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अंडर-30Y कॉलम: राजनीति का स्तर गिरा रही है नेताओं की अमर्यादित भाषा

करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

Danik Bhaskar | Sep 06, 2018, 01:15 AM IST
पीयूष कुमार पीयूष कुमार

हमारे देश की राजनीति में भाषा एक महत्वपूर्ण अंग होती है। लोकतंत्र में उसी नेता का बोल-बाला होता है, जिसकी भाषा पर पकड़ मजबूत होती है। आज़ादी के बाद देश में जिस प्रकार राजनीति में बदलाव आता गया, उसी प्रकार राजनेताओं की भाषा और आरोप-प्रत्यारोप की शैली भी बदलती गई। आज कुछ राजनीतिक दलों के नेता अपने विपक्षी राजनेता को ‘पप्पू’ जैसे शब्दों से ताना मारते हैं, तो कोई राजनेता विपक्षी नेता पर ‘फेंकू’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। क्या हमारे देश की राजनीति में मर्यादा नाम का कोई शब्द बचा है? पिछले कुछ दिनों बीजेपी के एक सांसद ने बयान दिया कि ‘नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी नाली के कीड़े समान हैं’। ऐसी अभद्र भाषा का उपयोग करने से पहले हमारे ये राजनेता जरा भी नहीं सोचते कि उसका उनकी पार्टी पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
नेताओं को समझना होगा कि वे जो कहेंगे, उनके प्रशंसक भी उन्हीं बातों का अनुसरण करेंगे। यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले गिरिराज सिंह से लेकर साक्षी महाराज जैसे नेताओं ने विवादास्पद बयानों से देश की राजनीति का स्तर गिराने का काम किया है। राजनीति में मतभेद होते हैं, लेकिन वर्तमान में मतभेद धीरे-धीरे आपसी मनभेद में बदल रहे हैं। नेताओं को यह भूलना नहीं चाहिए कि दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेता तीखे से तीखे बयान बड़ी विनम्रता से कह डालने की खूबी रखते थे।
चुनाव नज़दीक आते ही राजनेताओं के बयान विवादास्पद होने लगते हैं। राजनेताओं द्वारा जिस प्रकार का जहर विपक्षी दलों पर उगला जा रहा है, वह समाज में अशांति और तनाव पैदा करने का काम करती है। इसके लिए जरूरी है कि चुनाव आयोग ऐसे मापदंड बनाए, जिसमें नेताओं को अमर्यादित बयानबाजी करने पर सख्त सजा मिले। जनता को भी समझना होगा कि जिस नेता के बयान इतने कड़वे और अभद्र हैं, वह लोकतंत्र के मंदिर में बैठने लायक है या नहीं। लोकतंत्र में किसी भी नेता को ताकत और शक्ति जनता द्वारा ही मिलती है, जिसका वे उपयोग से लेकर दुरुपयोग तक करते हैं।

पीयूष कुमार, 19 इंटरनेशनल स्कूल ऑफ मीडिया एंड एंटरटेनमेंट स्टडीज़, नई दिल्ली