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डाउनलोड करेंचित्तौड़गढ़ (जयपुर). सदमा कितना ही गहरा हो, दूसरों की सेवा करके भी उससे उभरा जा सकता है। चित्तौड़गढ़ के बूरियों का खेड़ा गांव की कंकूबाई बंजारा (65) यही कर रहीं हैं। पिता और भाई की मौत के सदमे से उभरने के लिए उन्होंने 20 वर्ष पहले प्याऊ लगाकर लोगों को पानी पिलाना शुरू किया जो अब तक जारी है। वे हर गर्मी में तीन महीने गांव से एक किमी दूर सड़क किनारे प्याऊ लगाती हैं। इसके लिए रोज इतनी ही दूरी से पानी लाती हैं और राहगीरों को खुद पिलाती हैं।
अब बुजुर्ग हो जाने के कारण एक किमी दूर से पानी लाने में परेशानी आती है, ऐसे में लोग उनकी मदद करते हैं। कंकूबाई हर दिन सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक की प्याऊ पर लोगों को निःशुल्क पानी पिलाती हैं। अब उम्र बढ़ने के साथ भी उन्होंने पानी पिलाना नहीं छोड़ा।
पिता व भाई की मौत का सदमा बना सेवा का जज्बा
कंकुबाई ने बताया, 20 साल पहले पिता का निधन हुआ। उसके 10 माह बाद छोटे भाई की भी अकाल मौत हो गई। इस सदमे में वे उनको याद कर रोती रहती थीं। परिजनों और गांववाले ने सदमे से उबारने के लिए उन्हें गांव के पास से गुजर रहे मुख्य मार्ग पर प्याऊ लगा जल सेवा के लिए बिठा दिया। कहा कि प्यासे को पानी पिलाने से पिता व भाई की आत्मा को शांति मिलेगी। पहली गर्मी में ढाई महीने प्याऊ लगाने पर यह काम उन्हें ऐसा रास आया कि अब तक छोड़ा नहीं। कहती हैं कि जब तक हाथ पांव चल रहे हैं वे पिता व भाई की याद में यह सेवा जारी रखेंगी।
70 साल की कंकूबाई ने मंदिर के आश्रम को सौंप दी 15 लाख के घर की चाबी...
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा...आरती की ये पंक्तियां सोमवार (21 मई) को आरणी गांव में उदाहरण बन गईं। जब 70 वर्षीय कंकूबाई सांखला करीब 15 लाख रुपए के अपने घर की चाबियां मंदिर के आश्रम के लिए सौंप दिया। वे खुद भी इसमें भक्त या जरूरतमंद शरणार्थी के रूप में रहेंगी।
चित्तौड़गढ़ के आरणी गांव की कंकूबाई के पति का निधन दो साल पहले हो गया। उनकी कोई संतान नहीं है। उन्होंने अपना घर मंदिर को दान करने का मन बनाया। उन्होंने तीन महीने पहले घर की रजिस्ट्री गांव के श्रीगोपाल नृसिंहद्वारा मंदिर के नाम करा दी। अब उन्होंने समारोह पूर्वक अपना मकान मंदिर को सौंप दिया। गांव के बीच यह मकान करीब 15 लाख रुपए का है।
ताकि मरने के बाद पुण्य कार्य में काम आए
कंकूबाई का कहना है कि वे अधिकांश समय अपने भाई के पास रहेंगी। गांव आने का मन हुआ तो इसी घर में चलने वाले आश्रम में रहेंगी। फिलहाल घर का एक कमरा उनके लिए रिजर्व रहेगा। उनकी सोच है कि मरने के बाद घर का दुरुपयोग न हो और यह अच्छे कार्यक्रमों की स्थली बने। आरणी गांव में इस मंदिर का नाम नृसिंहद्वारा है। कंकूबाई के अनुसार, नाम के अनुरूप आश्रम भी होना चाहिए, लेकिन जगह की कमी थी। इसलिए मैंने घर भेंट किया। अब यह नृसिंहद्वारा आश्रम कहलाएगा।
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