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शशि थरूर का कॉलम: अब राज्यों को अधिक खुला हाथ देने का वक्त

3 वर्ष पहले
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मैंने पिछले लेख में वित्त आयोग के नए संदर्भ बिंदु को लेकर दक्षिण के राज्यों में उठे विवाद की चर्चा की थी। इन राज्यों को लगता है कि शासन, महिला सशक्तीकरण और आबादी रोकने में नाकाम राज्यों को इसमें गलत ढंग से पुरस्कृत किया गया है। मैंने तब इससे बड़े खतरे की ओर ध्यान दिलाया था कि यदि 1971 की आबादी के आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व स्थिर रखने की मौजूदा व्यवस्था 2026 में खत्म होने पर यदि यही तर्क गंभीर स्थिति पैदा करेगा। तब दक्षिणी राज्यों को वित्तीय रूप से शिकार बनाए जाने के साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी वंचित होने का अहसास होगा व राष्ट्रीय एकता पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। 


पहले ही कुछ गर्मदिमाग अलगाव पर गंभीर विचार करने की बात कर रहे हैं और चेन्नई के आसपास तो कुछ 'द्रविड नाडु' का मामला फिर जीवित कर रहे हैं। ऐसा कोई विचार चाहे तमिलनाडु के सीमित हलकों को ही लुभाता हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इससे जुड़ी चिंता की उपेक्षा की जाए। अपने लेख में मैंने सुझाव दिया था कि दक्षिण की इस फैलती बेचैनी का एक ही इलाज है कि हम अधिक विकेंद्रीकृत लोकतंत्र की जरूरत को पहचानंे। यहां कर संसाधनों की हिस्सेदारी में केंद्रीय हिस्सा इतना महत्वपूर्ण न हो और नई दिल्ली का राजनीतिक अधिकार इतना हावी होने वाला न हो। इससे हाल के आबादीगत आंकड़ों से पैदा हुई चिंताएं उतनी प्रासंगिक नहीं रहंेगी।

 
हम यह कैसे तय करें कि एक विकेंद्रीकृत लोकतंत्र का क्या मतलब है? कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दलील दी है कि भारत एकीकृत राज्य (यूनियन) से संघ-राज्य (फेडरेशन) में विकसित हो रहा है। यह कुछ स्तर तक तो खुशफहमी है। क्योंकि इस दौर में तो 'सहकारी संघवाद' जैसे चिकने-चुपड़े जुमलों के पीछे अधिक-केंद्रीकरण की वास्तविकता छिपा दी गई है, लेकिन कोई कारण नहीं है कि हम भारत को उस दिशा में ले जाने के बारे में न सोचें फिर चाहे हम अभी वहां तक पहुंचे न भी हों। 


बेशक हमारी 'अर्ध-संघीय' व्यवस्था में संघीय करंसी सर्वोपरि है। वैसे भी भारत में संघ ने राज्यों का गठन किया है बजाय इसके कि राज्य एकत्रित होकर संघ का निर्माण करते। कुछ नए राज्य तो हाल के वर्षों में संसद में कानून पारित करके गठित किए गए हैं। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि संघ का प्रभुत्व इस हद तक बढ़ा दिया जाए कि जहां राज्यों को न के बराबर या बिल्कुल ही स्वायत्तता न रहे और उन्हें लगे कि वे तो नई दिल्ली के खिलौने बन गए हैं। इसी धारणा ने मौजूदा बेचैनी को जन्म दिया है और वित्त आयोग के संदर्भ बिंदुओं में तकनीकी सुधार को बड़ा मुद्‌दा बना दिया है। 


लेकिन, अधिक संघीय भारत कैसा दिखाई देगा? पहले तो हमें यह आशंका दूर करनी चाहिए कि अधिक संघवाद उस बंधन को ढीला कर देगा, जिसने सारे भारतीय राज्यों को सहभागी राष्ट्रीयता में बांध रखा है। जब कर्नाटक ने अपने आधिकारिक राजकीय ध्वज को मंजूरी दी तो खतरा महसूस किया गया और पुकार उठी कि ऐसा ध्वज तो भारतीय ध्वज को चुनौती है। कई अन्य संघीय राष्ट्रों में प्रदेशों के अपने ध्वज और प्रतीक हैं, लेकिन उनकी राष्ट्रीय सरकारों को खतरा महसूस नहीं हुआ। सच तो यह है कि मजबूत क्षेत्रीय पहचानों को मान्यता देना एक शक्तिशाली व आत्मविश्वास भरे राज्य की पहचान है। केवल कमजोर ही अपने मातहतों को अधिकार संपन्न बनाने के प्रति उदासीन होते हैं। 


एकाधिक पहचानों को बढ़ावा देने और उसका उत्सव मनाने की भारत की क्षमता उसकी विशिष्टता रही है। आप एक साथ अच्छे मुस्लिम, अच्छे केरली और अच्छे भारतीय हो सकते हैं और इनमें से हर एक पर गर्व कर सकते हैंं बिना यह महसूस करे कि इनमें कोई दूसरे का महत्व घटाता है। महान मलयाली कवि वल्लथोल ने लिखा है, 'यदि कोई भारत का नाम सुनता है तो उसका दिल गर्व से भर जाना चाहिए, यदि कोई केरल का नाम सुनता है तो उसकी धमनियों में खून को उछाले मारना चाहिए।' इसी तरह कन्नड़ कवि कुवेम्पु ने 'जय भारता जननीय तुनजाथे' की रचना की, जिसमें कर्नाटक को भारतीय राष्ट्र की बेटी बताकर उसकी सराहना की है। 


इस तरह दक्षिण के राज्य पृथक होने में रुचि नहीं रखते, वे अधिक ईमानदार संघवाद चाहते हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सिर्फ ऐसी व्यवस्था की वकालत की है, जिसमें राज्यों को उनसे इकट्‌ठा किए गए टैक्स में अधिक बड़ा हिस्सा मिले। इससे तुलनात्मक रूप से विकसित दक्षिणी राज्य अधिक हिस्सा अपने पास रख पाएंगे, जो वे अभी केंद्र को योगदान में देते हैं। इस सुझाव के साथ कठिनाई यह है कि इससे भारत के गरीब राज्यों को सहायता करने के लिए केंद्र सरकार के पास उपलब्ध फंड घट जाएगा। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया दलील देते हैं कि 'केंद्रीय योजनाओं का हिस्सा कम होना चाहिए।' यह उक्त सवाल का जवाब हो सकता है। हां, अधिक संपन्न राज्यों से राजस्व लीजिए, ताकि गरीब राज्यों में केंद्रीय योजना के लिए पैसा जुटाया जा सके, लेकिन उन योजनाओं को अधिक लचीलेपन के साथ लागू करें ताकि हर राज्य आकलन कर सके कि क्या उसे इसकी जरूरत है और साथ ही उन्हें अधिकार हो कि वे इन योजनाओं को अपनी जरूरतों के मुताबिक आकार दे सकें। इससे केंद्र की बजाय राज्यों की प्राथमिकताओं के लिए अधिक पैसा मिल सकेगा। 


मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की यह भी शिकायत है कि देश की आर्थिक नीति तय करने में राज्यों को कुछ कहने का हक नहीं है। वे मुक्त व्यापार समझौते के तहत श्रीलंका के जरिये वियतनाम से सस्ती काली मिर्च के आयात का उदाहरण देते हैं कि समझौते में केरल व कर्नाटक जैसे राज्यों को कुछ कहने का हक नहीं है, जबकि काली मिर्च के उनके किसानों की आजीविका इससे गंभीरता से प्रभावित होगी। वे जीएसटी काउंसिल की तर्ज पर संस्था गठित करने का सुझाव देते हैं, ताकि 'व्यापार नीति और कृषि संबंधी मुद्‌दों पर नीतियां बनाने में हम बेहतर ढंग से बात रखें, जो हमारे किसानों को प्रभावित करती हैं।..हमें तत्काल ऐसे तंत्र की जरूरत है, जिसमें हमें राष्ट्रीय नीतियों में अपनी बात रखने का मौका मिले।' यह प्रस्ताव विचार करने लायक है। अब दूसरे उदारीकरण का वक्त है। जैसे 1991 के मूल उदारीकरण ने भारतीयों को लाइसेंस राज के बंधनों से मुक्त किया उसी तरह अब हमें राज्यों को उनकी क्षमता के अनुसार और सुशासन से विकसित होने के लिए मुक्त करना होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।) 

 

शशि थरूर 
विदेश मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री 
Twitter@ShashiTharoor 

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