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पाकिस्तान से पानी की तलाश में छिपते-छिपाते भारत पहुंचे थे, प्यास से तड़पकर हुई थी मौत, ऐसी है लैला-मजनूं की कहानी

दोनों की इस प्रेम कहानी व कब्रों का राज यहां आजादी के बाद खुला फिर 1960 के बाद से यहां मेला भरने लगा, जो आज तक जारी है।

Dainik Bhaskar

Sep 08, 2018, 03:29 PM IST
हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने यहां का नाम भी अलग रखा हुआ है। मुस्लिम इसे लैला-मजनू की मजार कहते हैं तो हिंदू लैला-मजनूं की समाधि कहकर पूजते हैं। हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने यहां का नाम भी अलग रखा हुआ है। मुस्लिम इसे लैला-मजनू की मजार कहते हैं तो हिंदू लैला-मजनूं की समाधि कहकर पूजते हैं।

लाइफस्टाइल डेस्क. आज डायरेक्टर इम्तियाज अली के भाई साजिद अली के निर्देशन में बनी फिल्म लैला-मजनूं रिलीज हुई है लेकिन इनकी स्टोरी की सच्चाई बहुत कम लोग जानते हैं। दोनों की कब्र श्रीगंगानगर में हैं। हर साल 15 जून को लैला-मजनूं की याद में अनूपगढ़ (श्रीगंगानगर, राजस्थान) के बिंजौर में सालाना मेला लगता है। पूरे देश के हजारों प्रेमी जोड़े यहां आकर चादर चढ़ाते हैं और मन्नते मांगते हैं।

आखिर इस मेले की शुरुआत भारत-पाक सीमा पर बसे बिंजौर गांव से हुई कैसे? लैला-मजनूं का इस गांव से रिश्ता क्या था? दोनों की मजार यहां बनी कैसे? लैला-मजनूं आखिर हिंदुस्तान आए कैसे? इनके जवाब जानने के लिए भास्कर टीम ने 15 दिन तक इंटरनेट पर कई साइट्स खंगाली, इतिहासकारों से बातचीत की। बिंजौर गांव जाकर वहां के बुजुर्गों तथा उस समय के बीएसएफ में रहे अधिकारियों से बात की। ज्यादातर लोगों का मत है कि उस समय पाकिस्तान में जन्मे लैला-मजनूं अंतिम समय में अनूपगढ़ के बिंजौर गांव ही आए थे। लैला के भाई दोनों को मारने के लिए उनके पीछे पड़े हुए थे। दोनों छिपते-छिपाते पानी की तलाश में यहां पहुंचे और दोनों की प्यास से ही मौत हो गई और यहीं दोनों को एक साथ दफना दिया गया। दोनों की इस प्रेम कहानी व कब्रों का राज यहां आजादी के बाद खुला फिर 1960 के बाद से यहां मेला भरने लगा, जो आज तक जारी है। जानते हैं उनकी पूरी कहानी...

लैला-मजनूं का जन्म 11वीं शताब्दी में हुआ
लैला-मजनूं 11 वीं शताब्दी में पैदा हुए थे। उस समय भारत-पाक एक ही थे। पाक स्थित सिंध प्रांत में मजनू का जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था। मजनूं का नाम कायस इब्न अल-मुलाव्वाह था। मान्यता है कि मजनूं के जन्म के समय ही ज्योतिषियों ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि इसे प्रेम रोग होगा और यह दर-दर भटका करेगा।

मदरसे में तालीम के दौरान इश्क हुआ
मदरसे में तालीम (पढ़ाई) के दौरान ही मुलाव्वाह को लैला नाम की एक लड़की से इश्क हो गया और लैला भी उसे चाहने लगी। मुलाव्वाह कविताओं में रुचि रखता था। ऐसे में अब वो जो भी कविता लिखता, सबमें लैला का जिक्र जरूर होता। मजनूं ने लैला के परिवार वालों से उसका हाथ मांगा, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया।

नाराज परिवार ने करवा दी लैला की शादी
लैला के परिवार ने उसकी शादी एक अमीर व्यापारी से करवा दी। लैला भी इस शादी से खुश नहीं थी और उसने अपने पति को मजनूं के बारे में सब बता दिया। खफा होकर पति कैफी ने उसे तलाक दे दिया और उसके पिता के घर छोड़ दिया। जब मजनूं ने लैला को फिर देखा तो दोनों घर से भाग गए।

लैला-मजनूं घर से भागे तो परिवार जान के प्यासा हो गया
लैला के मजनूं के साथ भागने का पता उसके परिवार को लगा तो उसके भाई गुस्सा हो गए और दोनों को ढूंढने लगे। वहीं, परिवार से डरते-डरते लैला-मजनूं दर-दर भटकने लगे। बताया जाता है कि भागते-भागते वे श्रीगंगानगर की अनूपगढ़ तहसील के गांव बिंजौर (6एमएसआर) में पहुंच गए। यहीं रेगिस्तानी क्षेत्र में पानी न मिलने से दोनों की मौत हो गई और लोगों ने उन्हें एक साथ दफना दिया।

ये है वो पहली कविता है, जो मजनूं ने लैला के लिए लिखी
"मैं इन दीवारों से गुजरता जाऊंगा, जिनसे लैला गुजरती है और मैं उस दीवार को चूमा करूंगा, जिनसे लैला गुजरती है
यह मेरे दिल में दीवारों के प्रति प्यार नहीं है, जो मेरे दिल को खुश करता है लेकिन जो उन दीवारों के पास से चलकर मेरा ध्यान आकर्षित करती है, उससे मुझे प्यार है।"

मजार में हिन्दू-मुस्लिम दोनों की आस्था, बस नाम अलग
लैला-मजनूं मजार में हिंदू और मुस्लिम दोनों की जबरदस्त आस्था है। दोनों समुदायों के लोग यहां आकर सिर झुकाते हैं और मन्नत मांगकर धागा बांधते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि दोनों समुदायों ने यहां का नाम भी अलग रखा हुआ है। मुस्लिम इसे लैला-मजनूं की मजार कहते हैं तो हिंदू लैला-मजनूं की समाधि कहकर पूजते हैं। पांच दिन के इस मेले में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार समेत कई राज्यों से प्रेमी जोड़े यहां मन्नतें मांगने आते हैं।

बीएसएफ भी देती है दोनों को सम्मान, सीमा चौकी का नाम पर भी मजनूं पर

  • देश में बीएसएफ की संभवत: यहां पहली सीमा चौकी है, जो प्यार करने वालों के नाम पर बनी है। सीमा पर बसे इस गांव में बीएसएफ की सीमा चौकी का नाम पहले लैला-मजनू था, जिसका नाम बाद में मजनूं कर दिया गया।
  • पहले यहां पाकिस्तान से बड़ी संख्या में प्रेमी आया करते थे, लेकिन भारत-पाक में मतभेद बढ़े तो यहां तारबंदी कर दी गई और वहां से प्रेमियों का यहां आना भी बंद हो गया।

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1960 का फोटो जहां दोनों की हुई थी मौत। 1960 का फोटो जहां दोनों की हुई थी मौत।
लैला-मजनूं मजार में हिंदू और मुस्लिम दोनों की जबरदस्त आस्था है। दोनों समुदायों के लोग यहां आकर सिर झुकाते हैं और मन्नत मांगकर धागा बांधते हैं। लैला-मजनूं मजार में हिंदू और मुस्लिम दोनों की जबरदस्त आस्था है। दोनों समुदायों के लोग यहां आकर सिर झुकाते हैं और मन्नत मांगकर धागा बांधते हैं।
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हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने यहां का नाम भी अलग रखा हुआ है। मुस्लिम इसे लैला-मजनू की मजार कहते हैं तो हिंदू लैला-मजनूं की समाधि कहकर पूजते हैं।हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने यहां का नाम भी अलग रखा हुआ है। मुस्लिम इसे लैला-मजनू की मजार कहते हैं तो हिंदू लैला-मजनूं की समाधि कहकर पूजते हैं।
1960 का फोटो जहां दोनों की हुई थी मौत।1960 का फोटो जहां दोनों की हुई थी मौत।
लैला-मजनूं मजार में हिंदू और मुस्लिम दोनों की जबरदस्त आस्था है। दोनों समुदायों के लोग यहां आकर सिर झुकाते हैं और मन्नत मांगकर धागा बांधते हैं।लैला-मजनूं मजार में हिंदू और मुस्लिम दोनों की जबरदस्त आस्था है। दोनों समुदायों के लोग यहां आकर सिर झुकाते हैं और मन्नत मांगकर धागा बांधते हैं।
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