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तुंबाड़ फिल्म रिव्यू

तुंबाड एक हॉरर फिल्म है लेकिन इसके शानदार विजुअल और बच्चे के शानदार अभिनय से ज्यादा,भव्य सिनेमेटिक एक्सपीरियंस देती है।

Dainik Bhaskar

Oct 12, 2018, 05:28 PM IST
Tumbbad Film review
स्टार 4
शुभा शेट्‌टी शाह
तुंबाड एक हॉरर फिल्म है लेकिन इसके शानदार विजुअल और बच्चे के शानदार अभिनय से ज्यादा यह भव्य सिनेमेटिक एक्सपीरियंस देती है।
तुंबाड की कहानी नई और बेहद दिलचस्प है। इसका स्क्रीनप्ले मितेश शाह, आदेश प्रसाद, राही अनिल बर्वे और आनंद गांधी ने लिखा है। इस कहानी को ऐसे चित्रांकित किया गया है कि आप तुरंत इसमें इनवॉल्व हो जाते हैं। कहानी 1900 की है, तुंबाड़ एक शापित गांव है। जहां पर खजाना छुपा हुआ है। विनायक राव, पैलेस के सरकार की नाजायज औलाद है। वह किसी भी हालात में खजाने का पता लगाना चाहता है। वह गांव में जीर्ण शीर्ण घर में रहता है। जहां उसके साथ भाई, मां (ज्योति मशाले) और दादी रहती हैं। दादी को जंजीरों में बांधकर रखा गया है। आप उन्हें रोते और कराहते देख सकते हैं। उन्हें सुलाने के लिए एक वाक्य का यूज किया जाता है जो है 'सो जा नहीं तो हस्तर आ जाएगा'। हस्तर एक पौराणिक देवता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह खजाने पर नजर रखता है। क्षत-विक्षित पैलेस, दादी की उपस्थित और लगातार होती बारिश फिल्म में डर का मौहाल क्रिएट करती है।
जल्द ही फैमिली के साथ दोहरी ट्रेजडी हो जाती है जिसकी वजह से वे दादी को छोड़कर तुंबाड़ से चले जाते हैं। हालांकि विनायक खजाने को छोड़कर नहीं जाना चाहता। उसका लालच उसे 15 साल बाद गांव वापस आने पर मजबूर करता है। विनायक (सोहम शाह) अब दादी या किसी भी परिस्थिती से नहीं डरता। उसे लगता है कि खजाने पर उसका पूरा हक है और उसे ढूंढना शुरू कर देता है। उसे इस बात का अनुमान नहीं है कि खजाना का रहस्य खोलने के बाद उसको क्या कीमत चुकानी पड़ेगी। खजाने का पता लगाने के बाद विनायक भ्रष्टाचार, दुर्व्यवहार और अहंकार का जीवन जीने लगता है, और आखिर में लालच के कारण अपनी लाइफ को बर्बाद कर लेता है।
फिल्म महात्मा गांधी के कोट जिसमें कहा गया है कि 'दुनिया में इंसान की जरूरत के लिए पर्याप्त साधन हैं लेकिन, उसके लालच के लिए नहीं' पर आधारित है। फिल्म में आगे जाने पर जो चीजें सामने आती हैं उससे यह कोट प्रासंगिक लगने लगता है। राही अनिल और आनंद गांधी का डायरेक्शन में निरंतरता और विश्वास साफ दिखाई देता है।
कहानी को दो बच्चों के हिसाब से बुना गया है। पहला विनायक और दूसरा उसका बेटा (मोहम्मद समद)। जो इस कहानी को अविश्यनीय बनाता है। कहानी के प्रमुख पात्रों को बेहद बरीकी से गढ़ा गया है। नितिन जिहानी चौधरी का प्रोडक्शन डिजाइन कमाल का है। वहीं राकेश यादव और पकंज कुमार ने मिलकर ऐसी जानदार सिनेमेटोग्राफी की है जो आपको सांस थमाने के लिए मजबूर कर देगी। सोहम शाह जो कि फिल्म के प्रोड्यूसर हैं ने निगेटिव किरदार निभाया है। वे अपने रोल में पूरी तरह फिट हुए हैं। साथ ही यंग एक्टर मोहम्मद समद अपनी गंभीर परफॉर्मेंस से आपका दिल चुरा लेंगे।
इस फिल्म को जरूर देखिए क्योंकि एक बॉलीवुड की अब तक की अनोखी हॉरर फिल्म है, जो वादे से कहीं ज्यादा देती है।

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