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महाभारत 2019: तमिलनाडु में जया की कमी सबसे बड़ा फैक्टर, डीएमके भुनाने में जुटी; रजनी-कमल हासन पर भरोसा कम

लोकसभा सीटों के लिहाज से देश के पांचवें सबसे बड़े राज्य में कावेरी विवाद, किसान आंदोलन रहेंगे 2019 के चुनावी मुद्दे।

Danik Bhaskar | Jun 15, 2018, 07:52 AM IST

  • स्थानीय जानकारों का कहना है कि दक्षिण में धर्म काफी कुछ तय करता है
  • लोकसभा सीटों के लिहाज से देश के पांचवें सबसे बड़े राज्य में कावेरी विवाद, किसान आंदोलन रहेंगे 2019 के चुनावी मुद्दे

चेन्नई. कलपक्कम स्थित एटॉमिक रिसर्च सेंटर के साइंटिफिक ऑफिसर टीवी मारन इन दिनों रजनीकांत जैसा लिमिटेड एडिशन चश्मा (काला) पाकर उत्साहित हैं। उन्हें इस बात का दुख जरूर है कि इस फिल्म का फर्स्ट-डे फर्स्ट शो नहीं देख पाए। मगर मारन स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि वे रजनीकांत या उनकी पार्टी के लिए वोट नहीं देंगे। तमिलनाडु के अलग-अलग हिस्सों में जनता का मन टटोलने पर हमें मारन की तरह इरादा रखने वाले और भी लोग मिले। खासकर दलित समुदाय से जुड़े। हालांकि, मारन कहते हैं कि सुपरस्टार ने फिल्म ‘कबाली’ के दिनों से ही इस वर्ग को साधने के प्रयास शुरू कर दिए थे। फिर भी दिक्कत यह है कि रजनीकांत का झुकाव भाजपा की ओर है और आरक्षण के मुद्दे पर हुए बवाल से दलित और अादिवासी भाजपा से नाराज हैं। इस वर्ग को नजरअंदाज इसलिए नहीं किया जा सकता कि दलित व आदिवासी आबादी यहां 22 फीसदी है। यह अल्पसंख्यकों की आबादी का तकरीबन दोगुना है।

रजनीकांत-कमल हासन के लिए वोट पाना आसान नहीं


- असल में यही है नए तमिलनाडु की तस्वीर। पहले यहां लोग अभिनेता से नेता बनी ऐसी बड़ी शख्सियतों को वोट देने में जरा भी सोच-विचार नहीं करते थे। अब ऐसा नहीं है। इसलिए दिक्कतें कमल हासन के लिए भी होंगी।

- हासन भी अब चुनावी मैदान में हैं। ‘मक्कल निधि मय्यम’ नाम की पार्टी, झंडे और एक ऐप के साथ।

- यहां के एक मीडिया आंत्रप्रेन्योर एस. श्रीराम कहते हैं कि यह सुपरस्टार भी जनता में भरोसा जगाता दिखाई नहीं दे रहा। ब्राह्मण वोटर उन पर भरोसा नहीं जता सकता, क्योंकि फिल्मों में वे इस समुदाय का मजाक बनाते रहे हैं। वैसे इस समुदाय की आबादी यहां 3% ही हैं। मगर गैर-ब्राह्मण उनके साथ हैं, यह कहना भी गलत होगा। इसलिए कि वे इनमें से भी एक नहीं हैं।

- इन सुपरस्टार्स को लेकर लोगों से हुई बातचीत में भी हमने जाति का जिक्र बार-बार पाया। हम थोड़ा चकित थे। लेकिन स्थानीय राजनीति के जानकारों ने बताया कि दक्षिण में धर्म काफी कुछ तय करता है, लेकिन तमिलनाडु में जाति ज्यादा अहमियत रखती है। खासकर राज्य के मध्य तथा दक्षिणी हिस्से में।

- वैसे, सुपरस्टार्स के प्रति नजरिए में तमिलनाडु जरूर बदला हो, लेकिन जो नहीं बदला वो है क्षेत्रीय दलों के प्रति जनता का लगाव। लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस-बीजेपी को इन्हीं के कंधों पर सवार होकर मैदान में उतरना पड़ता है। इन दलों में एक जे. जयललिता का एआईएडीएमके है, दूसरा एम. करुणानिधि का डीएमके।

- डीएमके के नेताओं को 2019 के लोकसभा चुनाव में 2016 के विधानसभा चुनाव के बराबर वोट हासिल कर लेने का भरोसा है। तब पार्टी ने 31.6% वोट हासिल किए थे। इन्हें एआईएडीएमके से नाराज ‌वोटर्स के डीएमके के साथ आने की उम्मीद है। ऐसा लोगों से बातचीत में भी दिखा।

- उनका कहना है कि जया के निधन के बाद एआईएडीएमके में जिस तरह की गुटबाजी दिखाई दी, उससे पार्टी पर जनता का भरोसा कम हुआ है। हालांकि 2016 के विधानसभा चुनावों में एआईएडीएमके का वोटशेयर 40.88% था।


कावेरी मुद्दे पर केंद्र की चुप्पी से भी नाराज है जनता
- एआईएडीएमके के प्रति जनता की नाराजगी की एक और वजह बताई जा रही है- कावेरी विवाद पर निष्क्रियता। हालांकि लोग इस निष्क्रियता को केंद्र की भाजपा सरकार से जोड़कर देख रहे हैं।

- इधर, 2017 में राज्य में लगभग 24 हजार छोटे-बड़े आंदोलन हुए हैं। इनमें कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा शामिल नहीं था। मगर कावेरी जल बंटवारे से जुड़े विवाद के बाद ‘गो बैक मोदी’ कैम्पेन इन्हीं में से एक रहा है। यही वजह बताई जा रही है, जिससे रजनीकांत भी फिलहाल भाजपा को लेकर अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं।

रक्षा मंत्री को चेहरा बनाने की तैयारी में भाजपा

- भाजपा ने तमिलनाडु में प्रयास जरूर शुरू कर दिए हैं। वह रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण को तमिलनाडु भाजपा का चेहरा बनाने की तैयारी में भी है। इसके अलावा छोटे दलों को साथ लाने की रणनीति पर भी काम कर रही है।

-इधर, कर्नाटक में सत्ता में बने रहकर उत्साहित राहुल गांधी तमिलनाडु के दौरे कर रहे हैं। भाजपा की नाराजगी को भुना रहे हैं। तूतीकोरिन की घटना के पीछे भी उन्होंने भाजपा तथा संघ को जिम्मेदार ठहराया है।

छोटे दलों को यह उम्मीद

- संघ की विचारधारा में विश्वास रखने वाले एस. श्रीराम कहते हैं कि विधानसभा-लोकसभा चुनाव साथ होते हैं, तो यहां छोटी पार्टियां भी एक-दो सीट जीत सकती हैं।

- वहीं, राजनीति में रुचि रखने वाले स्वामीनाथन बाबू इसे लेकर चिंतित हैं। वे कहते हैं कि छोटी पार्टियां अच्छी संख्या में सीटें लाईं, तो लोकसभा में हमारी आवाज कमजोर हो जाएगी। किसी मुद्दे पर समर्थन के लिए इन्हें साथ लाना मुश्किल रहेगा।

राजनीतिक मुद्दे

- कावेरी जल विवाद: कर्नाटक से निकली नदी के जल बंटवारे को लेकर दशकों से विवाद।
- किसानों की दयनीय स्थिति और आंदोलन।
- तूतीकोरिन हिंसा में 13 की मौत बनी ताजा मुद्दा।

39 लोकसभा सीटों की स्थिति

एआईएडीएमके 37
बीजेपी 01
पीएमके 01
डीएमके 00
कांग्रेस 00