सरहुल प्रकृति को महत्व प्रदान करने वाला ऐसा अनोखा पर्व...जिसे मनाने के लिए किसी धर्म-समाज का बंधन नहीं

Palamu News - चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया को सरहुल मनाया जाता है। सरहुल एक अंतर-प्रांतीय पर्व है। संथाल-हो समुदाय इसे बाहा कहते...

Mar 27, 2020, 07:25 AM IST

चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया को सरहुल मनाया जाता है। सरहुल एक अंतर-प्रांतीय पर्व है। संथाल-हो समुदाय इसे बाहा कहते हैं, मुंडा इसे बा पोरोब कहते हैं। संथाल, मुंडा, हो के अनुसार यह फूलों का त्योहार है। खड़िया इसे जंकोर कहते हैं अर्थात अंकुरण का त्योहार। उरांव इसे खद्दी कहते हैं। खद्द से खद्दी अर्थात शिशु या सृजन का त्योहार। सरहुल में सूर्य और पृथ्वी की शादी रचाई जाती है। शादी के पश्चात ही प्रजनन की कल्पना की गई है। प्रजनन और सृजन ही जीवन को आगे बढ़ाता है। प्रजनन के पश्चात मनुष्य सबसे पहले पेट के लिए संघर्ष करता है, फिर कपड़ा और मकान के लिए, जबकि अन्य जीवधारियों का संघर्ष पेट और प्रजनन तक ही सीमित रहता है।

सरहुल दुनिया भर में लोगों को प्रकृति से मिलने वाले लाभों की याद दिलाता है। प्रकृति में ही विविधि प्रकार के सूक्ष्म जीव-जंतुओं की गुणसूत्रीय विविधता निहित है। हरे भरे पेड़-पौधे विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, मिट्टी, हवा, पानी, पठार, नदियों, समुद्र, महासागर आदि सभी प्रकृति की देन हैं जो अस्तित्व के विकास के लिए जरूरी है। इनका प्रबंधन उपयोग और संरक्षण के लिए दुनियाभर में चिंतन हो रहा है।

आज पर्यावरण के प्रति संपूर्ण विश्व चिंतित है, परंतु हमारा आदिवासी समाज आदि काल से पर्यावरण के प्रति सचेत है। इसके लिए अन्य सभी समुदाय को अपने स्तर पर प्रतिबद्ध होना पड़ेगा। हमारा आदिवासी समुदाय एकदम अलग तरह के वैश्वीकरण से मुखातिब हो रहा है, फिर भी अपनी विशिष्ट पहचान रखते हुए स्वतंत्र सोच एवं निष्पक्ष विचार के बलबूते अपनी बात का सटीक प्रस्तुतीकरण करता रहा है। अपने पर्व-त्योहार और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन पर विचार करता है, ताकि आने वाला भविष्य कैसा होगा, हमारे पर्व-त्योहार से साफ हो चुका है कि हमारा समाज किस प्रकार पर्यावरण पर नियंत्रण चाहता है। झारखंड का आदिवासी समुदाय पृथ्वी के तापमान में वृद्धि के प्रति जंग में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सरहुल प्रकृति को महत्व प्रदान करने वाला ऐसा अनोखा त्योहार है जिसे मनाने के लिए किसी धर्म, समाज, देश या जाति का बंधन नहीं है। गरीबी-अमीरी का भेद नहीं, पढ़े-लिखे, अनपढ़ सबके घर में मनाए जाने के लिए है। घरेलू या नौकरी पेशा औरतें, स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियां, सभी अपने जुड़े में साखु फूल खोंसकर इसे सेलिब्रेट करती हैं, वहीं युवकों में नृत्य की होड़ मच जाती है।

सरहुल पर्व के तीन महत्वपूर्ण अंग प्रकृति, संस्कृति और उत्सव है, जिसके जीवन में उत्साह नहीं है वह गीत नहीं गा सकता है, जिसके जीवन में उत्साह नहीं है, वह नृत्य नहीं कर सकता है। सरहुल का आनंद वही उठा सकता है जो गीत गाकर नृत्य कर सकता है।

डॉ. हरि उरांव

एचओडी जनजातीय विभाग, आरयू

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