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एकसाथ सभी चुनाव का विचार आकर्षक पर अमल में कठिन- भास्कर संपादकीय

भारतीय लोकतंत्र की 70 साल की यात्रा के बाद यह विचार कुछ वैसा ही लगता है जैसे देश की सारी नदियों को जोड़ देने का विचार।

Danik Bhaskar | Jul 10, 2018, 02:32 AM IST
- फाइल - फाइल

देश का धन और मानव संसाधन बचाने और विकास का काम निरंतर जारी रखने के लिए लोकसभा और विधानसभा का चुनाव साथ-साथ कराने का विचार जितना आकर्षक है उसे अमल में लाने के लिए आम राय बनाना उतना ही कठिन है। भारतीय लोकतंत्र की 70 साल की यात्रा के बाद यह विचार कुछ वैसा ही लगता है जैसे देश की सारी नदियों को जोड़ देने का विचार। इस विचार को लागू करने के लिए संविधान में जितने व्यापक स्तर पर संशोधन करने होंगे वह आपातकाल के 42वें संशोधन जैसे व्यापक प्रभाव का होगा।

भारत जैसे बहुवचन वाले देश में सरकारों का बनना और गिरना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी में जनाक्रोश कभी राज्य के स्तर पर व्यक्त होता है तो कभी केंद्र के स्तर पर। एक साथ चुनाव के कड़े कानून के चलते संघीय ढांचे का यह लचीलापन खत्म हो जाएगा। यही कारण है कि विधि आयोग के साथ इस विषय पर हुई बैठक में महज चार पार्टियों ने इसका समर्थन किया और नौ दलों ने विरोध। भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों ने भले स्पष्ट राय नहीं दी है लेकिन ,परोक्ष रूप से भाजपा समर्थन में तो कांग्रेस विरोध में है।

1967 से पहले 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न हुए थे, लेकिन 1967 के बाद से यह तालमेल ऐसा बिगड़ा कि ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा। वहीं से भारतीय राजनीति में गठबंधन का दौर शुरू हुआ। नतीजतन जो राष्ट्रीय राजनीति राज्यों की राजनीति को हाशिये पर रखती थी उस पर राज्यों की राजनीति हावी हो गई। केंद्र में किसकी सरकार बनेगी इसका फैसला क्षेत्रीय स्तर पर होने लगा। आज अगर फिर राष्ट्रीय दौर में लौटने के लिए पार्टियों को फुसलाया जा रहा है तो इसके पीछे भाजपा की राजनीतिक सोच भी है।

वह मानती है कि वह 1967 के पहले वाली कांग्रेस की तरह राष्ट्रीय मुद्दों से क्षेत्रीय किले फतह कर लेगी। जो दलीलें दी गई हैं उनमें एक यह है कि चुनाव के दौरान वोट के लिए जिस तरह की तल्ख बहसें होती हैं उससे सामाजिक ताना-बाना टूटता है। यह गंभीर दलील एक साथ चुनाव नहीं, राष्ट्र निर्माण और लोकतंत्र के मूल्यों के समक्ष पार्टियों के अहम के विसर्जन और सर्वानुमति की मांग करती है। आखिर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कौन सा रोज चुनाव हो रहा है, जो सीएम और एलजी में महाभारत मचा है। इसलिए सवाल नीयत का है, नीति तो अपने आप बन जाएगी।