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महाभारत -2019 विश्लेषण: सिद्धारमैया को लिंगायत वोटों का दांव उलटा पड़ा

2019 के आम चुनाव के लिए कर्नाटक चुनाव से पहला सबक तो यही है कि भाजपा का मुकाबला अकेली कांग्रेस कतई नहीं कर सकती।

Danik Bhaskar | May 16, 2018, 03:11 AM IST
वेदप्रताप वैदिक। वेदप्रताप वैदिक।
कर्नाटक में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और कांग्रेस की लगभग पचास सीटें घट गईं, यह नरेंद्र मोदी की पगड़ी में नया मोर-पंख है। इस चुनाव को जीतने के लिए भाजपा ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष ने पूरा जोर लगा दिया। अमित शाह ने कर्नाटक का चप्पा-चप्पा छान मारा। 57 हजार किमी की यात्रा की। कर्नाटक का चुनाव 2019 के आम चुनाव का पूर्वाभ्यास था। यदि भाजपा को 130 सीटें मिल जातीं तो भाजपा दावा करती कि 2019 का चुनाव तो जीता-जिताया है लेकिन, कर्नाटक के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए सबक है। गुजरात में जान और कर्नाटक में इज्जत बची तो इसके मायने क्या हैं? एक ही संदेश है कि 2019 का रास्ता कांटों भरा है। यह ठीक है कि उसे कांग्रेस से डेढ़ी सीटें मिली हैं लेकिन, सवाल यह है उसे वोट कितने मिले हैं? दोनों पार्टियों का आंकड़ा 35-36 प्रतिशत के आस-पास है। उसके उम्मीदवार काफी कम वोटों से जीते हैं।
यह आंकड़ा उलट भी सकता था बशर्ते कांग्रेस के पास कोई जबर्दस्त नेता होता। फिकरेबाजी में नरेंद्र मोदी को राहुल गांधी मात दें, यह संभव ही नहीं है। स्तरहीन बहस और दोनों की नौटंकियों ने कर्नाटक के चुनाव को एक अलग श्रेणी में ले जा बिठाया। दोनों ने मंदिरों और साधु-संतों के जैसे फेरे लगाए, उसने धर्मनिरपेक्ष राजनीति के धुर्रे बिखेर दिए। सिद्धारमैया का लिंगायत वोटों को पटाने का पासा उलटा पड़ गया। चुनाव में सिद्धांतों, विचारों और नीतियों पर बहुत कम बहस हुई। यह देश के लिए चिंता का विषय है।
इस चुनाव ने भारतीय राजनीति के गहरे चरित्र को भी उजागर किया। सिद्धारमैया और येदियुरप्पा तो किनारे लग गए। सामने आ गए मोदी और राहुल! भारतीय राजनीति एकायामी होती जा रही है। उसमें से द्वंद्वात्मकता घटती चली जा रही है। कांग्रेस में भी सिर्फ एक आवाज है और भाजपा में भी। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
यह कहना तो और भी खतरनाक है कि भारत अब कांग्रेसमुक्त हो रहा है। कांग्रेस का राज आज चाहे पंजाब, पुडुचेरी और मिजोरम में सिमट गया है लेकिन, आज भी देश का शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जिसमें कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ता न हों। किसी भी देश को जोड़े रखने के लिए किसी एक विशाल राजनीतिक दल की बेहद जरूरत होती है। सरकारें सिर्फ कर्मचारियों को जोड़े रखती हैं लेकिन पार्टियां आम लोगों को बांधे रखती हैं। सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के बिखरते ही सोवियत संघ के टुकड़े-टुकड़े हो गए या नहीं? भाजपा देश के गांव-गांव में फैल जाए तो उसका स्वागत है लेकिन किसी समांतर विरोधी दल का जिंदा रहना भी लोकतंत्र की पहली आवश्यकता है।
यह तथ्य कर्नाटक के बाहर बहुत कम लोगों को पता है कि देवेगौड़ा की पार्टी किसी भी हालत में सिद्धारमैया का समर्थन नहीं करती, क्योंकि सिद्धारमैया कभी देवेगौड़ा के चेले रहे हैं, उनकी पार्टी में रहे हैं और उनके विरुद्ध बगावत भी कर चुके हैं। अब कांग्रेस ने यदि जनता दल (एस) को समर्थन देने की घोषणा कर दी है और कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाना स्वीकार कर लिया है तो इसका वे स्वागत क्यों नहीं करेंगे? 2019 के चुनाव में देवेगौड़ा प्रधानमंत्री पद के सशक्त उम्मीदवार बन सकते हैं। एक दक्षिण भारतीय पूर्व प्रधानमंत्री के नाम पर सारे विरोधी दलों का एका होना कठिन नहीं है। यह लिखे जाने तक साफ नहीं था कि भाजपा को बहुमत मिलता है या नहीं पर यदि नहीं मिलता है तो उसे विरोधी दल की तरह गरिमामय ढंग से पेश आना चाहिए। यदि कर्नाटक में उसने वही किया, जो गोआ और मणिपुर में किया तो 2019 की रणनीति भी प्रभावित होगी।
2019 के आम चुनाव के लिए कर्नाटक चुनाव से पहला सबक तो यही है कि भाजपा का मुकाबला अकेली कांग्रेस कतई नहीं कर सकती। यदि देश के विरोधी दलों को भाजपा का मुकाबला करना है तो उन्हें प्रांतीय स्तरों पर विभिन्न दलों का गठबंधन बनाना होगा, जैसा कि अखिलेश और मायावती के बीच उत्तरप्रदेश में बन रहा है। यदि कांग्रेस और जनता दल (एस) मिलकर चुनाव लड़ते तो कर्नाटक में भाजपा को शायद एक-तिहाई सीटें भी नहीं मिलतीं। यूं भी 2014 में भाजपा को सिर्फ 31 प्रतिशत वोट मिले थे। दूसरा, अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल पर 2019 के चुनाव के बाद ही विचार किया जाए। कर्नाटक में कुमारस्वामी का नाम अपने आप उभरा या नहीं ? तीसरा, देश की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और विषमता दूर करने के लिए सभी विरोधी दलों को ठोस, व्यावहारिक और समयबद्ध कार्यकम लेकर सामने आना चाहिए। सिर्फ चुनाव जीतना ही काफी नहीं है, देश की शक्ल बदलना जरूरी है।