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‘भारत में है ऐपल, बोइंग जैसी कंपनियां बनाने का दम’

7 वर्ष पहले
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तुषार बनर्जी

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

तकनीक के क्षेत्र का \'टेक नोबेल\' कहा जाने वाला मारकोनी पुरस्कार जीतने वाले भारतीय मूल के वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर आरोग्यस्वामी जोसेफ़ पॉलराज का मानना है कि भारत में ऐपल और इंटेल जैसी हाई-टेक कंपनियां बनाने का माद्दा है.

बीबीसी हिन्दी के साथ विशेष बातचीत में प्रोफ़ेसर पॉलराज ने कहा कि आईटी सेक्टर में भारत ने शानदार काम किया है और ये गौरव की बात है, लेकिन अमरीका और रूस की तरह हाई-टेक कंपनियां खड़ी करने की दिशा में भारत पीछे छूट गया है.

(पढ़िए: प्रोफ़ेसर पॉलराज को टेक नोबेल)

अमरीका की स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर पॉलराज ने कहा, \"सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमने बहुत काम किया है. मुझे लगता है कि भारत को और दुनिया को इस पर गर्व होना चाहिए. भारत ने बस अमरीका और रूस की तरह प्रमुख कंपनियां नहीं बनाईं जैसे अमरीका के पास इंटेल और बोइंग जैसी कंपनियां हैं. हमें यह काम भी करना चाहिए और हम ऐसा करने में सक्षम भी हैं.\"

भारतीय नौसेना में तीस साल के उपलब्धिपूर्ण करियर के बाद रिटायर हुए प्रोफ़ेसर पॉलराज को वायरलेस तकनीक के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए हाल ही में मारकोनी पुरस्कार दिया गया है.

हाई-स्पीड इंटरनेट के \'भीष्म\'

प्रोफ़ेसर पॉलराज की खोज, माइमो (MiMo) आज की हाई स्पीड वायरलेस तकनीक 4जी और वाई-फ़ाई की जान है.

पुरस्कार देने वाली मारकोनी सोसाइटी का कहना है कि प्रोफ़ेसर पॉलराज की थ्योरी सिगनल रिसीव और ट्रांसमिट करने के लिए एक से ज़्यादा एंटीना का प्रयोग किए जाने की वकालत करती है.

प्रोफ़ेसर पॉलराज अपनी इस उपलब्धि का श्रेय कड़ी मेहनत, सोच और साथियों को समर्पित करते हैं. उनका मानना है कि हर बड़ी खोज के लिए सोच और माहौल काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार होता है.

उन्होंने कहा, \"दुनिया में जितनी भी प्रगति हुई है, वो चाहे मोटरकार हो, जेट इंजन हो या फिर सेल फ़ोन हो...ये सभी नये विचारों की वजह से अस्तित्व में आए, जहां लोगों ने कुछ अलग तरह से सोचा. इसलिए हमें नये तरीके से सोचने की ज़रूरत है.\"

बचपन और पढ़ाई

दक्षिण भारत के कोयंबटूर में जन्मे आरोग्यस्वामी जोसेफ़ पॉलराज बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल थे और सिर्फ 15 वर्ष की आयु में ही उन्होंने स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली.

साल 1961 में उन्हें वो नौकरी मिली जिसके बारे में याद करके उनके परिजनों का सीना आज भी चौड़ा हो जाता है. उन्हें भारतीय नौसेना में काम करने का मौका मिला था.

वह नौसेना के इलेक्ट्रिकल ब्रांच में काम करना चाहते थे और उन्हें काम मिला हथियारों को नियंत्रित करने की तकनीक और सिग्नल प्रणाली की देख-रेख का.

भारतीय नौसेना ने भी उनकी काबिलियत और लगन को पहचाना. प्रोफ़ेसर पॉलराज को आईआईटी दिल्ली में आगे की पढ़ाई के लिए भेज दिया गया.

लेकिन नौसेना का उन पर एक उधार अब भी बाकी था.

\'नौसेना का उधार\'

पाकिस्तान के साथ 1971 की जंग में भारतीय नौसेना को अपनी पनडुब्बियों की सोनार तकनीक में खामियों का पता चला.

इस चुनौतीपूर्ण समय में प्रोफ़ेसर पॉलराज और उनकी टीम ने सोनार की ख़ामियों का तोड़ निकाला और तीन वर्ष के भीतर नौसेना की सभी पनडुब्बियों में सुधार कर दिया गया. यही तकनीक आज भी प्रयोग में है.

पर नौसेना के बाद स्टैनफर्ड क्यों किसी भारतीय विश्वविद्यालय में नहीं रुके वह, क्या वह भारत में रहते हुए ज्यादा बेहतर तरीके से देश के काम नहीं आते?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “क्या पता, शायद आता. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्टेनफर्ड जैसे विश्वविद्यालय ने मुझे मदद की जो दुनिया में कहीं और मिलना मुश्किल होता. भारत में रहता तो अच्छा होता, पर फिर भी मुझे महसूस होता है कि सोनार तकनीक के रुप में मैंने भारत के लिए काफ़ी काम किया है.”

‘माइमो’ और ‘एपीएसओएच सोनार’ जैसी खोजों के ज़रिए प्रोफ़ेसर पॉल (जैसा कि उनके दोस्त उन्हें पुकारते हैं) ने सैकड़ों वैज्ञानिकों के लिए शोध की ज़मीन तैयार की है.

लेकिन प्रोफेसर पॉल की ये उपलब्धि और दूरी हमारे बीच यही सवाल भी छोड़ जाती है कि आखिर क्यों भारत अपने सबसे तेज़ दिमागों को पश्चिमी देशों के हाथों खो देता है?

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