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स्मार्ट सिटी चैलेंज के लिए टेक कंपनियां \'तैयार\'

7 वर्ष पहले
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तुषार बनर्जी

बीबीसी संवाददाता

भारतीय शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए तकनीक का भरपूर प्रयोग किया जाना है.

इसका ब्लूप्रिंट तैयार हो रहा है, लेकिन क्या भारत जैसे देश में सभी शहर किसी एक फॉर्मैट में फिट हो पाएंगे?

भारत में माइक्रोसॉफ्ट के गवर्नमेंट और हेल्थ डिविज़न के निदेशक विकास अग्रवाल का कहना है कि कंपनियां भारत की चुनौतियों के लिए तैयार हैं.

पढ़ें, विकास अग्रवाल से बातचीत के अंश

स्मार्ट सिटी का कॉन्सेप्ट क्या है, एक स्मार्ट सिटी क्या होती है?

विकास अग्रवाल का कहना है कि पुराने शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए समाज के हर तबके का समर्थन ज़रूरी होता है.

कोई भी शहर वहां रहने वाले लोगों की वजह से बनता है. इस लिहाज़ से मुझे लगता है कि स्मार्ट सिटी की परिभाषा भी वहां रहने वाले लोगों के आधार पर ही तय की जानी चाहिए.

एक शहर, जो अपने नागरिकों, व्यापारियों और अपने यहां आने वाले पर्यटकों को पूरी सहूलियत, सुविधाएं और अवसर दे पाए, वही सिटी स्मार्ट है.

एक शहर जो अपनी मूलभूत सुविधाओं का भरपूर इस्तेमाल करना जानता हो, उसी के ज़रिए अपने नागरिकों को तमाम तरह की सुविधाएं देना जानता हो, उनकी सुविधाओं और उनके लिए अवसर मुहैया कराने के लिए केंद्रित है, वो स्मार्ट सिटी है.

यातायात व्यवस्था जैसी वास्तविकताओं की बात करें तो स्मार्ट सिटी में इसका क्या प्रारूप होगा?

किसी भी शहर की रूपरेखा में आठ महत्वपूर्ण विशेषताएं होती हैं.

पहला है सरकारी प्रशासन, दूसरा ऊर्जा-पानी, बिल्डिंग, पर्यटन, यातायात, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा. ये ऐसे बिंदु हैं जो एक शहर में होने चाहिए.

तो अगर हम स्मार्ट सिटी को समझने की कोशिश करें तो इन आठ बिंदुओं की कसौटी पर परख सकते हैं. इनमें यदि हम तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिनसे हमें बेहतर लाभ, नियंत्रण और मॉनिटरिंग मिले तो वही है स्मार्ट सिटी.

टेक कंपनियां स्मार्ट सिटी को बनाने में किस तरह से मदद कर सकती हैं...जबकि हर शहर, दूसरे से अलग हैं?

ये बात बिल्कुल सही है कि हर शहर की अपनी अगल खासियतें हैं....हर शहर का अपना सामाजिक नज़रिया है, आर्थिक सोच है. कोई बुनकरों का शहर है तो कोई कुछ...लेकिन हर शहर का एक ही बुनियादी परिचालन है.

माइक्रोसॉफ़्ट जैसी टेक्नोलॉजी कंपनियां आजकल इस बात पर फोकस कर रही हैं कि शहर में रह रहे लोगों की ज़रूरतें क्या-क्या हैं और इन ज़रूरतों की प्राथमिकता क्या है...और इनमें किस-किस तरह से स्मार्ट एंगल डाला जा सकता है.

प्रोजक्ट स्तर पर, जैसा कि सौ शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की बात कही जा रही है और इनमें से कई शहर बसे-बसाए हैं और उनकी अपनी व्यवस्था है...तो कंपनियां किस स्तर पर और किस तरीके से काम कर रही हैं...?

यहां दो तरीके से काम हो रहा है. पहला तो कि हम पैकेज के तौर पर ये कहते हैं कि हम सब कुछ स्मार्ट बना देंगे. दूसरा है बिट्स एंड पीसेस में, यानी अलग-अलग भागों में.

जो शहर बसाए जा रहे हैं वे तो पहले दिन से स्मार्ट बन सकते हैं, लेकिन अगर हम उन शहरों की बात करें जहां लोग पहले से ही हैं तो इतना आसान नहीं है.

चूंकि वहां एक रोजमर्रा की ज़िंदगी चल रही है, वहां आपको काम करना है, तकनीक से जोड़ना है, लेकिन बिना लोगों को परेशान किए. इसलिए इसे भागों में किया जाए...यहां प्राथमिकता के आधार पर काम किया जाता है.

टाइमलाइन की बात करें तो इन दो तरह के शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने में कितना वक्त लगेगा?

इस सवाल का जवाब देना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि जब एक शहर बसाया जा रहा है तो उसके लिए मास्टर प्लान की ज़रूरत होती है. अब मास्टर प्लानिंग के साथ सिटी आईटी मास्टर प्लान बना लिया जाता है.

तो अब शहर को स्मार्ट और अधिक प्रभावी बनाने के लिए अलग से वक्त लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ रही. दोनों प्लानिंग साथ ही हो जा रही है.

लेकिन मौजूदा शहरों की बात करें तो कई बातें वहां पहले से ही मिल जाएंगी. जैसे कैमरा लगाना चाह रहे हैं, तो वो वहां पहले से ही होगा.

कितना वक्त लगता है ये इस बात पर निर्भर करता है कि हम उस शहर में क्या करना चाह रहे हैं और क्या लगाना चाह रहे हैं. साथ ही वहां की स्थिति क्या है. लेकिन 3-6 महीने में बदलाव दिखना शुरू हो सकता है.

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