संपादकीय

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महाभारत 2019: सिर्फ भाजपा को हराने की सोच फिर मात खाएगी, तरुण विजय का विश्लेषण

मंत्रालयों में भ्रष्टाचारविहीन कामकाज और हर क्षेत्र में जनहितैषी योजनाएं फिर जनादेश दिलाएंगी।

Dainik Bhaskar

Jun 13, 2018, 07:28 AM IST
तरुण विजय पांचजन्य के संपादक रह चुके हैं। तरुण विजय पांचजन्य के संपादक रह चुके हैं।

जनसंघ की विरासत का सबसे बड़ा संदेश और लक्ष्य यही था कि भारत को शक्तिशाली और समृद्ध बनाया जाए और वही हो रहा है। हर क्षेत्र में भारत का आगे बढ़ना हमारी परमवैभव की कल्पना के अनुरूप ही है। यह हमारी राष्ट्रीयता का ही अंग है कि हम एक ऐसा देश बनाना चाहते हैं ‘जिसमें दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, रामराज काहू नहीं व्यापा’ की बात फलीभूत हो। यह कहा था श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 2004 में मुझे दिए एक साक्षात्कार में। उनका यह कथन लगता है आज के इसी माहौल के लिए कहा गया हो जब श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश विकास का नया अध्याय रच रहा है।

इस वातावरण में अटलजी के कथन हर पग पर बार-बार याद आते हैं। विपक्षी राजनीति के बारे में यह देखिए उनका वक्तव्य (9 मई 1999) ‘राजनीति पूरी तरह नकारात्मक और निषेध हो गई है। भाजपा के विरोध के नाम पर सेकुलरवादी मोर्चा खड़ा करने का जोर-शोर से एेलान किया गया था। लेकिन, उसे भी विवाद में मुद्‌दा नहीं बनाया गया। अगर लोकसभा में सेकुलरवाद पर तर्कसंगत बहस होती तो समझ में आ सकता था। केवल दोषारोपण के लिए देश के विभिन्न भागों में हुई छिटपुट घटनाओं का उल्लेख कर दिया गया। जब सत्ता पक्ष की ओर से तथ्य सामने रखे गए तो उन्हें समझने की तैयारी भी विपक्ष में दिखाई नहीं दी। इसके लिए मानो यह एक कर्मकांड था, जिसे पूरा करने के लिए वे इकट्‌ठा हुए थे। क्या संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीति इसी ढंग से चलेगी?’ पर क्या विपक्षी एकजुटता और पारस्परिक शत्रुता होते हुए भी केवल भाजपा को हराने के लिए इकट्‌ठा होने की मानसिकता को नरेंद्र मोदी ने 2014 में नहीं हराया था? उस समय क्या विपक्ष के पास साधनों की कमी थी? किस आधार पर भाजपा समूचे विपक्ष का सामना कर जीतती है? अटलजी इसे समझा रहे हैं... (22 मार्च 1998)

‘इस स्थिति को प्राप्त करने में निश्चित ही हमारी विचारधारा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हमारी विचारधारा को अधिक स्वीकृति मिलने का यह संकेत है। हमें अलग-थलग करने के, अस्पृश्य बनाने के सारे प्रयास विफल हुए हैं। हमारे विरोधी पराजित हुए हैं। इस चुनाव में कथित सेकुलरवाद का मुद्‌दा बनाकर हमें जनसमर्थन से वंचित करने या हमारे विरुद्ध शेष सबको संगठित करने के प्रयास पर पानी फिर गया। यहां तक कि अल्पसंख्यक वर्ग में भी यह भावना उत्पन्न हो गई है कि कथित सेकुलरवाद के नाम पर उनका राजनीतिक शोषण किया गया और उनकी मूल समस्याओं से ध्यान हटाने का प्रयास हुआ। अब हमें केंद्र में, जो कुछ कहते हैं उसे कर दिखाने का मौका मिला है। भारत की राजनीति में यह एक बड़े मोड़ का परिचायक है। हमें इस अवसर का पूरा लाभ उठाना है। बची-खुची आशंकाओं तथा भ्रमों का निराकरण कर देश के कल्याण का पथ प्रशस्त करना है।’ (ये सभी वक्तव्य अटलजी ने लेखक को उस समय दिए थे जब लेखक पांचजन्य के संपादक थे)

2019 वस्तुतः 2018 में ही प्रारंभ हो चुका है। हर बयान, हर कदम, हर सभा अब सिर्फ 2019 को दृष्टि में रखकर हो रही है। सांसद, मंत्री हर मौके का उपयोग अपनी-अपनी वोट-प्रजा को संभालने में कर रहे हैं। कुछ को चिंता है उनका टिकट रहेगा या कटेगा तो कुछ अपने-अपने क्षेत्रों के वोट-जाति-विपक्षी एकजुटता के गणित में लगे हैं। पर इतना तय है कि 2019 का महाभारत न भूतो न भविष्यति वाला सिद्ध होगा। विश्व के इतिहास में ऐसा रोमांच, थमी सांसों की जद्‌दोजहद, पल-पल, छिन-छिन का उतार-चढ़ाव शायद 1977 के चुनाव में भी उतना न दिखा हो, जितना हम अब देख रहे हैं। क्यों? क्योंकि दांव पर है उस विचारधारा में जन्मे स्वप्नदर्शी व्यक्ति की नीतियां, कार्यक्रम और उपलब्धियां, जिसका गत डेढ़ दशकों से मीडिया और राजनीति के सेकुलर वर्ग ने एक दिन भी पीछा नहीं छोड़ा। गुजरात को उद्योग, ढांचागत संरचना, ऊर्जा, ऊंचा जीडीपी, भ्रष्टाचार-रहित शासन दिया तो भी उसमें कमियां ढूंढीं गईं।

जो लोग हर दिन देश का सूरज घोटालों के बादलों से घिरा उगाते रहे, जिनके शासन में न सैन्य तैयारियां हुईं, न गांवों तक बिजली गई, न विदेशों में सिर उठाकर चलने की स्थिति आई, वे सब इकट्‌ठा होकर एक शेर के सामने आ खड़े हुए कि हमें भी राजा बनना है। दुनिया में सबसे बड़ा आधार है भरोसे का। भरोसा है तो सब कुछ है। भरोसा टूट जाए तो व्यक्ति जान दे देता है। निराशा के अंधेरे भयावह होते हैं। अभी चार साल पहले तक देश के नेतृत्व, नेतृत्व की ईमानदारी और उसकी कार्यक्षमता पर भरोसा टूटने लगा था। निवेश देश के बाहर जा रहा था, विश्व का सबसे बड़ा युवा देश होने के बावजूद युवा अवसादग्रस्त और विद्रोही हो रहे थे। मोदी ने नव-भारत के नव-युवा को संबोधित किया। पहले-पहल वोट डालने वालों को अपने सपने साकार करने का भरोसा दिलाया। आम जनता को ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ का भरोसा दिया तो देश की सरहदों को सुरक्षा तथा हमलावर के प्रति निष्ठुर आक्रामकता का भरोसा दिया। मंत्रालयों में भ्रष्टाचारविहीन कामकाज का भरोसा दिया तो वक्त पर कार्यालय आने की आदत डलवाई और 6 किमी प्रतिदिन सड़क निर्माण के औसत को 30 किमी प्रतिदिन तक ले गए। महिला सशक्तीकरण में लोकसभा अध्यक्ष से लेकर देश के महत्वपूर्ण मंत्रालय महिला नेताओं को दिए तो गांव की महिलाओं को चूल्हे-चौके से होने वाले अंधियारी आंखों को बचाया- उज्ज्वला योजना ने। स्टार्टअप, स्टैंडअप, मेक-इन इंडिया के लिए मुद्रा योजना, जनधन और किसान मजदूर बीमा का आरंभ किया तो अरुणाचल से कश्मीर तक रेल तथा वायुसेवाओं का अद्‌भुत अविश्वसनीय संजाल बिछाया। डोकलाम में चीन को आंख में आंख डालकर थामा-रोका तो भूटान को मित्रता का भरोसा भी दिलाया।

पहली बार देश के प्रधानमंत्री ने मुस्लिम तुष्टिकरण का भयजाल छिन्न-भिन्न कर इजरायल की यात्रा का प्रथम ऐतिहासिक कदम उठाया। विदेशी हमलावरों ने इस देश को जितना लूटा उतना ही स्वदेशी भ्रष्टाचारियों, परिवारवादी, सामंती राजनेताओं और भ्रष्ट अफसरों ने लूटा। जब यह सब बदलने का मौका भाजपा को मिला तो विपरीत वैचारिक ध्रुवों वाले विपक्षी दल सत्ता की हांडी के लिए एकजुट होने लगे। लेकिन, मोदी-अमित शाह का रणनीतिक स्वर विजय की आक्रामकता का चक्रवर्ती प्रभाव छोड़ता दिख रहा है। अभी देखिए होता है क्या।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Tarun Vijay analysis under Bhaskar Mahabharat 2019
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