..युवा लोगों की नींदों में बुजुर्गों के रतजगे

Bokaro News - ** जयप्रकाश चौकसे फिल्म समीक्षक कोरोना तांडव के समय एक हृदयहीन व्यक्ति ने यह विचार अभिव्यक्त किया कि...

Mar 27, 2020, 06:30 AM IST
Chas News - the elders in the sleep of young people

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जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

कोरोना तांडव के समय एक हृदयहीन व्यक्ति ने यह विचार अभिव्यक्त किया कि उम्रदराज लोगों को बेइलाज मरने दिया जाए और बच्चों तथा युवाओं को बचाया जाए। क्या उम्रदराज लोगों को जीने का अधिकार नहीं है? अगर बात कुछ ऐसी हो कि दो में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है, तब उम्रदराज की शहादत दी जा सकती है। सदियों पुराना लतीफा है कि एक नाव में तीन व्यक्ति यात्रा कर रहे थे। नदी में बाढ़ आ गई, एक व्यक्ति को नदी में फेंक देने से दो की जान बच सकती थी। ऐसे में व्यक्ति अपनी प|ी को नदी में फेंक देता है और कहता है कि प|ी तो दूसरी मिल सकती है, परंतु मां नहीं। यह स्त्री के अपमान की बात है। मां और प|ी दोनों ही स्त्रियां हैं।

फिल्म ‘शरारत’ में एक अनुशासनहीन घमंडी युवा से एक अपराध हो जाता है और उसे जेल नहीं भेजते हुए एक वृद्धाश्रम भेजा जाता है, जहां उसे उम्रदराज लोगों की सेवा करना है। इसी तरह राजेश खन्ना और मीना कुमारी अभिनीत दुलाल गुहा की फिल्म ‘दुश्मन’ में ट्रक ड्राइवर की चूक से एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। जज उसे दंड देते हैं कि वह मरने वाले के परिवार की सेवा करे। दंड विधान में सुधार की गुंजाइश रखी जानी चाहिए। वी. शांताराम की क्लासिक फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ इसी आदर्श से प्रेरित है। क्या उपयोगिता जीवन का एकमात्र मानदंड है? हॉलीवुड की फिल्म ‘दे शूट होर्सेस, डोंट दे’ में रेस के घायल घोड़े को गोली मार दी जाती है। यह निहायत ही अमानवीय विचार है। कोएन बंधुओं की फिल्म ‘नो कंट्री फॉर ओल्ड मैन’ का नाम ही बहुत कुछ कहता है। सृजन शक्ति का उम्र से कोई लेना-देना नहीं है। ज्ञातव्य है कि अंग्रेजी के महान कवि कॉलरिज अफीम का सेवन करते थे। उसी तंद्रा में उन्होंने एक कविता लिखी, परंतु उसमें अंतिम पंक्तियां वे नहीं लिख पाए, क्योंकि उनकी तंद्रा टूट गई थी। उनके कवि मित्र भी उस कविता को पूरा नहीं कर पाए। उन्हें सलाह दी गई कि वे लंदन से पचास मील दूर रहने वाले एक वृद्ध कवि से मिलें, जिसे कभी सफलता नहीं मिली, परंतु वह असाधारण प्रतिभा का धनी है। उसने अनगिनत किताबें बांची हैं। बहरहाल, उस उम्रदराज विद्वान ने तुरंत अधूरी कविता को पूरा कर दिया। कॉलरिज संतुष्ट हो गए। वे जान गए कि ये ही वे पंक्तियां हैं जो उनके अवचेतन के जंगल में गुम हो गई थीं। उम्रदराज विद्वान ने पांच पाउंड का मेहनताना मांगा तो कवि कॉलरिज ने कहा कि कविता के प्रकाशन से उन्हें बमुश्किल कुछ पेन्स मिलेंगे। कॉलरिज ने उम्रदराज विद्वान से कहा कि उसने मात्र चंद क्षण ही काम किया है, जिसके लिए पांच पाउंड राशि बहुत अधिक है। उम्रदराज व्यक्ति ने कहा कि वह चंद क्षणों में अधूूरी कविता को इसलिए पूरा कर सका, क्योंकि उसने दशकों तक अध्ययन किया है। तेल की जगह खुद को जलाकर रात-रातभर अध्ययन किया है। अगर उन रतजगों के हिसाब से मेहनताना मांगा जाए तो वह पांच पाउंड के कहीं अधिक होगा। सारांश यह है कि उम्र के हर दौर का अपना महत्व है और जीवन पर छोटे-बड़े सभी अनुभवों का प्रभाव बना रहता है। ज्ञातव्य है कि अभिनेता क्लिंट ईस्टवुड ने फिल्म निर्देशन अपने उम्रदराज होने पर प्रारंभ किया और महान फिल्मों की रचना की। इसी तरह जॉन वेन लंबे समय तक अपनी सितारा हैसियत कायम रख पाए। हमारे अपने अशोक कुमार ने बहुत लंबी पारी खेली है। अमिताभ बच्चन सक्रिय हैं। वी. शांताराम लंबे समय तक फिल्में बनाते रहे।

यूरोप की पुरानी फिल्म ‘ए बुक ऑफ विशेस’ का कथासार है कि एक अनाथालय में आग लग जाती है। सभी बच्चे बचा लिए जाते हैं, भवन नष्ट हो जाता है। बच्चों को वृद्धाश्रम शिफ्ट किया जाता है। सभी बूढ़े खामोश रहते थे, इसलिए वे बच्चों से परेशान हो गए। समय बीतने पर बूढो़ं-बच्चों में प्रेम हो गया। एक रात एक वृद्ध की मृत्यु हो गई। उसके साथी नहीं चाहते थे कि बच्चों को यह पता चले। अत: आधी रात को मृत देह लेकर वे कब्रिस्तान गए। उन्हें आश्चर्य हुआ कि बच्चे वहां पहले ही पहुंच चुके थे। हर बच्चा तो असीम संभावना है ही, परंतु कोई उम्रदराज व्यक्ति भी अनावश्यक नहीं है। मंगलेश डबराल की पंक्तियां इसी बात को रेखांकित करती हैं- मत भूलो कि तुम्हारी नींदों में, तुम्हारे पूर्वजों के अनगिनत रतजगे शामिल हैं।

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