आदिवासी वोटों का बिखराव ही तय करेगा नतीजों की दिशा

News - खूंटी, रांची और सिमडेगा जिले के हिस्सों को काट-छांटकर बनी मुंडा आदिवासी बहुल खूंटी, तमाड़ और तोरपा विधानसभा सीटों...

Dec 04, 2019, 09:25 AM IST
खूंटी, रांची और सिमडेगा जिले के हिस्सों को काट-छांटकर बनी मुंडा आदिवासी बहुल खूंटी, तमाड़ और तोरपा विधानसभा सीटों का मिजाज भी उनकी बसावट जैसा ही है। खूंटी का कर्रा, तपकरा, डरांग आदि तोरपा विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है। इसे नागुड़ी दिशुम कहते हैं। नागुड़ी दिशुम, वह इलाका जहां मुंडाओं के अलावा मिश्रित आबादी है। हांसदा क्षेत्र, जहां मुंडा जनजाति बहुतायत है। इसमें खूंटी से खरसांवा तक 154 गांव आते हैं और तीसरा है पंचपरगनिया क्षेत्र, जिसमें बुंडू-तमाड़ का भूगोल है। इलाके की हवा कभी बारूदी गंध के लिए बदनाम थी। आज वैसी स्थिति नहीं है लेकिन तीनों विधानसभा क्षेत्र के नतीजे नक्सली प्रभाव से अछूते नहीं हैं। नक्सली पृष्ठभूमि का कोई न कोई प्रत्याशी तीनों पर है। इन क्षेत्रों में रोमन कैथोलिक, सीएनआई और जीएल चर्च का भी बड़ी आबादी पर प्रभाव है। तीनों सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। यहां वोटों का रूझान ईसाई, सरना और सदान की विभाजक रेखा के आधार पर तय होता है। इस चुनाव में भी यही हो रहा है। पार्टियों को इसका एहसास है। लिहाजा मंच से नेता एकजुटता की गुहार लगाते फिर रहे हैं। लोगों से सरकार को मौका देने और बदलने की अपील कर रहे हैं।

तोरपा विधानसभा क्षेत्र का तपकरा वह इलाका है जहां जल, जंगल, जमीन के सवाल पर राज्य गठन के बाद पहली बार गोली चली थी। चुतरुबुरू और डेरांगबुरू के बांध कोयल-कारो जल विद्युत परियोजना के डूब क्षेत्र के लोहाजिमी, डेरांग जैसे 256 गांवों के आदिवासी परियोजना का विरोध कर रहे थे। 2 फरवरी 2001 को नाराज आदिवासियों ने तपकरा थाना फूंक दिया। गोली चली। दर्जन भर लोग मारे गए। इस चुनाव में भी जल-जंगल-जमीन का सवाल उठ रहा है। लेकिन तासीर उतनी गाढ़ी नहीं, जैसी लोकसभा चुनाव के दौरान थी। तमाड़ विधानसभा क्षेत्र का कोचांग, डोल्डा, कुरुंगा, बीरबांकी, अड़की और खूंटी का मारंगहातू, सापरूम, लुपुंगडीह, सलगा, गुटुहातू पत्थलगड़ी का सघन क्षेत्र था। आंदोलन के दौरान हुए संघर्ष में राष्ट्रद्रोह के मुकदमे भी हुए। मुकदमों की बात प्रचारित हुई। संख्या बढ़ा-चढाकर बताई गई। जिला पुलिस ने बयान जारी कर स्थिति स्पष्ट की कि सिर्फ 17 मुकदमे हुए हैं और 172 लोग ही आरोपी हैं। संस्कृति बनाम सरकार की जंग का कभी गरम रहा यह मुद्दा भी विधानसभा चुनाव में पीछे छूट गया है।

तीनों इलाकों में गोलबंदी मुद्दों के आधार पर नहीं, चेहरों और उनके प्रभाव क्षेत्रों के इर्द-गिर्द सिमट गई है। कहीं-कहीं लोगों की जुबान पर विकास की भी बातें हैं। मर्दों से अधिक महिलाओं की जुबान पर। खूंटी के कालामाटी गांव की सावित्री स्वांसी कहती हैं जिसने हमारी कमाई बढ़ाई, हम तो उनके साथ हैं। गांव में इमली और लाह की प्रोसेसिंग यूनिट लगी है और मरंगहदा में चिरौंजी की यूनिट। शनिवार को मरंगहदा में बाजार लगा था, हर दल की प्रचार गाड़ी यहीं थी।

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योजनाएं सरकारी बोर्ड पर हैं...जमीन पर अधूरी

इस इलाके में सरकारी योजनाओं और उनके फायदे का जिक्र तो गांवों तक है। हालांकि इन योजनाओं का फायदा मिलने की बात पर सब एकमत नहीं हैं। गांव सड़कों से जुड़ तो गए हैं, मगर सड़कों की स्थिति अभी बहुत अच्छी नहीं है। कुछ लोग खुश हैं कि सड़क तो बनी, कुछ नाराज कि इससे बेहतर हो सकता है...इतना काफी नहीं।

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