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बारात में लाइट उठाती मां के साथ पल्लू पकड़कर चलते गाना सीखा, खुद का आर्केस्ट्रा बनाकर वाघा बॉर्डर तक दे चुके परफॉर्मेंस

3 वर्ष पहले
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उज्जैन.  बारात में लाइट उठाने वाली मां की साड़ी का पल्लू पकड़कर चलने वाला बच्चा शहर का ख्यात गायक बन गया। नाम है मुकेश गौंड। अब इनका खुद का आर्केस्ट्रा है। इस बार रविदास जयंती पर भोपाल में हुए आयोजन में मुकेश के गीतों की मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सराहना की। मुकेश वाघा बॉर्डर पर जवानों की हौंसला अफजाई के लिए देशभक्ति गीतों की प्रस्तुति भी दे चुके हैं। वे स्लम बस्ती के बच्चों को मुफ्त संगीत सीखा रहे हैं ताकि वे भी अच्छे गायक बन सकें।  

 

 

घर में टीवी-रेडियो नहीं थे, मंदिर के बाहर भजन सुन की प्रैक्टिस

- हरसिद्धि मंदिर के पास एक स्लम बस्ती है। यहां गौंड जनजाति के लोग रहते हैं। इन्हीं में से एक है मुकेश गौंड। मुकेश के पिता मिश्रीलाल मजदूरी करते थे। मां शांति बरात में लाइट उठाकर चलती थी। जब मुकेश 5 साल का था, तभी से मां के साथ बारात में जाता था। यहीं पर वह बैंड वालों के साथ गाना सीख गया। 

- अभ्यास करने के लिए घर पर टीवी, रेडियो, टेप रिकार्डिंग नहीं था। मुकेश रोज सुबह हरसिद्धि मंदिर के बाहर जाकर बैठ जाता। यहां भजनों के सुर में सुर मिलाता, कुछ सालों में सुर सध गए। सुरों की पहचान भी हो गई।

 

बरात में लाइट उठाकर मिले 2 रुपए से गाने की किताब खरीदी 

 

- थोड़ा बड़ा हुआ तो बरात में खुद लाइट उठाकर चलने लगा। इससे मिली 2 रुपए मजदूरी से गाने की किताब खरीदी। इन गानों को घर पर बैठकर रट लिया। फिर बरात में बैंड वालों के साथ गाने लगा।

- कुछ समय बाद अकेले ही गाने का मौका मिल गया। इस काम में मुकेश को लाइट उठाकर चलने से ज्यादा रुपए मिलने लगे। इन पैसों को जोड़कर खुद की पढ़ाई का खर्च उठाया। 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। फिर खुद का आर्केस्ट्रा शुरू किया। 

 

बैंड संचालक नागदा ले गया, वहां मिली नई पहचान 

मुकेश की जिंदगी में बड़ा बदलाव नागदा से आया। जब वह 17 साल का था, बैंड संचालक उन्हें नागदा में एक शादी में गाने के लिए ले गया। यहां मुकेश ने जो गीत सुनाए, उससे बराती झूम उठे। इसके बाद मुकेश को नई पहचान मिली। अब उन्हें बैंड संचालक गाने के लिए अक्सर बुलाने लगे।  

 

भांजे को दे दिया आर्केस्ट्रा, बच्चों को मुफ्त पढ़ा भी रहे 
- साल 1999 में मुकेश की उज्जैन विकास प्राधिकरण में नौकरी लग गई। वे अब एलडीसी के पद पर कार्यरत हैं। बेहतर आर्थिक स्थिति के बाद भी मुकेश अपनी मुफलिसी के दिन नहीं भूले हैं। उन्होंने अपना आर्केस्ट्रा जरूरतमंद बच्चों को समर्पित कर दिया। भांजे अनिल को गायिकी सिखाई और आर्केस्ट्रा सौंप दिया।

-  अब ऑर्केस्ट्रा में अनिल गायक, दीपक केसियो कलाकार, संदीप ढोलक वादक, लोकेश हारमोनियम बजाते हैं। पूरी टीम हर महीने 20 से 30 हजार रुपए कमा लेती हैं। मुकेश गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाने के अलावा गाना सीखा भी रहे हैं, ताकि वे भी गायिकी में नाम कर सकें।  

 

 

अब साल में दो बार एक शाम शहीदों के नाम 
15 साल से गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर एक शाम शहीदों के नाम...कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। वह शहीद पार्क पर देशभक्ति गीत सुनाते थे। इसे लोग काफी पसंद कर रहे हैं।

 

 

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