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सिनेमा के परदे पर तो हीरो, हकीकत में जीरो- शेखर गुप्ता

हिंदी सिनेमा क्रिकेट से भी अधिक धनी व सितारों वाला बिज़नेस है फिर भी यह इतना डरा हुआ क्यों है?

शेखर गुप्ता | Last Modified - Jul 10, 2018, 01:51 AM IST

सिनेमा के परदे पर तो हीरो, हकीकत में जीरो- शेखर गुप्ता
हिंदी सिनेमा की शाश्वत कायराना मुद्रा से मुझे 1971 की हेमा मालिनी-संजीव कुमार अभिनीत मेगा हिट फिल्म ‘सीता और गीता’ के लिए आनंद बख्शी का लिखा यह गीत याद आ गया ‘हवा के साथ-साथ, घटा के संग-संग ओ साथी चल।’ विधु विनोद चोपड़ा-राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘संजू’ में संजय दत्त को भोलेभाले पीड़ित, खासतौर पर कुछ बदमाश पत्रकारों द्वारा पीड़ित दिखाकर बेईमानी की गई है। देश के सबसे बड़े, प्रतिभाशाली और सफल फिल्म निर्माता सत्ता की इतनी चापलूसी क्यों करते हैं? जब हॉलीवुड में रॉबर्ट डी नीरो सार्वजनिक रूप से डोनाल्ड ट्रम्प को गरिया चुके हैं, तो देश के सबसे बड़े निर्माताओं को राज ठाकरे का आभार जताकर नई परम्परा क्यों शुरू करनी पड़ रही है?
यह आदमी है कौन? वे महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों में से वे एक से ज्यादा सीट नहीं जीत सकते। जवाब आसान है। वे जीत तो कुछ सकते नहीं पर नष्ट बहुत कुछ कर सकते हैं। तो पंगा क्यों लिया जाए? यह हमारे समाज का रोचक पहलू है कि हमारा रचनाधर्मी वर्ग सत्ता के साथ रहना चाहता है। कुछ विद्वानों, चित्रकारों और मीडिया के कुछ लोगों को छोड़ दें तो रचनात्मक व लोकप्रिय संस्कृति के क्षेत्रों के ज्यादातर नेता ऐसे व्यक्ति की खुशामद करके खुश होते हैं, जिसके पास सत्ता हो। सप्ताहांत पर कई सौ करोड़ की रिलीज और अरबों डॉलर के स्टूडियो वाला हिंदी सिनेमा इतना गरिमाहीन व्यवहार क्यों करता है?
इसका मूल हमारी दरबारी संस्कृति में है। राजा- महाराजा कला व संस्कृति के संरक्षक बन गए। अपनी प्रतिभा से पैसा कमाने और सम्मान व प्रसिद्धि हासिल करने के लिए आपको दरबारी संगीतकार, नर्तक या चित्रकार होना पड़ता था। राजघरानों की जगह ‘भारत सरकार’ ने ले ली। सरकार अनुदान, छात्रवृत्ति, विदेशी दौरे, दिल्ली में बंगले और पद्‌म अलंकरण देती। जो लोग सबसे ज्यादा अमीर और शक्तिशाली हैं, वे ही सबसे अधिक रीढ़हीन हैं। इसकी शुरुआती आग वामपंथियों की पहली पीढ़ी के साथ लुप्त हो गई। 83 वर्षीय गीतकार और कवि गुलजार उन चुनिंदा वामपंथियों में से हैं, जिन्होंने रीढ़ दिखाई है। पिछली कई पीढ़ियों में से गिने-चुने सितारे ही राजनीति में शामिल हुए। अमिताभ बच्चन ने तीन साल के भीतर राजनीति छोड़ दी। उन्होंने कभी एक शब्द ऐसा नहीं बोला जो सत्ता में बैठे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ हो। हालिया कठुआ और उन्नाव मामलों में हमने देखा कि कैसे गरिमामय चुप्पी उनका मंत्र बन गया है।
यदि शीर्ष फिल्मकार इतने पाखंडी नहीं होते तो भी शिकायत न होती। हिरानी ने थ्री इडियट्स, पीके और मुन्ना भाई शृंखला में जबर्दस्त सामाजिक संदेश दिया है। चोपड़ा ने मिशन कश्मीर से हमें देशभक्ति का पाठ पढ़ाया और फिल्म में उनके नायकों ने जब उनके गृह राज्य में आईएसआई की साजिश को खत्म किया तो हमने उनके काम को सराहा। लेकिन, जिस शहर में वे रहते हैं उसमें उन्होंने आईएसआई को आसानी से ‘जाने’ दिया। संजू को आकर्षक लेकिन, गड़बड़ चरित्र दिखाने की बजाय भोला-भाला शिकार दिखाना ‘आम जनता’ के हिसाब से ठीक था। फिर दाऊद इब्राहिम का भाई अनीस (जिसे संजय दत्त ने राइफल, ग्रेनेड और हथियार पाने वाले दिन छह बार फोन किया था) और माफिया अभी भी ज़िंदा हैं और कराची से अपना साम्राज्य चला रहे हैं। ऐसे में पंगा क्यों लेना? बड़े सितारों के पास तो सीधा-सा बहाना है। उनका काफी कुछ दांव पर लगा रहता है। आमिर खान ने एक बार बोलने की ‘गलती’ की थी, जिसकी कीमत उन्हें सबसे बड़ी स्पॉन्सरशिप छोड़कर चुकानी पड़ी। शाहरुख खान ने कम से कम कई फिल्मों में मुस्लिम नाम वाले किरदार निभाकर खामोशी से विरोध दर्ज कराया है। वहीं सलमान ने पूरा ध्यान सबका दिल जीतने वाले अच्छा हिंदू किरदार निभाने में लगाया।
अब हिंदी सिनेमा पर ‘ओपनिंग’ का जुनून सवार है, नए विचारों की कमी है। जहां सामाजिक रूप से प्रासंगिक विषयों पर कुछ फिल्में बनी है पर प्राय: यहां सुपरहीरो ही छाया रहता है। ‘संजू’ को लेकर मैं यह शिकायत नहीं कर रहा हूं कि यह पत्रकारों को गरियाती है। मैं पत्रकारों के लिए सिनेमा की नफरत समझ सकता हूं, क्योंकि फिल्मकार आसानी से प्रमुख समाचार-पत्रों और टेलीविजन चैनलों पर समय और स्थान खरीद सकते हैं, समीक्षकों की स्टार रेटिंग बदलवा सकते हैं। मेरा कहना केवल यह है कि इससे 1993 के बम धमाकों का इतिहास नहीं बदल जाएगा। शक्तिशाली फिल्मी दुनिया बदलाव की वाहक हो सकती है और गरीबों, वंचितों और अल्पसंख्यकों के बचाव में मददगार हो सकती है। लेकिन वह सरकार, राज ठाकरे या दाऊद इब्राहिम जैसे शक्तिशाली वर्ग के सामने झुककर ऐसा नहीं कर सकती। वह सामाजिक पूर्वग्रहों तक को चुनौती नहीं देगी। हिंदी सिनेमा के शीर्ष 10 सितारों में से किसी ने लंबे समय से दलित या संकटग्रस्त किसान की भूमिका तक नहीं निभाई है। दक्षिण भारत के सुपरस्टार रजनीकांत यह काम गर्व और रुतबे के साथ कर सकते हैं।
याद रहे कि यही फिल्मी दुनिया ‘भाइयों’ के सामने दंडवत हो चुकी है। उन्होंने विरोध-मार्च निकालते हुए प्रधानमंत्री से मुलाकात नहीं की। उन्होंने गैंगस्टरों से सुलह कर ली। बाद में जब मुंबई पुलिस के निशानेबाजों ने गैंगस्टर्स को निशाना बनाना शुरू किया तो ये उनका गुणगान करने लगे। मैंने ‘वॉक द टाक’ में इनमें से दो सब इंस्पेक्टरों दया नायक और प्रदीप शर्मा पर कार्यक्रम किए थे। नायक ने बताया कि कैसे नायकों के महानायक ने उनके गांव में उनकी मां के नाम पर बने अस्पताल के लिए धन दिया था। लेकिन, जब पुलिस के यही नायक अदालती चक्करों में फंसे, निलंबित हुए और पकड़े गए (बाद में रिहा भी हुए) तो किसी ने उनकी मदद नहीं की।
सौभाग्य से अब एक नई आशा जगी है। फिल्म जगत के कई नए लोग अपने दिल की बात कहने और सत्ता से सवाल पूछने में हिचकते नहीं हैं। ऐसे लोग बढ़ रहे हैं और सफल हो रहे हैं। हालांकि, अभी वे शीर्ष सितारे नहीं बने हैं लेकिन, कुछ उस ओर बढ़ रहे हैं। उनकी प्रभावी और बढ़ती मौजूदगी है। इस बीच शीर्ष पर शेष लोग हवा के साथ चलते रह सकते हैं हवा के साथ-साथ, घटा के संग-संग…
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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