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स्वामी अनिल बोले... एक विश्वासी दुख को हरा देता है पर अविश्वासी खुद ही हार जाता है
जब हमारे जीवन में दुख आता है तो हम चीखते हैं, चिल्लाते हैं, गुस्सा करते हैं, निराश होते हैं पर हमें उस समय भी धैर्य के साथ रहना चाहिए। कभी-कभी प्रभु हमारे जीवन में दुख आने देते हैं ताकि उससे दूर होने के लिए हम प्रभु को ढूंढ़े। हमारे जीवन में जब भी दुख आता है तो उसका एक मतलब है, एक उद्देश्य है। हम दुख से बहुत कुछ सीखते हैं। प्रभु दुखों के जरिए हमें और भी मजबूत बनाते हैं। हमें दुखों पर भी गर्व होना चाहिए क्योंकि दुख से धैर्य उत्पन्न होता है। दुख महिमा की सीढ़ी है। जब हम दुख को धैर्य से सहते हैं तो हम पर प्रभु की महिमा होगी।
यह बातें स्वामी अनिल देव ने तीन दिवसीय आध्यात्मिक साधना के समापन समारोह में लोगों को संबोधित करते हुए कहीं। यह आध्यात्मिक साधना रांची महाधर्मप्रांत द्वारा सात से नौ मार्च तक आयोजित की गई थी। इस तीन दिवसीय साधना का आयोजन लोयला मैदान में सुबह 8:30 बजे से लेकर शाम चार बजे तक किया गया। साधना का विषय ईश्वर के पास जाए और वह आपके पास आएगा रखा गया था। इस तीन दिवसीय साधना कार्यक्रम के अंतिम दिन रोजना विनती सहित गीत और प्रार्थनाओं से माहौल पवित्रमय और आध्यात्मिक रहा। इस अवसर पर पवित्र मिस्सा का आयोजन रांची महाधर्मप्रांत के सहायक बिशप थियोदोर मस्करेंहस द्वारा कराया गया। साधना के मुख्य उपदेशक स्वामी अनिल देव थे।
पवित्र विशेष मिस्सा का आयोजन रांची महाधर्मप्रांत के सहायक बिशप थियोडोर मस्करेंहस ने कराया
कार्यक्रम में हजारों की संख्या में कई समुदाय के विश्वासी हुए शामिल
कार्यक्रम में फादर प्रफुल तिग्गा, फादर सचिन, रांची महाधर्मप्रांतीय कैथलिक सभा के सभापति अलबैनुस तिग्गा, महिला संघ की सभी नेत्री लिलि बीरला, युवा संघ के अध्यक्ष कुलदीप तिर्की, फादर कैजिटन और फादर रॉकी आनंद, संजय उपस्थित थे। इसके साथ ही इस साधना कार्यक्रम में हजारों की संख्या में न केवल ईसाई समुदाय के विश्वासी बल्कि अन्य समुदायों के विश्वासी भी शामिल हुए।
स्वामी देव ने आगे लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में प्रेम भी दुख से ही नापा जाता है। संसार में सबसे बड़ा प्रेम दुख से पता चलता है। दुख जिंदगी में बेकार नहीं है, बहुत कीमती है। हमें उसे स्वीकार करना है और ग्रहण करना है। हर दुख के जरिए प्रभु हमें पश्चताप करने के लिए कहता है। दुख पश्चताप करने का सुनहरा अवसर प्रदान करता है। हमने हमारी जीवन में हमेशा दुख को गलत समझा है पर वह प्रभु की ओर से हमारे लिए एक पवित्र वरदान है। वह हमें एक संत और महान बनाती है।
बाइबल में कई वचनों में प्रभु ने दुख में हार न मानने, निराश न होने, धैर्य रखने आदि की सीख दी है। एक विश्वासी और एक अविश्वासी दोनों के ही जीवन में दुख आता है। फर्क यह है कि एक विश्वासी दुख को हरा देता है पर एक अविश्वासी खुद ही दुख से हार जाता है। प्रभु ने मानव जाति के उत्थान के लिए खुद दुख भोगा और अंत में क्रूस पर चढ़ मृत्यु को स्वीकार किया। प्रभु की मृत्यु और बलिदान के कारण हम सबपर कृपा हुई। हमें भी अपने दुख को दूसरों की भलाई के लिए इस्तेमाल करना है।
मनुष्य जाति के लिए वरदान है दुख
दुख के बाद मिलती है सीख
दुख जिंदगी में बेकार नहीं है, बल्कि बहुत कीमती है, हर दुख से हमें सीख मिलती है : स्वामी देव
प्रभु ने मानव जाति के उत्थान के लिए खुद दुख भोगा और क्रूस पर चढ़ मृत्यु को स्वीकार किया