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प्रकृति के मास्टर प्लान को समझें मुंबई के शासक- भास्कर संपादकीय

बारिश ने मुंबई को याद दिलाया है कि वह अपने मास्टर प्लान को प्रकृति के अनुसार बदले नहीं तो परेशानी और तबाही बढ़ती जाएगी

Dainik Bhaskar

Jul 11, 2018, 10:48 PM IST
- फाइल - फाइल

एक बार फिर भारी बरसात ने मुंबई को याद दिलाया है कि वह अपने मास्टर प्लान को प्रकृति के अनुसार बदले नहीं तो उसकी परेशानी और तबाही बढ़ती जाएगी। हालांकि इस साल की बारिश अभी उतनी भयावह नहीं है, जितनी 2017 में हुई थी। इसके बावजूद मौसम विभाग ने अगले शुक्रवार तक बारिश होते रहने की भविष्यवाणी की है जिससे साफ है कि तबाही का स्तर बढ़ेगा।

मुंबई की स्मृतियों में 2005 का वह भयानक जल प्रलय है, जिसमें 26 जुलाई को 24 घंटे के भीतर 944 मिलीमीटर बारिश हुई थी और फिर अगले दिन भी मूसलधार वर्षा जारी रही और 644 मिलीमीटर पानी गिरा। उस पानी को धरती सोख नहीं पाई और समुद्र पी नहीं पाया, नतीजतन वह 1,094 लोगों को लील गया। उसकी एक झांकी 2017 में भी प्रकट हुई थी जब 418 मिलीमीटर की बारिश में 14 लोगों की जान चली गई थी। इस साल भी सात-आठ मौतें हो चुकी हैं। कई रेलगाड़ियां रद्द हैं, स्कूल और दफ्तर बंद हैं और डब्बावालों ने अपनी सेवाएं भी स्थगित कर दी थी।

इस साल कोलाबा में 24 घंटों में 170.6 मिलीमीटर और सांताक्रूज में 122 मिलीमीटर की बारिश पिछले भयावह रिकॉर्ड के मुकाबले सहनीय है। लगता है कि बीएमसी ने पिछले अनुभवों से कुछ सबक लिया है और थोड़ी बहुत तैयारी भी की है। लेकिन यह तैयारी तभी तक कारगर रहेगी जब तक प्रकृति थोड़ी नरम है। अगर वह कोप प्रकट करती है तो सारी तैयारी धरी रह जाती है। सामान्य स्थितियों में मुंबई में बारिश हर साल जैसी ही होती है और उसकी मात्रा में ज्यादा विस्तार नहीं हुआ है। जबकि पानी की निकासी का दायरा लगातार सिकुड़ता गया है। कच्ची धरती पर या तो सड़कें बन गई हैं या भवन निर्माण ने सीमेंट से पक्का कर दिया गया है। इसलिए वह पानी सोख नहीं पाती। बरसाती नालों पर कब्जे हो गए हैं और सीवर के पाइप टूट गए हैं।

उधर समुद्र का ज्वार जब साढ़े चार मीटर से ऊपर उठता है तब बाढ़ वाले गेट बंद कर दिए जाते हैं और नालों से निकासी रुक जाती है। मुंबई की ऐसी स्थिति के लिए प्रकृति से ज्यादा मानव और उसमें भी नेताओं और बिल्डरों का गठजोड़ जिम्मेदार है। सिर्फ 603 वर्ग किलोमीटर की आबादी पर दो करोड़ 22 लाख लोगों को बसाना और उनके लिए पानी और उसकी निकासी का इंतजाम करना प्रकृति से अनावश्यक जंग करना है। अगर मायानगरी को बचाना है तो मनुष्य को प्रकृति को समझना होगा।

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