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डाउनलोड करेंरायपुर. केंद्रीय भंडार गृह निगम(सीडब्ल्यूसी) बिलासपुर में 7 साल पुराना 3 करोड़ का परिवहन घोटाला फूटा है। अफसरों ने 2010 और 11 के बीच अनाज की ट्रांसपोर्टिंग के दौरान निर्धारित गाइड लाइन से कई गुना ज्यादा कीमत पर ठेका देकर निगम को नुकसान पहुंचाया। सीबीआई ने एक साल तक खुफिया तरीके से जांच की। उसके बाद विभाग के तीन अफसरों आैर दो ट्रांसपोर्टरों के खिलाफ चारसौबीसी का केस दर्ज किया है।
घोटाले में अनाज के परिवहन के लिए बनी असेसमेंट कमेटी ही जांच के घेरे में है। सीबीआई ने तत्कालीन कमेटी में शामिल सीनियर असिस्टेंट मैनेजर मनीष बीआर, रीजनल ऑफिसर आैर डिपाे एक के मैनेजर एसके जोशी, डिपो दो के मैनेजर जीएस राव तथा ठेकेदार संतोष कुमार अग्रवाल व महेन्द्र सिंह छाबड़ा के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया है। इनमें दोनों डिपो के मैनेजर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। तीसरे अफसर अभी कोलकाता में पदस्थ हैं। सीबीआई की अभी तक की जांच में पता चला है कि पहली बार टेंडर रद्द होने के बाद बिलासपुर के डिपो नंबर-1 आैर डिपो नंबर-2 के रेट का निर्धारण करने के लिए बैठक आयोजित की।
इसी बैठक में कमेटी ने गोलमाल किया और सरकारी रेट को लगभग तीन सौ गुना बढ़ा दिया। इससे ठेका लेने वाली कंपनी ने कमेटी द्वारा निर्धारित कीमत से ज्यादा रेट कोट किया। उसके बाद जिन दो कंपनियों को पहली बार में रिजेक्ट किया था उन्ही दाेनों कंपनियों को अधिक दर पर ठेका दे दिया। असेसमेंट कमेटी ने 2011 में बिलासपुर की डिपो नंबर-एक व डिपो नंबर 2 की नई प्रीवेलिंग मार्केट रेट(पीएमआर) निर्धारित की। सीबीआई की जांच में पाया गया कि ये रेट 2010 के तय रेट से कहीं ज्यादा है। ऐसा ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया।
गोदाम से रेलवे के यार्ड पहुंचाना था अनाज
केंद्रीय भंडार गृह निगम की जिम्मेदारी भंडार से माल ट्रकों में लदवाना और उसे अलग-अलग स्थानों में सप्लाई के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचाने की है। अफसरों ने इसी में खेल किया। गोदाम में रखा माल ट्रक में लदवाने और वहां से स्टेशन तक पहुंचाने के ठेके की दरें अपनी मर्जी से बढ़ा दीं।
2010 आैर 2011 के रेट की जांच के बाद खुला मामला
इस मामले में शक होने पर जब विभाग के अफसरों द्वारा जांच की गई तो पाया गया कि बिलासपुर डिपो नंबर1 का पीएमआर 2010 में 228 रुपए था जबकि 413.24 रेट पर टेंडर दिया गया था यानि 80 फीसदी ज्यादा । इसी तरह डिपो नंबर दो पीएमआर 263 रुपए था जबकि टेंडर द्वारा कोट रेट 676 रुपए था यानि 157 प्रतिशत ज्यादा। जबकि 2011 में जो पीएमआर रेट का जेएफएसी द्वारा जो असेसमेंट किया गया था वह 619 रुपए था जबकि 653 रुपए रेट कोट किया गया था।
एक बार रद्द किया टेंडर
टेंडर खोला गया तब एक नंबर डिपो के लिए महेन्द्र सिंह छाबड़ा एल-1 में आया जिसने हेंडलिंग का चार्ज नान द्वारा तय एसआेआर से 448 प्रतिशत ज्यादा कोट किया था। जबकि उस समय मार्केट रेट 263 रुपए था। इसी तरह डिपो नंबर दो के लिए भी एल-1 बीडर महेन्द्र सिंह छाबड़ा ने तय एसआेआर से 410 प्रतिशत अधिक रेट कोट किया था, जबकि वहां का मार्केट रेट 240.50 रुपए था। टेंडर कमेटी की बैठक में पाया गया कि तय रेट से एसआेआर की दर बहुत अधिक है। इसके बाद टेंडर रद्द कर दिया गया। पुराने नियम आैर शर्तों के साथ जनवरी 2011 में दोबारा टेंडर निकाला गया। इसके लिए भी तीन ठेकेदारों ने टेंडर डाले जिनमें से होरा ट्रांसपोर्ट रायपुर क्वालीफाई नहीं कर पाई जबकि संतोष कुमार अग्रवाल आैर महेन्द्र सिंह छाबड़ा ने टेक्नीकली क्वालीफाई कर लिया। इसके बाद सीडब्ल्यूसी की फाइनेंस असेसमेंट कमेटी आैर वेयर हाउस को दोनों के मैनजरों भोपाल के रीजनल ऑफिसर सभी ने जनवरी 2011 की स्थिति में प्रिवेलिंग मार्केट रेट (पीएमआर)निकाला।
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