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अनोखे अंदाज में भोपाल की ताज-उल-मस्जिद; हर एंगल से देखें मस्जिद की दमकती खूबसूरती

3 वर्ष पहले
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  • शाहजहां बेगम ने शुरू कराया था मस्जिद का निर्माण, पूरा नहीं करा सकीं 

भोपाल. मध्य प्रदेश की राजधानी में स्थित ताज-उल-मसाजिद भारत और एशिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। ताज-उल-मसाजिद का अर्थ है \'मस्जिदों का ताज\'। इसके प्रवेश द्वार में चार मेहराबें हैं और मुख्य प्रार्थना हॉल में जाने के लिए 9 प्रवेश द्वार हैं। इसे दिल्ली की जामा मस्जिद से प्रेरणा लेकर बनाया गया है। ताज-उल-मसाजिद में हर साल तीन दिन का इज्तिमा उर्स होता है। इसमें देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। 360 डिग्री कैमरे से ली गई तस्वीर में ताज-उल-मसाजिद की खूबसूरती को हर एंगल से देखें।  

 

1) दिल्ली की जामा मस्जिद की प्रेरणा से बनाई ताज-उल-मसाजिद

सिकंदर बेगम ने ताज-उल-मसाजिद को तामीर करवाने का ख्वाब देखा था, इसलिए ये सिकंदर बेगम के नाम से सदा के लिए जुड़ गयी। सिकंदर बेगम 1861 में इलाहाबाद दरबार के बाद जब दिल्ली गईं तो उन्होंने देखा कि दिल्ली की जामा मस्जिद को ब्रिटिश सेना की घुड़साल में तब्दील कर दिया गया है। सिकंदर बेगम ने अपनी वफ़ादारियों के बदले अंग्रेज़ों से जामा मस्जिद को हासिल कर लिया और इसकी सफाई करवाकर शाही इमाम की स्थापना की गई। यहीं उन्हें प्रेरणा मिली और उन्होंने  तय किया कि भोपाल में भी ऐसी ही मस्जिद बनवाएंगी। सिकंदर बेगम का ये ख्वाब उनके जीते जी पूरा न हो सका फिर उनकी बेटी शाहजहां बेगम ने इसे अपना ख्वाब बना लिया। 

1971 में भारत सरकार के दखल के बाद ताज-उल-मसाजिद पूरी तरह से बन गई। अब जो ताज-उल-मसाजिद हमें दिखाई देती है। उसका निर्माण अल्लामा मोहम्मद इमरान खान नादवी अजहरी के शासनकाल में पूरा हुआ। उन्होंने 1970 में इसे मुकम्मल कराया। ये एशिया की छठी सबसे बड़ी मस्जिद है, लेकिन यदि क्षेत्रफल के लिहाज़ से देखें और इसके मूल नक्शे के हिसाब से वुजू के लिए बने आठ सौ गुणा आठ सौ फीट के मोतिया तालाब को भी इसमें शामिल कर लें तो यह दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद होगी।

शाहजहां बेगम ने ताज-उल-मसाजिद का बहुत ही वैज्ञानिक नक्शा तैयार करवाया था। ध्वनि तरंग के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए 21 ख़ाली गुब्बदों की एक ऐसी संरचना का नक्शा तैयार किया गया कि मुख्य गुंबद के नीचे खड़े होकर जब इमाम कुछ कहेगा तो उसकी आवाज़ पूरी मस्जिद में गूंजेगी। शाहजहां बेगम ने ताज-उल-मसाजिद के लिए विदेश से 15 लाख रुपए के पत्थर भी मंगवाए। चूंकि इसमें अक्स दिखता था। इसलिए मौलवियों ने इस पत्थर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। आज भी ऐसे कुछ पत्थर 'दारुल उलूम' में रखे हुए हैं। धन की कमी से शाहजहां बेगम के जीवनकाल में मस्जिद नहीं बन सकी। 

ताज-उल-मसाजिद कुल 23,312 वर्ग फीट के मैदान पर फैली हुई है जिसकी मीनारे तक़रीबन 206 फीट ऊंची है। साथ ही मस्जिद में 3 विशाल गोलाकार आकर के गुम्बद, एक सुंदर प्रार्थना कक्ष और आभूषण जड़ित पिलर, मार्बल से बनी फर्श और गुम्बद भी हैं। इसके अलावा इसमें एक विशाल टैंक के साथ बड़ा आंगन भी है। साथ ही प्रार्थना कक्ष की मुख्य दीवार पर जाली काम और प्राचीन हस्तकला का काम भी किया गया है। 27 छतों को विशाल पिलर की सहायता से दबाया गया है, और उन्हें सलाखी काम से अलंकृत भी किया गया है। 27 छतों में से 16 को फूलों की डिजाइन से सजाया गया है। साथ ही फर्श की डिजाइन में भी क्रिस्टल स्लैब का उपयोग किया गया है, जिन्हें सात लाख रुपये खर्च कर इंग्लैंड से इम्पोर्ट किया गया था।

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