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वकील पिता किसी आरोपी की पैरवी कर रहे हों तो क्या प्रेसर में उसे बेल देंगी, इसका जवाब देकर सोनल बनीं सिविल जज टॉपर

3 वर्ष पहले
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भोपाल/रायसेन. हाईकोर्ट सिविल जज ग्रेड-II की परीक्षा में बेगमगंज की रहने वाली सोनल गुप्ता ने प्रदेश में टॉप रैंक हासिल की। सोनल एडवोकेट राजकुमार गुप्ता की बेटी हैं। वे कहती हैं कि 12वीं पास करने के बाद पिता ने उसने जज की कुर्सी पर बैठा देखने की इच्छा जाहिर की थी। इसी सपने को पूरा करने के लिए इंदौर में रहकर टारगेट स्टडी की और दूसरे अटैम्प्ट में सिविल जज एग्जाम में टॉप किया। 

- बता दें कि सोनल गुप्ता का इंटरव्यू 4 मई को हुआ था, जिसे दो जजों के पैनल ने लिया। उनके पैनल में जस्टिस सुजॉय पॉल, जस्टिस जेपी गुप्ता थे। 17-18 मिनट के इंटरव्यू में उनसे जो सवाल पूछे गए, उसका सटीक जवाब देकर सोनल ने सिविल जज ग्रेड-2 में पूरे प्रदेश में टॉप किया। उनके परिवार में उनकी बहन रुपल और भाई उद्भव भी लॉ की पढ़ाई कर रहे हैं। 

 

इंटरव्यू में पूछे गए सवाल - 

सवाल - आप जज हैं और पिता किसी आरोपी की पैरवी कर रहे हों तो क्या उसे बेल देंगी ? 
जवाब - पापा वकील होकर किसी आरोपी को बचाने की पैरवी करेंगे तो मैं उस केस को कानून के अनुसार, सुनवाई करुंगी और निर्णय दूंगी। जस्टिस सिर्फ दिखाई नहीं देना चाहिए, वास्तव में लगना भी चाहिए। 

सवाल - वह कौन से जज हैं, जिन्होंने लोकतंत्र और मूल अधिकारों की रक्षा के लिए अपना कैरियर दांव पर लगा दिया ? 
जवाब - सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एचआर खन्ना थे, जिन्होंने लोगों के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए अपना कैरियर दांव पर लगा दिया। उन्होंने आपातकाल के दौरान (हेबियस कॉर्पस) बंदी प्रत्यक्षीकरण के मामले में एकमात्र जज थे, जिन्होंने अलग निर्णय दिया, जिससे उनकी मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी छिन गई थी। 

सवाल - जस्टिस एचआर खन्ना की ऑटोबॉयोग्राफी का नाम बताईए ?
जवाब - उनकी ऑटोबॉयोग्राफी का नाम है, "नाइदर द रोजेस नॉर द थॉर्न" नाम था। ये उनकी साहसिक जिंदगी का दस्तावेज है। 

सवाल - बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) से जुड़ा मामला कहां से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था ? 
जवाब - एडीशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (एडीएम) जबलपुर वर्सेस शिवकांत शुक्ला केस मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर से ही सुप्रीम कोर्ट रेफर किया गया था। 


क्या है हेबियस कॉर्पस 
-इंदिरा गांधी सरकार ने इमर्जेंसी लगाकर सभी फंडामेंटल राइट्स छीन लिए थे, इसमें लोगों को कोर्ट भी नहीं जाने दिया जा रहा था। जबकि हर एक को न्याय का अधिकार है। ऐसे में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो दूसरे जज केस के विरोध में थे, जबकि जस्टिस एचआर खन्ना ने न्याय के अधिकार को बनाए रखने के पक्ष में रहे। इससे वह चीफ जस्टिस नहीं बन पाए थे। 

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