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नौसेना की 6 महिला अफसरों का दुनिया का सफर पूरा, 254 दिन बाद आज लौटेंगीं भारत

3 वर्ष पहले
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  • महिला अफसरों की टीम ने सफर के दौरान 140 किमी/घंटे रफ्तार की हवाओं का सामना किया
  • गोवा के तट पर रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण नौसेना की 6 महिला अफसरों का स्वागत किया

 

नई दिल्ली.  नौसेना की 6 जांबाज महिला अफसर समुद्र के रास्ते दुनिया का चक्कर लगाकर सोमवार को गोवा तट पर पहुंचीं। यहां रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने इनका स्वागत किया। इस टीम ने आईएनएस तारिणी से पिछले साल 10 सितंबर को परिक्रमा शुरू की थी। लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी की अगुवाई में टीम ने 254 दिन में 26 हजार समुद्री मील का सफर तय किया। इस दौरान 140 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार वाली हवाओं और 10-10 मीटर ऊंची लहरों ने उनका रास्ता रोका, पर लड़कियों का हौसला नहीं डिगा। भास्कर ने उनसे बात कर अनुभव, चुनौतियां, रोमांच... हर पहलू को टटोला। ये बातचीत वॉट्सएेप चैट पर हुई।

 

हिम्मत: पता था कि लड़का हो या लड़की, समंदर अलग ट्रीटमेंट नहीं देता...

- 55 फीट की बोट पर सवार होकर हम समंदर की लहरों पर निकले थे। ट्रेनर कमांडर दिलीप डोंडे ने एक नसीहत दी थी, जो पूरे सफर में काम आई।

- उन्होंने कहा था- ‘बोट पर चढ़ने से पहले अपना जेंडर बाहर छोड़कर जाना। नाव और समंदर ये नहीं जानता कि तुम लड़की हो या लड़का। तुम्हारे साथ अलग ट्रीटमेंट नहीं करेगा।’ बस जबसे यह सोच लिया, सफर आसान हो गया। 

 

टीम में शामिल हैं ये नौसेना की 6 महिला अफसर

- लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी, उत्तराखंड 

- लेफ्टिनेंट.कमांडर प्रतिभा जामवाल, हिमाचल

- लेफ्टिनेंट कमांडर पी स्वाति, विशाखापत्तनम

- लेफ्टिनेंट एश्वर्या बोड्डापटी, हैदराबाद

- लेफ्टिनेंट विजया देवी, मणिपुर

- लेफ्टिनेंट पायल गुप्ता, उत्तराखंड

 

संकल्प: जो बोट का व्हील संभालता, उसके हाथ की अंगुलियां जम जाती थीं
- 140 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से हवाएं चलती थीं। 10 मीटर ऊंची लहरें उठती थीं। बोट हिचकोले खा रही थी, लेकिन हौसला नहीं खोया। दक्षिण अफ्रीका के पास केप आॅफ होर्न में तो लगातार 3 दिन तूफान में फंसे रहे। मौसम बेहद ठंडा था। जो भी बोट का व्हील संभालता, उसकी हाथ की अंगुलियां जम जाती थीं। 

 

भरोसा: बोट भी संभालनी थी, खाना भी बनाना था; टीमवर्क से सब हो गया
- बोट पर हमें सफाई, खाना पकाना, बर्तन मांजना सब खुद ही करना था। साथ में बोट तो कंट्रोल करनी ही थी। टीम वर्क से सब आसान होता गया। एक-दूसरे पर ऐसा भरोसा था कि कभी एक इंसान काम करता तो दूसरा बोट संभालता। ऐसा सभी बारी-बारी करते। कई बार तो 3-3 दिन तक हमारी आपस में बात ही नहीं होती थी। फिर भी हम जानते थे कि बोट की और हमारी क्या जरूरतें हैं।

 

जिद: अब वक्त है कि जंगी पोत पर भी महिलाओं की तैनाती होनी चाहिए
- सफर में जहां भी पड़ाव आया, हिंदुस्तानी लोग हमसे मिलने आए। सबने हमारी हिम्मत को सराहा। कई लोगों ने कहा कि वो अपने बच्चों को ऐसे काम के लिए भेजने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाते। अब वक्त है कि महिलाओं की जंगी पोत पर भी तैनाती होनी चाहिए, लेकिन इसके लिए वातावरण तैयार करना होगा। 

 

टाइम जोन बदलने से कभी उम्र एक दिन घट जाती, कभी एक दिन बढ़ जाती
- हर 7 से 10 दिन में हमारा टाइम जोन बदल जाता था। बदले हुए टाइम जोन के हिसाब से हमें बार-बार अपनी घड़ी भी एडजस्ट करनी पड़ती थी। कभी उम्र में एक दिन जुड़ जाता, कभी एक दिन कम हो जाता। ये हमारे लिए जिंदगी की अहमियत से जुड़ा सबक भी था। टीम ने पानी के बीच रहकर पानी की भी अहमियत समझी। एक बार तो पानी खत्म हो गया।

- बारिश का पानी इकट्ठा किया। उसे उबाला और उससे काम चलाया। अब यहां से जाकर हम समुद्र की शांति को मिस करेंगे। रात के समय किनारे पर खड़े होकर कभी हंसते, कभी समंदर को तो कभी तारों से लबरेज आसमान को निहारते। ऐसे में सब चुप हो जाती थीं। मौन बोलता था।

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