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मंडे पॉजीटिव: दर्द जीवन की प्रेरणा और ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ मेरी सोच

पीठ और टखने के दर्द से मनोबल कमजोर होने लगता तो घर के हालात की याद निराशा से उबार लेती

Danik Bhaskar | Sep 09, 2018, 10:41 PM IST
स्वप्ना बर्मन स्वप्ना बर्मन

दर्द मेरे लिए हमेशा प्रेरणा रहा है, वह चाहे मेरी इंजरी की तकलीफें हों या जीवन के हालात से मिला दर्द हो। मेरी सफलता में संघर्ष की एक लंबी दास्तान है। कद, जूते, डाइट और प्रैक्टिस के लिए मैदान तक, हर जगह मुझे घोर संघर्ष करना पड़ा। मेरे पिता पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के एक छोटे से गांव घोसपुरा में रिक्शा चलाते थे। मां चाय बागान में पत्ती तोड़ने का काम करती, इसी से हमारा घर चलता। आज भी घर की चारदीवारी पक्की नहीं है। बस मैंने घर में काली मां का एक पक्का मंदिर बनाया है। करीब सात साल पहले पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए और बिस्तर पकड़ लिया। अब मां पर दोहरी जिम्मेदारी आ गई, जो उन्होंने पूरी शिद्दत से निभाई। जाहिर है मैंने आज जो भी मुकाम हासिल किया है, उसमें मां की सबसे बड़ी भूूमिका है।
मैं चौथी कक्षा में पढ़ती थी, तभी मुझे लंबी कूद, ऊंची कूद और फुटबॉल खेलना अच्छा लगने लगा था। धीरे-धीरे हाई जंप मेरा पसंदीदा खेल हो गया। 2011 में जलपाईगुड़ी के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में ट्रायल के लिए गई पर मुझे कद छोटा (पांच फीट तीन इंच) होने के चलते नकार दिया गया। लेकिन, मैं निराश नहीं हुई, लगी रही और 2012 के स्कूल गेम्स में हाई जंप में मैंने पहला स्थान हासिल किया तो सुभाष सरकार सर ने मुझे ट्रेनिंग के लिए चुन लिया लेकिन, फिर भी मुझे कोई खास ट्रेनिंग नहीं दी गई। 2013 में सर ने मुझे कोलकाता स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) के नेताजी सुभाष ईस्टर्न सेंटर में शिफ्ट होने के लिए कहा। यहां आना मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
जब तक गांव में थी और सारा दिन मैदान में प्रैक्टिस करती थी तो गांव वाले बोलते, घर में रहाकर, काली हो जाएगी, कोई शादी भी नहीं करेगा। और ये पक्की बात है कि यदि गांव में रहती तो मेरे मां-बाप मेरा कितना भी सपोर्ट करते लेकिन, फिर भी समाज के दबाव में अब तक मेरी शादी कर दी गई होती। कोलकाता सेंटर में आकर मुझे अहसास हुआ कि एक लड़की भी खेल को फुलटाइम कॅरिअर चुन सकती है। इसका तत्काल फायदा यह हुआ कि मेरी ट्रेनिंग सहित सभी खर्चों का बोझ मेरी मां के कंधों से हट गया। भारतीय खेल प्राधिकरण के परिसर में आने पर सर ने मुझे हाई जंप से हैप्टाथलॉन में आने का सुझाव दिया। मैंने नेशनल जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और हैप्टाथलॉन में दूसरे स्थान पर रही। कभी पीठ, कभी टखने, कभी घुटने की चोट मुझे परेशान करती रही और पैर का स्थायी दर्द तो मेरे जीवन का हिस्सा ही बन गया लेकिन, मुझे ऐसे दर्द की आदत-सी हो गई। पैर की समस्या तो बहुत विचित्र है, मेरे दोनों पैरों में छह-छह अंगुलियां हैैं।
मैंने तमाम ब्रांड के जूते ट्राय किए पर कोई भी मुझे फिट नहीं आता। पांच नंबर का जूता फंसता है और छह नंबर का जूता ढीला आता है। छठी अंगुली के फंसे रहने से पैर में दर्द बना रहता है। मैंने भी तय किया है कि छठी अंगुली को हटाने के लिए सर्जरी नहीं कराऊंगी, बल्कि प्रयास करूंगी कि कोई मेरे लिए कस्टमाइज जूते बना दे। अभी तो मेरे जूते दर्द तो देते ही हैं, जल्दी फट भी जाते हैं। बहरहाल, इसी कश्मकश के बीच 2014 में इंचियान, साउथ कोरिया में हुए एशियन गेम्स में सबसे छोटी हैप्टाथलॉन एथलीट के रूप में मैंने हिस्सा लिया और पांचवें पायदान पर आई। पिछले साल एशियन चैंपियनशिप और फेडरेशन कप दोनों में मैंने गोल्ड हासिल किया। बीच-बीच में चोट लगती रही और मैं उससे उबरती रही। इसी दौरान मैंने कोलकाता यूनिवर्सिटी में बैचलर इन फिजिकल एजुकेशन की पढ़ाई शुरू कर दी। अभी मेरे थर्ड ईयर का रिजल्ट आने वाला है।
मुझे दो महीने पहले जून से पीठ और टखने में नई इंजरी आ गई। मुंबई-दिल्ली तक इलाज के लिए गई, दर्द कुछ कम हुआ पर हटा नहीं। मेरे संगी-साथी कहने लगे थे कि अब क्या मेडल लाएगी? कभी-कभी मेरा मनोबल भी कमजोर होने लगता लेकिन, फिर मुझे अपने घर के हालात और मां-बाबा की याद आती कि यदि मैंने हिम्मत तोड़ दी तो उनका दर्द मैं कभी खत्म नहीं कर पाऊंगी। मुझे इस जिम्मेदारी का अहसास होता कि मैं ही अपने परिवार की आधार हूं। कुछ भी हो, मुझे अपना बेस्ट करना है। मुझे अपने कोच सर के भरोसे पर भी खरा उतरना था जो मुझे अधिक इंजरी होने पर भी कहते रहते कि तुम कर लोगी। मन ज्यादा भारी होता, तो अकेले में कमरे में कुछ देर रोकर अपना दिल हल्का कर लेती थी। कभी-कभी हिंदी और बंगाली के गाने गुनगुनाकर अपना मन बहलाती, जीवन को ऊर्जा देने वाले गीत सुनती। लगातार यह सोचती रहती थी कि ‘अभी नहीं तो कभी नहीं।’ अगर अब चूक गई तो अगले एशियन गेम्स चार साल बाद आएंगे, इतने लंबे वक्त में क्या होगा, कौन कह सकता है?
इंडोनेशिया पहुंचते ही मेरे दांत में असहनीय दर्द शुरू हो गया। दाहिना गाल सूज गया। एक बार फिर ऐसी स्थिति पैदा हो गई कि शायद हिस्सा नहीं ले सकूंगी, लेकिन मैंने दृढ़ निश्चय करके अपने दर्द की अनदेखी की। पहले दिन हैप्टाथलॉन के चार इवेंट में मैं पिछड़ गई, लेकिन मेरे दिमाग में था कि उसे भूलकर बचे तीन इवेंट में बेस्ट देना है। मेडल वितरण के समय जब भारत का तिरंगा सबसे ऊपर लहराया तो वह मेरे जीवन में सबसे गौरव का क्षण था। अब मेरी नजर 2020 में होने वाले टोक्यो ओलिंपिक पर है, वहां से देश के लिए पद लाने का सपना है।

(एशियाड-2018 में हैप्टथलॉन में स्वर्ण पदक विजेता एथलीट स्वप्ना बर्मन ने जैसा अनिरुद्ध शर्मा को बताया)