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शेखर गुप्ता का कॉलम: सौम्य राष्ट्रवाद कांग्रेस को चुनाव में भारी पड़ेगा

संदर्भ: राहुल भाजपा को सौम्य हिंदुत्व से टक्कर दे रहे हैं लेकिन, राष्ट्रवाद में यह नीति उचित नहीं होगी

Dainik Bhaskar

Sep 10, 2018, 11:05 PM IST
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प् शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्

राहुल गांधी को भगवान शिव की शरण में जाना पड़ा पर वे भाजपा को परेशान करने में कामयाब रहे। उनकी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भाजपा समझदारी भरी प्रतिक्रिया देकर कह सकती थी कि भोले बाबा आपको समझदारी दें और उम्मीद है आपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए भी प्रार्थना की होगी। किस्सा खत्म हो जाता। इसकी बजाय भाजपा सवाल उठाने लगी कि वे वहां गए भी हैं या नहीं।


भाजपा ने जहां नादानी दिखाई है वहीं राहुल ने चतुर राजनीति का परिचय दिया। भाजपा पर जवाहरलाल नेहरू इतने छाए हुए हैं कि उसे लगता है कि नेहरू की नास्तिकता भविष्य की पीढ़ियों में भी हावी है। जबकि इंदिरा गांधी रुद्राक्ष की माला पहनती थीं, मंदिरों में जाती थीं, बाबाओं और तांत्रिकों को उनका संरक्षण था तो राजीव गांधी ने अयोध्या के राम मंदिर का ताला खुलवाया, वहां शिलान्यास करवाया और राम राज्य का वादा करते हुए अयोध्या से 1989 का प्रचार अभियान शुरू किया। यूपीए के दस वर्षों ने मोदी-शाह को चकरा दिया होगा, क्योंकि गठबंधन के मध्य-वाम चरित्र के कारण धार्मिकता का प्रदर्शन नदारद था। लेकिन तब भी अमेरिका से परमाणु सौदे का बचाव करते हुए दिए जोश भरे भाषण में डॉ. मनमोहन सिंह ने ‘चंडी दी वार’ का गर्व के साथ आह्वान किया था। गुरुगोविंद सिंह ने युद्ध में जाते समय भगवान शिव के प्रति देवी चंडी की इस प्रार्थना को दोहराया था।
इंदिरा के बाद कांग्रेस ने नेहरू की कट्‌टर धर्मनिरपेक्षता को छोड़ दिया और इसे नरम, दबी हुई धार्मिकता और आक्रामक अल्पसंख्यकवाद का घालमेल बना दिया। राहुल जनेऊधारी हिंदू रूप में आकर और आगे चले गए और अब यह कैलाश की तीर्थयात्रा। यह दिखावा रणनीतिक तर्क की कसौटी पर खरा है। वे भाजपा के कट्टर हिंदुत्व को सौम्य हिंदुत्व से टक्कर दे रहे हैं। कड़ी धर्मनिरपेक्षता वाले वामपंथ के उनके नए समर्थक विचलित हो गए हैं पर राहुल में इतनी राजनीतिक चतुराई है कि वे समझ सकें कि यह देश जेएनयू के क्रांतिकारी गणराज्य से आगे भी है और देवाताओं को दूसरे पक्ष के हवाले कर कोई चुनाव नहीं जीत सकता। अब माओवादियों से संबंध के आरोप में गिरफ्तार लोगों को राहुल ने जैसा बिना शर्त समर्थन दिया है तो उससे उनकी पार्टी भी चकित है। क्या वे कट्‌टर राष्ट्रवाद को भी सौम्य राष्ट्रवाद से टक्कर देने की योजना बना रहे हैं? ऐसा है तो यह कांग्रेस के बुनियादी तरीके में दो बदलाव होंगे। पहले से दूसरा ज्यादा महत्वपूर्ण व जोखिमभरा है।
गिरफ्तार लोगों को समर्थन पर किसी मंच पर बहस नहीं हुई और बिना सोचे-विचारे ही दिया गया है। इनमें से चार की तो उनकी यूपीए सरकार ने गिरफ्तारी की थी या पाबंदियां लगाई थीं। एक ने छह तो दूसरे सात साल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बिताए। कोबाड गांधी और जीएन साईबाबा दोनों को यूपीए ने बंदी बनाया था, जो अब भी कारावास में हैं। उन्हीं की सरकारी एजेंसियों ने दो प्रमुख नक्सलियों आजाद और किशनजी को खत्म कर दिया। क्या अब वे इसे उलट रहे हैं? क्या उनकी प्रतिक्रिया में उसके प्रति सौम्य दृष्टिकोण है, जिसे डॉ. मनमोहन सिंह ने 2006 में देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीरतम खतरा बताया था? ध्यान रहे कि यह यूपीए-1 की बात है, जब उनकी सरकार को वाम दलों का समर्थन था।
क्या राहुल में यह बदलाव देखना मुश्किल है? हालांकि कई व्यक्तियों और समूहों ने सोनिया गांधी से नजदीकी के चलते तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम के कड़े नक्सल विरोधी रुख को रोकने का अभियान चलाया था। चिदंबरम ने यह अभियान सुरक्षा बलों पर हुए कुछ बड़े हमलों के बाद शुरू किया था। उनमें से एक हमला छत्तीसगढ़ के चिंतलनार में हुआ था। 1971 के युद्ध और ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद भारतीय सुरक्षा बलों की एक दिन में इतनी जनहानि कभी नहीं हुई थी। जब सुरक्षा बल नक्सलियों पर भारी पड़ने लगे तभी मणिशंकर अय्यर ने इस नीति को एकतरफा बताया था। एक प्रमुख नक्सली की पत्नी को ओडिशा में अपह्र‌त आईएएस अधिकारी के बदले रिहा किया गया और वह राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य रहे हर्ष मंदर के एनजीओ की प्रमुख निकलीं। देशद्रोह के आरोप में अभियुक्त विनायक सेन को योजना आयोग की स्वास्थ्य समिति में शामिल किया गया।
क्या भ्रम की वह स्थिति लौट रही है? गुजरात चुनाव में करीबी मुकाबले के बाद हमने कहा था कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा 2019 का चुनाव आर्थिक मसलों पर नहीं लड़ेगी। वह मतदाताओं के सामने हिंदुत्व, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और कट्टर राष्ट्रवाद का मिश्रण रखेगी। राहुल पहले का मुकाबला हिंदुत्व के अपने विचार से कर रहे हैं। दूसरा, भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस लड़नेे की स्थिति में ही नहीं है। तीसरे मुद्‌दे पर वह अपने भूतकाल के बल पर आसानी से टक्कर दे सकती है। भारत की तुलना में कम ही लोकतंत्र हैं जिन्होंने अपने को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष किया। हर राजद्रोह को हरा दिया गया, उनके नेता अलग-थलग कर दिए गए या राजनीतिक मुख्यधारा में ले लिए गए। यह धुर वाम आंदोलनों के लिए भी सच है। भारत एक अथक और माफ न करने वाली कठोर राज्य-व्यवस्था है। सम्प्रभुता छोड़ना तो दूर इसने इसमें इजाफा ही किया। सिक्किम का विलय उल्लेखनीय है। एक और आधे साल के दौर छोड़कर राष्ट्रीय सुरक्षा या राष्ट्रवाद पर सौम्य रवैया रखने वाली सरकार कभी नहीं रही। ये एक (जनता, 1977) और आधी (वीपी सिंह, 1989-90) सरकारें भी अल्पकालीन रहीं। 1980 में इंदिरा गांधी भी ‘खिचड़ी सरकार’ और राष्ट्रवाद के नारे से लौटीं। ‘छोटे पड़ोसी देश भी आंखें दिखा रहे हैं हमें,’ का विनाशक असर हुआ।
भारतीय मतदाता बाह्य या आंतरिक सुरक्षा पर भ्रमित दृष्टिकोण कभी स्वीकार नहीं करता। नक्सलियों को दूरवर्ती कुछ जिलों और रूमानी विचारकों को छोड़कर कहीं समर्थन नहीं है। उनके प्रति सौम्यता आपको कहीं का नहीं छोड़ेगी। सौम्य हिंदुत्व-सौम्य राष्ट्रवाद आत्म-घाती राजनीतिक स्किजोफ्रेनिया है। यदि राहुल गांधी सिर्फ मोदी की ‘नाकामियों’ की सूची पेश करने की बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में नज़रिया नहीं सुधारते, तो वे अपने दल को 2019 का चुनाव भाजपा की शर्तों पर लड़ने को मजबूर करेंगे और उन्हें तोहफे में दूसरा कार्यकाल दे देंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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