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अंडर-30Y कॉलम: पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतों के बीच जैव ईंधन से उम्मीद

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Danik Bhaskar | Sep 07, 2018, 01:34 AM IST

भारतीय विमानन इतिहास में पहली बार जैव ईंधन का इस्तेमाल कर देहरादून से दिल्ली तक विमान उड़ाने में भारत ने जो कामयाबी हासिल की है, वह स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। पेट्रोलियम मंत्रालय, भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (देहरादून), तेल कम्पनियां, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (कानपुर), जैसे कई संस्थानों के सहयोग और समन्वय ने जैव ईंधन क्षेत्र में मिसाल कायम की है।

अमेरिका, नीदरलैंड्स और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में विमान उड़ाने में जैव ईंधन का इस्तेमाल किया जाता रहा है। भविष्य में इस ईंधन का इस्तेमाल नियमित व्यावसायिक उड़ानों में करने की योजना भी है। जेट्रोफा यानी रतनजोत नाम की वनस्पति से यह विमानन ईंधन तैयार किया गया है।
धरती के गर्भ में दबे जीवाश्मों से जो ईंधन प्राप्त होता है जैसे पेट्रोल, डीज़ल इत्यादि जीवाश्म ईंधन कहलाते है। इस ईंधन को प्राकृतिक रूप से बनने में सदियां लग जाती हैं। यदि इसी प्रक्रिया को वैज्ञानिक तरीके से कुछ दिनों या घंटों में संपन्न कर लिया जाता है तो इस तरह प्राप्त ईंधन को जैव ईंधन कहते है। वर्तमान में पेट्रोल में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की इजाजत है, जिसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। कुछ माह पहले केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति-2018 भी जारी की है।
चीन और अमेरिका के बाद भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा खपत वाला देश है। भारत कच्चे तेल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए लगभग 82 फीसदी आयात पर निर्भर है, जिसमें तकरीबन 6 लाख करोड़ रुपए खर्च होते हैं। ऐसे में जैव ईंधन के उपयोग को बढ़ाया जाए तो भारत की लगातार महंगे होते तेल आयात पर निर्भरता घटेगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी। पर्यावरण प्रदूषण में कमी आएगी। साथ ही किसानों की समृद्धि लाने में भी सहायक सिद्ध होगी एवं रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। जैव ईंधन भारत के संदर्भ में सामरिक महत्व का भी है। इसे बढ़ावा देने से मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा मिलेगा। भुगतान संतुलन से निपटने के लिए जैव ईंधन किसी वरदान से कम नहीं है।

रजनीश भगत, 23 बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर