ने बताया कि सारंगपाणी झील के संरक्षण के लिए जापान सरकार से राशि मिली थी, भूमिपूजन भी किया गया था, लेकिन भेल प्रबंधन ने अपनी हठधर्मिता के कारण विकास कार्य नहीं करने दिए।
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