सुवर्णरेखा, राढ़ु व कांची नदी के संगम स्थल वरेंन्दा में टुसू सतीघाट मेला अाज

News - इस वर्ष सतीघाट मेला 16 जनवरी को है। सुवर्णरेखा, राढ़ु और कांची नदी के संगम स्थल वरेंन्दा में लगने वाला टुसु मेला...

Jan 16, 2020, 07:26 AM IST
Muri News - tusu satighat fair today at varenda the confluence of suvarnarekha radhu and kanchi rivers
इस वर्ष सतीघाट मेला 16 जनवरी को है। सुवर्णरेखा, राढ़ु और कांची नदी के संगम स्थल वरेंन्दा में लगने वाला टुसु मेला सतीघाट मेला है। कुड़माली संस्कृति से जुड़े लेंगहातु कलवाडीह के भगीरथ महतो के अनुसार सतीघाट मेला सती पथ और सत्य पथ का इतिहास स्थल सतीघाट मेला है। भगवान शिव देवी सती का देह लेकर इसी मार्ग से गुजरे थे। वनवास के क्रम में प्रभु श्री राम माता सीता और लक्ष्मण जी भी इस स्थल पर स्नान कर मानभुमी वेष भूषा में कुड़माली संस्कृति की खान पान किए थे । द्रोपदी और पांडव यहां पर रात्री विश्राम किए थे तभी से उस स्थल को लोग पांडुडीह कहते आये है। कहा जाता है भगवान शिव और माता पार्वती पांडव के वनवास के क्रम में अर्जुन की धनुर विद्या की परीक्षा लेने के लिए किरात किरातीन मानभूमी वेष भूषा में वरहा शिकार किया था । धनुर विद्या और द्वन्द विद्या में निपुन पाकर भगवान शिव ने उन्हें खुशी पूर्वक अपना धनुष अर्जुन को इसी क्षेत्र में सौंपा था उसी धनुष से अर्जुन ने महाभारत का युद्ध लड़ा था ऐसी मान्यता है कुड़माली संस्कृति में है इसी कथा को छौ नृत्य के उस्ताद धुंधा महतो ने छौ नृत्य के माध्यम से सबसे पहले दिखाया था। टुसु अपने जीवन काल कुछ समय इसी क्षेत्र में भी वितायी थी ऐसी कुड़माली संस्कृति में मान्यता है। जल समाधी के बाद अन्तिम बार लोगों को लोगों को टुसु ने यहां दर्शन दिया था और आशीर्वाद बरसायी थी इसलिए लोगों ने टुसु को श्रद्धांजलि देने के लिए गीत झूमर नाच गाना के साथ यहां आते हैं कुड़माली पाॅचपरगनिया और मानभुमी कुड़माली गीत लोगों के मन को मोह लेते हैं । इस मेला में लोकाचार, कुलाचार और शिष्टाचार देखने को मिलता है। मेले एवं टुसु पर्व में कोई वैदिक विधि नही है । गीत ही वेद और लोकाचार ही पुराण है। ऐसी मान्यता है कि यहां भ्रष्टाचारी और बेईमान आदमी भी यदि आता है तो वह भी भ्रष्टाचार और बेईमान का मार्ग छोड़ कर सत्य मार्ग पर चलने लगता है। यह स्थान असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक स्थल है। मेला में शिव पार्वती, टुसु और भूत वंश सवरनी मॅाय की पुजा की जाती है। मेला में ढोल नगाड़ा, गाजे बाजे के साथ बड़े बड़े टुसु और चैड़ल प्रदर्शित की जाती है। मेला में सीललोढ़ा, लकड़ी के बने समान और ढोल नगाढ़ा आदि वाद्ययंत्र की भी खूब बिक्री होती है। रेल एवं पथ मार्ग से यहां सिल्ली, मुरी, तोरांग और सुईसा से आया जा सकता है।

सतीघाट मेला क्षेत्र में बना मंदिर।

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