शेखर गुप्ता

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शेखर गुप्ता का कॉलम: ‘मुल्क’ देखें, आंखों में देखते नज़र आएंगे मुस्लिम

संदर्भ: आम मुस्लिम परिवार की आशंकाओं, दुविधाओं और कुंठाओं का अहसास कराती है यह फिल्म

Danik Bhaskar

Aug 13, 2018, 11:30 PM IST
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प् शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्

हर सात भारतीयों में से एक मुस्लिम है। 2021 की जनगणना में उनकी आबादी 20 करोड़ पार कर लेगी। निश्चित ही हमारे श्रेष्ठतम अभिनेताओं, संगीत निर्देशकों, गीतकारों, निर्देशकों और तकनीकी कलाकारों में सात में एक से अधिक मुस्लिम रहे हैं। फिर भी हिंदी सिनेमा में मुस्लिमों का बहुत कम चित्रण है। उन दुर्लभ मौकों में भी या तो वे अच्छे होते हैं या बहुत बुरे। इसीलिए अनुभव सिन्हा की नवीनतम फिल्म ‘मुल्क’ का महत्व है।


सिनेमा में मुस्लिमों के चित्रण के मोटेतौर पर तीन चरण हैं। स्वतंत्रता से लेकर 1960 पार के उत्तरार्ध तक। यह मुख्यत: इतिहास के महान रूमानी और ताकतवर शख्सियतों पर केंद्रित रहा : ताज महल, मुगल-ए-आजम, रजिया सुल्ताना। इसके साथ एक समांतर वर्ग ‘मुस्लिम सामाजिक’ फिल्मों का रहा, जिसमें ‘मेरे मेहबूब से लेकर पाकीजा’ तक परिष्कृत रोमांस, शायरी और सामंतवादी भव्यता मिलती है। 1970 पार के दशक के ‘एंग्री यंगमैन’ वाले दिनों में मुस्लिम बड़े दिल वाले, सम्मानीय लोग होते थे,जो आमतौर पर अपने हिंदू साथी के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर देते थे। प्राण का किरदार शेर खान याद है, जो प्रकाश मेहरा की 1973 की क्लासिक ‘जंजीर’ में अमिताभ बच्चन के लिए ‘यारी है इमान मेरा, यार मेरी ज़िंदगी…’ गाता है। 1980 पार के उत्तरार्ध में यदि मुस्लिम पात्र होता तो वह हमेशा ही अच्छा आदमी होता। इसके बाद वह दौर आया, जिसे हम सनी देओल युग कह सकते हैं, जिसमें मुस्लिम ज्यादातर आतंकी होते थे। ऐसी ही एक फिल्म ‘जाल- द ट्रैप’ में अच्छा आदमी देओल बुरे लोगों (सारे मुस्लिम) को मैनर्स सिखाता है और पृष्ठभूमि में ‘ओम नम: शिवाय’ गूंज रहा है। तब्बू देशभक्त हीरो की मुस्लिम पत्नी की भूमिका निभाती है और उसे धोखा देती है। सबसे खराब थी ‘गदर- एक प्रेम कथा।’ बरसों पहले मैंने यह तब देखी थी जब संपादक एमजे अकबर ने मुझसे कहा कि यह अब तक की सबसे कट्‌टर सांप्रदायिक फिल्म है। वे एकदम सही थे। कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद, अल कायदा और ‘इंडियन मुजाहिदीन’ के उदय से इस्लामोफोबिया के लिए बाजार तैयार कर दिया। जॉन अब्राहम की ‘न्यूयॉर्क’ व शाहरुख खान की ‘माय नेम इज खान’ और मलयालम फिल्म ‘अनवर’ में मुस्लिम नायक थे। शाहरुख ने भी ‘चक दे! इंडिया’ से शुरू करके एक कई फिल्मों में मुस्लिम नाम रखकर एक संकेत दिया है।


अनुभव सिन्हा की ‘मुल्क’ में एक साधारण मुस्लिम परिवार का चित्रण है। इसके मुस्लिम अच्छे और देशभक्त भी है और उनमें बुरे व आतंकी भी हैं। यह अच्छे मुस्लिम चरित्र की जटिलता भी रेखांकित करती है, जो अपने समुदाय के लिए ट्रिगर दबाने को तैयार रहने वाला वाराणसी आतंक विरोधी दस्ते का प्रमुख है। यह किरदार रजत कपूर ने शानदार ढंगे से निभाया है। वे अपनी चाल-ढाल, आंखों और बॉडी लैंग्वेज से थोड़े ही शब्दों में बहुत कुछ कह देते हैं। फिल्म शुरू होने के आधे घंटे में ही आप भी वह भय, असुरक्षा, विरोधाभासी दुविधाएं, हसरतें और कुंठाएं महसूस करने लगते हैं, जो आज किसी भारतीय मुस्लिम मन पर हावी होंगी। यदि मैं वकील मुराद अली मोहम्मद (ऋषि कपूर) का आतंकी भतीजा शाहिद (प्रतीक बब्बर) होता तो यकीनन विरोध, दबाव और असुरक्षाएं महसूस करता। आधी फिल्म तक तो आप भय से जम जाते हैं। आप सोच सकते हैं कि क्या यह सब करीब 20 करोड़ मुस्लिमों के मन में भी चल रहा होगा? और यदि ऐसा है तो अब लपटें क्यों नहीं उठी हैं?


ऐसा इसलिए है, क्योंकि आतंकी का शव लेने से इनकार करने वाले उसके परिवार की तरह घोर देशभक्त मुस्लिम भी हैं। हम हवलदार अब्दुल हमीद, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और वाराणसी के उत्साद बिसमिल्लाह खान की प्रशंसा करते हैं कि काश उनके जैसे और भी मुस्लिम होते। अनुभव सिन्हा कहते हैं कि ये मुस्लिम अपवाद नहीं है, ज्यादातर उनके जैसे ही है। अपवाद तो आतंकी हैं। बीस साल से ज्यादा के वक्त में किसी हिंदी फिल्म ने मेरे कॉलम को तीन बार ही प्रेरित किया है। पहली थी फरहान अख्तर की 2001 की ‘दिल चाहता है’, जो हमारी पहली ऐसी फिल्म ती जिसमें धन और महंगी जीवनशैली पर कोई फैसला नहीं दिया गया। यह वह वक्त था जब अनिल अंबानी को सचिन तेंडुलकर से ऊपर शीर्ष युवा आयकन चुना जा रहा था। दूसरी फिल्म, नीरज घायवान की 2015 में आई ‘मसान’ ने तीव्र प्रगति से आए बदलाव के सामाजिक व व्यक्तिगत प्रभाव की पड़ताल की। सिन्हा की ‘मुल्क’ इसलिए अलग है, क्योंकि यह आधुनिक भारत में सामान्य मुस्लिम परिवार की चुनौतियों की बात करती है। उन्हें मिल रही ट्रोलिंग से पता चलता है कि वे कितने सफल रहे हैं। शर्मिंदा होने की बजाय आपको तो गर्व होना चाहिए कि भारत में वह आत्मविश्वास है कि वह मेघना गुलजार की ‘राजी’ जैसी फिल्म बना और सराह सकता है, जिसमें पाकिस्तानी फौजी परिवार को अच्छे लोगों के रूप में चित्रित किया है। मौजूदा सनी देओल वाले माहौल में साथी मुस्लिम के बारे में हमारा सुविधाजनक दृष्टिकोण यही है वह गद्दार है, जब तक कि इससे उलट साबित न हो जाए? इसलिए आपको यह फिल्म देखनी चाहिए।


2005 में उसी वाराणसी ‘वाक द टाक’ इंटरव्यू में मैंने उस्ताद बिस्मिल्ला खान से पूछा कि वे 1947 में पाकिस्तान क्यों नहीं गए,जब जिन्ना ने व्यक्तिगत रूप से आग्रह किया था? उन्होंने कहा, ‘कैसे जाते हम, वहां हमारा बनारस है क्या।’ फिर उन्होंने बताया कि वे अपना प्रिय राग भैरवी भगवान शिव के आशीर्वाद के बिना नहीं बजा सकते। चूंकि उन्हें मंदिर में जाने की इजाजत नहीं है तो वे मंदिर के पीछे जाकर उस दीवार को छू लेते हैं, जिससे लगकर मंदिर की मूर्ति है।


संसद में हमारे पहले स्वतंतत्रता दिवस की क्लिप्स चलाकर देखिए। जश्न में शहनाई बजा रहे शख्स बिसमिल्लाह खान हैं, जिन्होंने पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था। अब हम जब 72वें स्वतंत्रता दिवस की ओर बढ़ रहे हैं तो उसी तरह जागृति के लिए ‘मुल्क’ देखिए। मुराद अली मोहम्मद के किरदार में ऋषि कपूर को कोर्ट से कहते देखिए : यदि आप मेरी दाढ़ी और ओसामा बिन लादेन की दाढ़ी में फर्क नहीं कर सकते तो यह आपकी समस्या है। दाढ़ी रखकर अपना धार्मिक दायित्व (सुन्नत) पूरा करने का मेरा अधिकार आप छीन नहीं सकते।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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