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मलखंभ को पहले पूरे देश में फैलाया, फिर दुनिया के 35 देशों में स्थापित किया

उदय देशपांडे

Jul 22, 2018, 11:08 PM IST
उदय देशपांडे, सेक्रेटरी, विश्व उदय देशपांडे, सेक्रेटरी, विश्व

कॉलेज में मैं सभी खेल खेलता था। वॉलीबॉल, बैडमिंटन, स्वीमिंग, खो-खो, जिमनास्टिक। इंटर यूनिवर्सिटी में तो मैं वॉलीबॉल में मुंबई यूनिवर्सिटी का कैप्टन था। इन सब के बीच मलखंभ कभी नहीं छूटा। मैंने देखा कि खेल कोई भी हो उसकी नींव मलखंभ में है। किसी भी खेल में स्ट्रैंग्थ, स्टेमिना, एंड्यूरेंस, न्यूरो-मस्क्यूलर कोऑर्डिनेशन आदि को मलखंभ में बहुत अच्छी तरह विकसित किया जा सकता है। खेद की बात यह है कि भारत में वह लुप्त होता जा रहा है। इसलिए मुझे लगा इस क्षेत्र में काम करके इसे बढ़ावा देना चाहिए। मैंने जब शुरुआत की तब महाराष्ट्र के चार जिलों मुंबई, पुणे, सांगली, सातारा में मलखंभ था। फिर में महाराष्ट्र के प्रत्येक जिले में जाने लगा। अब महाराष्ट्र के प्रत्येक जिले में मलखंभ संगठन है। 1981 में मलखंभ फेडरेशन ऑफ इंडिया का सेक्रेटरी बना। उस वक्त भी महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में ही मलखंभ था। फिर मैं हर राज्य में गया पूर्वोत्तर के असम, अरुणाचल से लेकर दक्षिण के तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, केरल तक। 2011 में जब में रिटायर हुआ तो 29 राज्यों में मलखंभ के संगठन बन चुके थे।


सबसे बड़ी चुनौती मलखंभ और कस्टम्स व सेंट्रल एक्साइज की नौकरी में संतुलन की थी। मैं जब इंस्पेक्टर था तो नाइट शिफ्ट मांग ली। उसमें वक्त मिल जाता। सुपरिंटेंडेंट हुआ तो मैंने समुद्री गश्त मांग ली। रात में गश्त और सुबह मलखंभ। सौभाग्य यह रहा कि उन दिनों मेरा तबदला नहीं हुआ। 2011 में मेरा तबादला गुजरात के भावनगर में हुआ पर तब भी मैं 16 घंटे का सफर करके शुक्रवार-शनिवार को मुंबई आ जाता था और बस, ट्रेन, फ्लाइट जो मिल जाए उससे मैं सोमवार को सही वक्त पर ड्यूटी पर हाजिर हो जाता था। इस तरह तीन साल निकाले। चूंकि मलखंभ का जुनून था तो कोई भी कठिनाई उठाने को मैं तैयार रहता था। गुजरात में तो मेरे एडिशनल कमिश्नर ने आपत्ति भी उठाई कि आप हर शनिवार-रविवार मुंबई नहीं जा सकते। फिर उड़ीसा से आए कमिश्नर से मिला। उन्होंने कहा, ‘देशपांडे आपका काम मैंने हिस्ट्री चेनल पर देखा है। हमारे में से कोई भी यह काम नहीं कर सकता। कम से कम हमें आपकी मदद तो करनी ही चाहिए। आप चिंता मत कीजिए।’ उन्होंने कहा कि आप एक नोट लिखकर जाया कीजिए कि ‘एज़ पर कमिश्नर्स परमिशन आई एम लिविंग फॉर बॉम्बे।’


1997 में जापान में टेलीगेम्स नामक आयोजन हुआ। इसमें चीन की 15 लोगों की टीम थी और मुंबई से हमारी टीम को आमंत्रण था। टेलीफोन बूथ जैसा कांच का कक्ष था। चुनौती थी कि कितने अधिक से अधिक लोग उसमें आप ला सकते हैं। हमारी 15 की पूरी टीम अंदर चली गई और मैंने अंदर से सिटकनी भी लगा ली, जबकि चीन की टीम के 14 लोग बमुश्किल उसमें जा सके। चूंकि ये फन गेम था तो दोनों टीमों को विजेता घोषित किया पर आयोजकों ने हमसे पूछा कि यह आपने कैसे किया। मैं बताया कि हम मलखंभ करते हैं इसलिए यह कर सके। उन्होंने पूछा कि यह क्या है। हम मलखंभ यानी वह खंबा ले गए थे। उस पर हमने व्यायाम की विभिन्न मुद्राएं करके दिखाई और निप्पान टीवी ने उसका सीधा प्रसारण किया।


जर्मनी में एक राइनहार्ट नाम के सज्जन थे, जिनमें रोगप्रतिरोधक शक्ति कम थी, जिसके कारण वे हमेशा बीमार रहते। किसी ने उन्हें योगासन करने की सलाह दी। वे योगासन करके ठीक हो गए तो उन्होंने वहां योगासन का प्रचार शुरू कर दिया। वे एक बार योग गुरु बीकेएस आयंगर से प्रशिक्षण लेने भारत आए और लौटते समय वे पुणे में महाराष्ट्रीयन मंडल आए, जहां चल रहे मलखंभ से वे बहुत प्रभावित हुए। उनकी बड़ी इच्छा थी कि कोई भारत जाकर मलखंभ सीखे और लौटकर जर्मनी में इसे शुरू करे। 2002 में उनकी एक शिष्या यूटाश श्नाइडर ने कहा कि मैं भारत जाकर मलखंभ सीखती हूं। वह वहीं गई जहां राइनहार्ट ने मलखंभ देखा था लेकिन, वहां उन्हें कहां गया कि यह काम बच्चों का है आप नहीं कर सकतीं। वे निराश होकर ओशो आश्रम चली गईं।


वहां उन्हें राहुल केसरकर नामक सज्जन मिले, जिन्होंने उन्हें मेरे बारे में बताया। उन्होंने मेरा नंबर खोज निकाला और कहां कि मैं जर्मनी से आई हूं और मलखंभ सीखना है। मैंने कहा आप मुंबई आ जाइए। उन्होंने कहा कि मैं उनपचास साल की हूं तो मैंने कहा तो क्या हुआ। अगले दिन शिवाजी पार्क स्थित समर्थ व्यायामशाला पहुंच गई और पूछा कब से शुरू करें मैंने कहा अभी से। उसे दिन मेरे बड़े भाई के बेटे की शादी थी और मैं शादी के लिए कपड़े पहनकर तैयार बैठा था। मैंने व्यायाम की पोशाक पहनी और करीब दो घंटे उन्हें मलखंभ सिखाया। वे दो महीने रहीं और मलखंभ में कुशल हो गईं।


फिर वे जर्मनी गईं और 2004 में उन्होंने पत्र लिखा कि हम यहां मलखंभ का शिविर करना चाहते हैं। हम आपका यहां का खर्च उठा लेंगे पर आने-जाने के किराए की व्यवस्था आपको करनी होगी। उस समय हमारा सालाना शिविर चल रहा था। उसमें 2 हजार बच्चे आए थे। नौकरी भी थी। इसलिए उनके दो पत्रों का जवाब नहीं दे पाया। फिर उन्होंने किसी के संपर्क से मुझ तक बात पहुंचाई कि क्या किराया न होने से मैं नहीं आ रहा हूं। मैंने उन्हें जवाब दिया कि मलखंभ के लिए किराया तो क्या मैं वहां का खर्च भी उठा सकता हूं। मैंने जर्मन सीखी और वहां शिविर किया। वह इतना सफल हुआ कि हर साल में अगस्त में वहां जाता हूं। हर साल सौ बच्चे सीखते हैं और इन 15 वर्षों में 1500 बच्चे वहां मलखंभ में तैयार हुए हैं। इसी तरह दौरे कर-करके मैंने 35 देशों में मलखंभ स्थापित करने में सफलता पाई है। अब मलखंभ की अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाएं होने लगी हैं और विश्वकप भी होने जा रहा है।

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