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चीन से ‘मुकाबले’ के लिए भारत को मजबूत करेगा अमेरिका

3 वर्ष पहले
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पिछले एक दशक से भारत लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों एवं अन्य सैन्य साजो सामान का सबसे बड़ा आयातक देश रहा है। इनमें से ज्यादातर रूस से आयतित हैं क्योंकि भारत इनके लिए दूसरे देशों पर निर्भर है, यहां अमेरिका उसकी मदद करना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने देश में डिफेंस इंडस्ट्री खड़ी करना चाहते हैं, जो अच्छी शुरुआत है। वे अपनी डिफेंस इंडस्ट्री से सेना की जरूरतें पूरी करना चाहते हैं और दूसरे देशों को हथियार निर्यात भी करना चाहते हैं। इसके लिए भारत सरकार ने विदेशी रक्षा कंपनियों से कहा कि वे भारतीय कंपनियों के साथ समझौता करें और उनके साथ अपनी टेक्नोलॉजी शेयर करें।
अमेरिका का ट्रम्प प्रशासन भारत को सहयोग करने के लिए तैयार है, इसमें अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी शेयर करना भी शामिल है। अमेरिका मानता है कि एशिया के इस क्षेत्र में चीन को सीमित रखने एवं रूस का प्रभाव कम करने के लिए भारत का मजबूत होना जरूरी है। बोइंग एवं लॉकहीड मार्टिन जैसी दिग्गज अमेरिकी डिफेंस कंपनियां इसमें सहयोग करना चाहती हैं। वे भारत के साथ अरबों डॉलर के रक्षा सौदे करने के लिए उत्सुक हैं, क्योंकि इसके पहले रूस और यूरोपीय कंपनियां भारत से ऐसे सौदे करती रही हैं।


वर्तमान की बड़ी एवं प्रमुख बात 110 लड़ाकू विमानों का सौदा है, जो करीब 1500 करोड़ डॉलर का होगा। बोइंग और लॉकहीड मार्टिन यह सौदा हासिल करने के लिए भारतीय कंपनियों के साथ जुड़ना चाहती हैं। अमेरिकी कंपनियों को रूस, फ्रांस और स्वीडन की कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी। रूस के मिग विमान भारतीय सेना लंबे समय से इस्तेमाल कर रही है। भारत सरकार चाहती है कि इस सौदे के ज्यादातर विमान उसके ‘नए कॉन्ट्रैक्ट’ के अंतर्गत हों और उनका निर्माण भारत में ही हो। इस कॉन्ट्रैक्ट के नियम विदेशी कंपनियों को प्रोत्साहित करने वाले हैं। इसमें उन्हें भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर पार्ट्स का निर्माण या फिर पूरा उत्पादन ही यहीं करना होगा। जो विदेशी कंपनी ऐसा करती है, उसका फायदा ज्यादा होगा क्योंकि लागत बहुत कम हो जाएगी।

 

सार यह है कि भारत सरकार चाहती है कि विदेशी कंपनियां अपनी महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी भारतीय कंपनियों के साथ शेयर करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में चेन्नई में हुए ‘डिफेंस एक्सपो’ में कहा कि आज किसी भी मैन्युफैक्चरिंग इकाई के लिए जरूरी है कि उसकी सप्लाई चेन प्रभावी हो। यहां प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ पर जोर दिया, जिससे भारत में उत्पादित चीजों का दुनियाभर में निर्यात हो सके। बोइंग भारत को एफ/1-18 हॉर्नेट एडवांस एयरक्राफ्ट देना चाहती है, इसके लिए वह हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और महिंद्रा ग्रुप के साथ मिलकर काम करेगी। इसी तरह लॉकहीड मार्टिन टाटा के साथ जुड़कर एफ-16एस एयरक्राफ्ट के लिए सहयोग प्रदान करेगी। कंपनी ने यह भी कहा कि वह साउथ कैरोलाइना स्थित एफ-16 की पूरी प्रोडक्शन लाइन भारत में स्थानांतरित करने के लिए तैयार है, जहां वह टाटा के साथ मिलकर एयरक्राफ्ट तैयार करेगी। इस तरह का कोई भी फैसला लिया जाता है, तो अमेरिका में इसकी इकाइयों में काम करने वाले कई लोग बेरोजगार हो जाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि लॉकहीड के पास फिलहाल कोई बड़ा ऑर्डर नहीं है। हालांकि भारत से कोई ऑर्डर इस कंपनी को मिलता है तो अमेरिका की पार्ट्स आपूर्ति करने वाली कंपनियों में नए जॉब तैयार होंगे। 


भारत में अमेरिकी कंपनियों की इकाई स्थापित करने में कई स्तर पर बातचीत होगी, लेकिन यह स्पष्ट है कि अमेरिकी सरकार इसमें सीधे तौर पर शामिल है। इस तरह की डील में ट्रम्प प्रशासन का मुख्य उद्देश्य भारत को ज्यादा हथियार बेचकर एवं उसे टेक्नोलॉजी हस्तांतरित करके एशिया में चीन के खिलाफ संतुलन कायम करना है। यह स्पष्ट है कि चीन का रक्षा बजट भारत की तुलना में तीन गुना अधिक होता है, लेकिन भारत अपनी नौसेना को अधिक मजबूत कर रहा है। इसमें खुद की परमाणु पनडुब्बियों का निर्माण भी शामिल है। यहां अमेरिकी चाहें तो भारत की मदद करके हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने सकते हैं। भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में निजी रक्षा कंपनियों को उनकी प्रगति के लिए प्रोत्साहित किया है। उनमें टाटा और महिंद्रा के साथ सैकड़ों छोटी एवं मध्यम कंपनियां हैं। यही कारण है कि भारत सरकार विदेशी रक्षा आपूर्ति कंपनियों से कहती है कि वे डील की 30 फीसदी राशि भारत में ही पुनर्निवेश करें।


अमेरिका टेक्नोलॉजी के हस्तांतरण और भारत में मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए तत्पर है। अमेरिका भारत को वह टेक्नोलॉजी देगा, जो आज तक किसी अन्य देश को नहीं दी गई। लड़ाकू विमानों की यह डील सहयोग को और बढ़ावा देगी।  
-कीनथ जस्टर, भारत में अमेरिका के राजदूत

 

यह ऐसी टेक्नोलॉजी की बात है, जिसे देने से रूस हमेशा इनकार करता रहा है। उम्मीद है कि निजी कंपनियों को भी ऐसी टेक्नोलॉजी मिलेगी, क्योंकि अमेरिकी कंपनियां भारतीय सहयोगियों पर ज्यादा भरोसा करती हैं।

-समीर पाटिल, डाइरेक्टर, सेंटर फॉर इंटरनेशनल सिक्यूरिटी


बोइंग ने एएच-64 एडवांस अपाचे हेलिकॉप्टर की डील के लिए टाटा के साथ जॉइंट वेन्चर में हैदराबाद में पार्ट्स इकाई स्थापित की। आज वहां से दुनियाभर में पार्ट्स की आपूर्ति की जाती है। इससे हमारा पैसा बचता है और भारतीयों को वह क्षमता मिलती है जो पहले नहीं थी। आज हम 3.1 अरब डॉलर का बिज़नेस कर रहे हैं।
-प्रत्युश कुमार, प्रेसीडेंट, बोइंग इंडिया


बोइंग और लॉकहीड के साथ पार्टनरशिप महत्वपूर्ण कदम है। हम यहां आश्वस्त करना चाहते हैं कि इससे हम वैश्विक प्रतिस्पर्धा एवं वैश्विक मानकों पर खरे उतरने के लिए बहुत कुछ कर पाएंगे। इसके लिए ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनना होगा, जो हम बन रहे हैं।
-बनमाली आगरावाला, प्रेसीडेंट, टाटा इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस एवं एयरोस्पेस

 

© The New York Times

दैनिक भास्कर से विशेष अनुबंध के तहत

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