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सैयद अता हसनैन का कॉलम: आतंकियों के खिलाफ मुहिम रोकना एक प्रयोग

3 वर्ष पहले
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जम्मू-कश्मीर का 2017-18 का सुरक्षा परिदृश्य ऑपरेशन ऑल आउट का गवाह बना, जो अधिकतम आतंकियों को खत्म करने का ठोस अभियान था। ऐसे में राज्य सरकार के कहने पर आतंकियों के खिलाफ अभियान रोकने की केंद्र सरकार की एकतरफा घोषणा के स्वागत के साथ आतंकियों को राहत देने पर चिंता व हताशा भी व्यक्त की गई है। ऐसा इसलिए हैं कि सब कन्वेंशन ऑपरेशन को ठीक से समझा नहीं गया है।

 

 

एक तो ऐसे अभियान में स्वीकार्य शर्त है नॉन इनिशिएशन ऑफ कॉम्बेट ऑपरेशन्स (एनआईसीओ) या सरल शब्दों में कहें तो अभियानों में संयम बरतना। यह सैन्य गतिविधियों का अंत नहीं है, क्योंकि रक्षात्मक अभियान तो चलते रहते हैं। इस तरह के एकतरफा फैसले को कई बार मुश्किल में फंसे पक्ष के लिए राहत के रूप में देखा जाता है। यह सोच त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि आक्रामक अभियान इसलिए चलाए जाते हैं ताकि आखिरकार शांति की बहाली लायक परिस्थितियां लौट सकें। इसके लिए विश्लेषणात्मक विस्तार में जाना होगा।


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नवंबर 2000 में रमजान के मौके पर एनआईसीओ घोषित किया था, जिससे कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी। बल्कि इससे तो सुरक्षा बलों व नागरिकों में हताहतों की संख्या बढ़ी और सरकार को संघर्ष विराम वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा। मौजूदा प्रस्ताव का परीक्षण करने के पूर्व सब कन्वेंशनल ऑपरेशन रोकने के दो अन्य मॉडल ध्यान में रखने होंगे। एक नगालैंड में हुआ था, जिसका नतीजा कामयाब शांतिवार्ता में हुआ। इस पर अंतिम मुहर नहीं लगी है लेकिन, यह वार्ता अंतिम समाधान के मसौदे के रूप में फलीभूत हुई। याद रहे कि पूर्वोत्तर भारत में छद्‌म युद्ध और वैचारिक समर्थन एक हद तक ही रहा है।

 

दूसरा है श्रीलंका मॉडल, जिसमें एलटीटीई ने श्रीलंकाई सेना के साथ ऐसे कई करार किए, जिसका हर बार यह नतीजा हुआ कि वह अधिक शक्तिशाली बनकर उभरा।
आम लोग नियंत्रण रेखा पर ‘संघर्ष विराम’ और जम्मू-कश्मीर के भीतरी भागों में चल रहे सब कन्वेंशनल ऑपरेशन में एनआईसीओ के बीच फर्क नहीं कर सकते। इसलिए मुख्यधारा के मीडिया व सोशल मीडिया में सरकार के फैसले के खिलाफ बहुत सारे नकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त हुए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि मौजूदा स्थिति  में आतंकी हावी नहीं हैं बल्कि उन्हें खत्म करने में ऑपरेशन ऑल आउट को असंदिग्ध सफलता मिली है। हर कोई यह पूछता दिख रहा है कि क्यों संघर्ष विराम से उस दबाव को ज़ाया किया जा रहा है।

 

हमें यह अहसास होना चाहिए कि अलगाव की गहरी भावना के कारण स्थिति पूरी तरह काबू में नहीं है। इस अलगाव के कारण ही कश्मीरी युवा अपनी सुरक्षा की परवाह न कर सड़कों पर उतरा है। इस रवैये का बने रहना खतरनाक भी है और इसका पूर्वानुमान भी नहीं लगाया जा सकता खासतौर पर तब जब कट्‌टरपंथ भी व्यापक रूप से फैला है। स्थानीय आतंकियों की भर्ती में भी तेजी दिखी है। अनुभव न हो तो कहा जाएगा कि आतंकवाद को खत्म करने का एक ही तरीका है कि आखिरी आतंकी खत्म होने तक जबर्दस्त अभियान चलाया जाए।

 

खासतौर पर तब जब स्थानीय भर्ती उस स्तर पर चलती रहे, जिस स्तर पर देखी जा रही है। रमजान का पवित्र महीना शुरू हुआ ही है, जिसके समाप्त होने के बाद श्रीअमरनाथ यात्रा शुरू होगी। समय और स्थिति के अनुसार मुख्यमंत्री के प्रस्ताव और उस पर केंद्र के फैसले का महत्व है। बशर्ते निर्णय लेने वालों को पता हो कि उनका उद्‌देश्य क्या है। मुझे लगता है कि फैसले में रमजान-अमरनाथ यात्रा की अवधि को एनआईसीओ की अवधि के रूप में प्रोजेक्ट करना था, क्योंकि ऐसे फैसलों में प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है।


जाहिर है फैसला इस आवश्यकता को ध्यान में रखकर लिया गया कि चीजों को शांत और भावनाओं को स्थिर होने देना जरूरी है। फिर भी अातंकियों को छद्‌म या अन्य तरीके से क्षमता बढ़ाने नहीं दी जा सकती। इसीलिए ऐसे अभियानों में संयम को बारीकियों के साथ ग्रेड वन की श्रेणी में रखना चाहिए ताकि उचित नियंत्रण के साथ पर्याप्त स्वतंत्रता सुनिश्चित की जा सके। अपने मतदाता वर्ग के साथ संवाद न रख पा रहे राजनीतिक समुदाय को जमीनी स्तर पर जाकर संवाद साधना चाहिए। हिंसा का अभाव होना जरूरी है ताकि वातावरण से डर व मौत का खौफ उठ जाए। हमें सोशल मीडिया के माध्यम से होने वाली गलत जानकारी के खिलाफ सतर्क रहना होगा।

 

ऑपरेशन रोकने से इनकार करने वालों को मैं यही दलील दूंगा कि ऐसे अभियानों की सफलता में से अहंकार को हटा देना चाहिए, क्योंकि अपने ही लोगों के खिलाफ कोई विजेता और पराजित नहीं होता। अभियानों में एकतरफा संयम कोई कमजोरी का संकेत नहीं होता बल्कि यह तो शांति चाहने की सरकार की इच्छा व आत्मविश्वास का द्योतक है। इसे ऐसे लागू करना चाहिए कि नाकामी की दशा में जब अभियान फिर बहाल किया जाए तो आतंकियों की क्षमता में इजाफा न दिखाई दें। जिन्हें ज्यादा जानकारी नहीं है उन्हें इतना याद रखना पर्याप्त है कि सेना पूरी तरह बैरक में नहीं चली जाती। 

 

अभियान चालू रहने की तुलना में चुनौती अधिक रहती है। आक्रामक अभियान रोक दिया जाता है पर आतंकियों द्वारा हथियारों के खुले प्रदर्शन के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। सारे रक्षात्मक अभियान चालू रहते हैं, जिसमें सड़कों व संस्थानों की सुरक्षा व क्षेत्र में प्रभुत्व सुनिश्चित करना शामिल है। नियंत्रण-रेखा पर घुसपैठ विरोधी कार्रवाई में भी कोई बदलाव नहीं होगा। अनुुमान है कि आतंकी भी हमले से बाज आएंगे। हालांकि, 2000 के अंत में एनआईसीओ अवधि में लश्कर ए तय्यबा ने श्रीनगर एयरपोर्ट में घुसने की नाकाम कोशिश की थी।


इस बार लश्कर ने एकतरफा विराम को ठुकरा दिया है। उसके पास विदेशी आतंकी बहुत कम हैं, इसलिए उसका उतना असर नहीं होगा। देखना है कि क्या हिजबुल मुजाहिदीन इसका पालन करेगा। विराम का उपयोग टाउन हॉल बैठकों के जरिये आम जनता व युवाओं से संवाद साधने की कोशिश में हो। इसके लिए राजनीतिक समुदाय और प्रशासकों को साहस दिखाना होगा, क्योंकि उनके सामने अपमान व आलोचना का जोखिम रहेगा। खराब परिदृश्य में संयम बरतने की पूरी कवायद कुछ ही दिनों में नाकाम हो सकती है। पेशेवर सेना होने के कारण अभियान के मोड में वापसी तत्काल होगी। विराम के जरिये जो नैतिक श्रेष्ठता हासिल होगी वह निश्चित ही सरकार को ऊंचा मनोबल देगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

 

लेफ्टि. जनरल (रिटा)
सैयद अता हसनैन
कश्मीर में सेना की 15वीं 
कोर के पूर्व कमांडर
atahasnain@gmail.com

 

 

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