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डाउनलोड करेंइंदौर. एक बोरे में छह टुकड़ों में मिली कविता रैना को आखिर किसने मारा, यह सवाल तीन साल बाद फिर खड़ा हो गया है। क्योंकि पुलिस ने जिस महेश बैरागी को आरोपी माना था, उसे जिला कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया। कोर्ट ने कहा- अभियोजन पक्ष मात्र दो साक्ष्य साबित कर सका। बाकी प्रमाणित नहीं किए। स्पेशल सेशन जज बीके द्विवेदी ने फैसला सुनाते हुए आरोपी महेश को रिहा करने के आदेश दिए। जबकि इस मामले की जांच में 80 अफसर जुटे थे।
तत्कालीन डीआईजी संतोष कुमार सिंह ने तो यहां तक कहा था कि हमारी जांच इतनी सटीक है कि पुलिस अकादमियों में इसका प्रेजेंटेशन दिखाया जाएगा। मित्र बंधु नगर निवासी 30 वर्षीया कविता 24 अगस्त 2015 को स्कूल गई बच्ची को लेने बस स्टॉप पर गई थी, किंतु घर नहीं लौटी थीं। तीसरे दिन 26 अगस्त को उनका शव तीन इमली चौराहे के पास पुल के नीचे बोरे में बंद मिला था।
भंवरकुआं पुलिस ने हत्या के आरोप में धारा 302 और साक्ष्य छिपाने के आरोप में धारा 201 के तहत केस दर्ज कर महेश बैरागी को 9 दिसंबर को गिरफ्तार किया था। तब से वह जेल में था। अभियोजन पक्ष की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक निर्मलकुमार मंडलोई ने 41 गवाहों के बयान कराए।
उन्होंने अदालत से कहा था कि गवाहों के साक्ष्य से हत्या प्रमाणित है और आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। बचाव पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट चंपालाल यादव ने गवाहों के क्रॉस किए और अपनी तरफ से गवाह पेश कर बयान कराए थे।
इन आधारों पर बरी हुआ आरोपी...
कोर्ट ने फैसले में कहा- अभियोजन पक्ष केवल आरोपी के साईं कृपा इलेक्ट्रिकल्स की दुकान पर 26 अगस्त 2015 को कविता के फुटेज लेने जाना, अभियुक्त द्वारा 20 अगस्त 2015 को 11 माह के लिए दुकान किराए पर लेने और 1 सितंबर 2015 को दुकान खाली करने संबंधी साक्ष्य ही प्रमाणित कर पाया। (गौरतलब है कविता बेटी को लेने के लिए रोज इलेक्ट्रिकल्स दुकान के सामने खड़ी होती थी। 26 अगस्त 2015 को जिस दिन उसका शव मिला था, उसके बाद आरोपी दुकान पर उस समय का सीसीटीवी फुटेज लेने गया था। दुकानदार ने फुटेज देने से मना कर दिया था।)
- इन दो परिस्थितियों को छोड़ बाकी साक्ष्य प्रमाणित नहीं हो सके। अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों से संदेह उत्पन्न हुआ।
- दोनों पक्षों की ओर से पेश साक्ष्यों की विवेचना के आधार पर कोर्ट के मत में अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ हत्या करने और उसके संबंध में साक्ष्य छिपाने के आरोप को प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा।
- कोर्ट ने फैसले में कहा- केस डायरी विधिक प्रावधान में न होकर अलग अलग पन्नों में थी, जो पुलिस की कार्रवाई की विश्वसनीयता पर प्रभाव डालती है।
- प्रकरण में रोजनामचा तय फॉर्मेट में न होकर केवल कम्प्यूटर पर टाइप है, जिससे केस डायरी और रोजनामचा की पवित्रता पर भी संदेह के घेरे में आई है।
फैसला सुनते ही बिफरे कविता के परिजन...
फैसला सुनने के लिए कोर्ट कक्ष में कविता के पति संजय रैना, भाई प्रकाश व भाभी श्रद्धा, मां कांता, दो बहनें संगीता, ममता, काका त्रिलोकचंद, काकी द्रोपदी और अन्य परिजन थे। शाम लगभग चार बजे अदालत ने कहा- साक्ष्य के अभाव में आरोपी को बरी किया जाता है। यह सुनते ही परिजन कोर्ट कक्ष में ही कहने लगे- ऐसे कैसे बरी कर दिया? उसने छह टुकड़े किए थे कविता के। यह कहते हुए सभी रोने लगे और तभी पुलिस ने सभी को कोर्ट कक्ष से बाहर कर दिया। बाहर परिजन चीत्कार करने लगे। उनका कहना था उन्हें न्याय नहीं मिला। बाद में रोते हुए सभी चले गए।
तीन साल पहले जो दु:ख सहा, उससे ज्यादा सदमा आज लगा: पति संजय
9 साल की बेटी और 12 साल का बेटा आज तक ठीक से नहीं सो पाते हैं। तीन साल पहले जो दु:ख सहा, उससे कुछ ज्यादा ही आज महसूस हो रहा है। बेटे ने मुझसे पूछा कि पापा अब क्या होगा? मेरी तो हिम्मत टूट गई थी, लेकिन बेटे और बेटी का चेहरा देखकर खुद को संभाल लिया। मैंने बेटे के सिर पर हाथ फेरा। कहा कि हम हारने वाले नहीं हैं। हाई कोर्ट जाऊंगा। सीबीआई से जांच कराने के लिए लड़ूंगा।
केस की रिपोर्टिंग करने वाले भास्कर के दीपेश शर्मा ने फैसले के 75 पन्नों का गहराई से अध्ययन कर ये तथ्य निकाले
1. चश्मदीद एक भी नहीं- एक भी चश्मदीद नहीं, आरोप तभी साबित होता, जब पुलिस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से कड़ियां जोड़े बिना संदेह साबित कर देती कि अपराध महेश ने ही किया है।
2. कुर्ते की पहचान भी नहीं कराई- कुर्ते के नाप के लिए महेश कविता को फ्लैट ले गया था। मीना ने कहा कुर्ता 18 अगस्त को ही दे दिया था। न क्रास हुआ न ही कुर्ते की पहचान कराई गई।
3. डाटा दो ही दिन का क्यों - लापता होने से नैालखा पार्किंग पर महेश के होने तक का ही दो दिन का पीएसटीएन डाटा पेश किया। कोर्ट ने इसे महेश का संभावित रूट माना।
4. फ्लैट कैसे मिला नहीं बता सके - पुलिस ने मूसाखेड़ी में हत्या होने का दावा किया, लेकिन इस फ्लैट की जानकारी कैसे मिली यह कोर्ट को बताया ही नहीं गया।
5. कपड़े जले, गंध तक नहीं - फ्लैट में हत्या, कपड़े जलना, लाश ले जाने की पुलिस की थ्योरी की पुष्टि आसपास के किसी व्यक्ति ने नहीं की और न कोई साक्ष्य मिला।
6. चाबियां मिली, ताला गायब - टीआई राजेंद्र सोनी ने बताया उक्त फ्लैट पर पहली बार कुंडी लगी मिली थी। जबकि दस्तावेजों में महेश के पास चाबियां मिलना बताई, ताला नहीं मिला।
7. चाकू पर बाद में खून कैसे - एफएसएल ने बेंजिडिन टेस्ट में चाकू पर खून नहीं मिलने की रिपोर्ट दी जब चाकू क्वेरी के लिए गया तो एमवाय अस्पताल के डॉक्टरों को खून मिला।
8. पाइप की दूसरी जांच नहीं की - लोहे के जिस पाइप से हत्या की गई उस पर खून की जांच बेंजिडिन टेस्ट से साबित की गई लेकिन दूसरी जांच नहीं की गई, जिससे अपराध साबित हो पाता।
9. खून जब्ती का पंचनामा - पुलिस ने फ्लैट से जो खून के नमूने जब्त किए उसका उल्लेख पंचनामे के साथ था ही नहीं। इससे माना गया कि फ्लैट से खून मिला ही नहीं।
10. छोटे चाकू से काटना मुश्किल - पुलिस ने 12 इंच के चाकू से शव के टुकड़े करना बताया, वहीं एमवाय अस्पताल के डॉ. एके रस्तोगी ने बताया इतने छोटे चाकू से यह संभव नहीं।
11. पार्किंग वाले की कहानी जुदा - बैरागी द्वारा गाड़ी नैालखा बस स्टैंड की पार्किंग पर ले जाना बताया लेकिन यह उल्लेख नहीं किया कि पार्किंग वाले का महेश से विवाद हुआ था।
12. आरोपी से टीआई अनजान - कोर्ट ने आदेश में लिखा कि क्राइम ब्रांच ने 23 दिन तक महेश को संदिग्ध मानकर हिरासत में रखा लेकिन टीआई इस बारे में गोलमोल जवाब देते रहे।
आगे क्या : केस रिओपन नहीं कर सकती पुलिस
पुलिस अब इस घटना को रिओपन नहीं कर सकती, लेकिन हाईकोर्ट में गलती सुधार सकती है। सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर अपनी बात मजबूती से रखना चाहिए। अपील में पुलिस बता सकती है उसके ऐसे कौनसे बिंदु थे जो सजा दिलाने के लिए चालान में उल्लेखित किए गए थे। वहीं कविता के परिजन भी हाईकोर्ट जा सकते हैं। किसी अन्य एजेंसी से जांच की मांग कर सकते हैं।
-एडवोकेट विवेक सिंह, सदस्य स्टेट बार काउंसिल
155 लाशें पूछ रहीं सवाल...तो हमारा हत्यारा कौन?
हत्या का यह अकेला ऐसा मामला नहीं है, जिसमें आरोपी बरी हो गया है। भास्कर की पड़ताल में सामने अाया है कि इंदौर जोन के 8 जिलों में 4 साल में 1466 लोगों की हत्या की गई। इनमें सिर्फ 295 मामलों में ही फैसला आ सका, जिनमें भी 155 केस में आरोपी बरी हो गए। ऐसे केस में जांच तो दूर, पुलिस ने इनकी फाइल ही बंद कर दी। जबकि 2013 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सीके प्रसाद और जेएस खेहर की बेंच ने राज्य सरकारों को छह महीने में सिस्टम डेवलप करने के निर्देश दिए थे।
सीधी बात - संतोष कुमार सिंह, तत्कालीन डीआईजी और राजेंद्र सोनी, तत्कालीन भंवरकुआं टीआई।
जांच सही दिशा में थी, फैसला देखना होगा...
सवाल - पुलिस की थ्योरी गलत साबित?
डीआईजी : थ्योरी सही थी, साक्ष्य प्रेजेंटेशन समयावधि में जरूरी है।
टीआई : एक भी गवाह पलटा नहीं, जांच में कोई कमी नहीं थी।
सवाल - सही प्रेजेंटेशन नहीं कर सके?
डीआईजी : यह स्थानीय अधिकारी बेहतर बता सकेंगे।
टीआई : हमने सारे तथ्य सिलसिलेवार ही रखे थे।
सवाल - तो, कहां कमी रह गई?
डीआईजी : जांच सही दिशा में थी, फैसला देखकर बोल पाएंगे।
टीआई : फैसले का अध्ययन करना होगा।
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