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बुरे इरादों पर पानी फेर दे यह अचूक बगलामुखी मंत्र

शुक्रवार या हर रोज भगवती मां बगलामुखी के इस मंत्र को बोलने से आपको नुकसान पहुंचाने के हर बुरे इरादों पर..

धर्म डेस्क. उज्जैन

Jan 05, 2012, 08:06 AM IST
बुरे इरादों पर पानी फेर दे यह अचूक बगलामुखी मंत्र

जाने-अनजाने में अपनाई गई बुराई, बुरे भाव या बुरे कर्म इंसान के जीवन में दृश्य-अदृश्य नतीजों के रूप में भारी उतार-चढ़ाव भी लाते हैं। चूंकि सांसारिक जीवन में किसी न किसी रूप में अच्छी-बुरी भावनाओं के वश में होकर हर इंसान चूक या भूल करता है। धर्मशास्त्रों के मुताबिक राग-द्वेष की इसी भावना से इंसान कई दु:ख, जाने-अनजाने शत्रुओं या दरिद्रता के द्वारा नुकसान उठाकर दुर्गति का सामना भी करता है।
जीवन को ऐसे ही भय, संशय, दु:ख व व्यक्ति या दुर्गुण रूपी शत्रु बाधा से बचने के लिये दुर्गतिनाशिनी दुर्गा की उपासना अचूक मानी गई है। दुर्गा  भक्ति के लिए नवदुर्गा स्वरूपों की तरह ही दशमहाविद्या भी भक्तों को तमाम सुखों को देने वाली शक्तियां मानी गई है।
इन दशमहाविद्याओं में ही एक भगवती बगलामुखी की उपासना शत्रुबाधा और बुरी मंशाओं को असफल बनाने में असरदार व अचूक मानी गई है। शास्त्रों में देवी की इस शक्ति को 'स्तम्भन' कहा गया है। सरल शब्दों में कहें तो यह बुरे भाव या क्रियाओं को बेअसर करती या बांध देती है। यह भक्त के मन से भी क्लेश व दोष रूपी शत्रुओं का अंत करती है। 
यही कारण है कि देवी उपासना के विशेष अवसरों शुक्रवार आदि को देवी बगलामुखी साधना संकटमोचक मानी गई है। वैसे शास्त्रों में देवी बगलामुखी की साधना में नियम-संयम का महत्व बताया गया है। किंतु नियमित रूप से देवी स्मरण के लिए यहां बताई आसान विधि व मंत्र भी मंगलकारी और शत्रु बाधा दूर करने में असरदार साबित होगी -
- सुबह स्नान के बाद पीले वस्त्र पहन पीले आसन पर पूर्व दिशा में मुख कर बैठें। देवी की प्रतिमा या तस्वीर को पीले आसन बिछी चौकी पर स्थापित कर पूजा करें।
- पूजा में मां बगलामुखी को पीले रंग का चंदन, अक्षत, फूल, फल, वस्त्र, हल्दी या हल्दी की माला, मिठाई का नैवेद्य अर्पित करें।
- गाय के घी का दीप व धूप लगाकर नीचे लिखे बगलामुखी मंत्र का स्मरण कर दु:ख व संकटमुक्त जीवन की कामना कर देवी की आरती करें व हर बुराई के लिये क्षमा मांगे -
मध्ये सुधाब्धि मणि मण्डप रत्नवेद्यां
सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम्।
पीताम्बराभरण माल्य विभूषिताङ्गीं
देवीं स्मरामि धृत मुद्गर वैरिजिह्वाम्।।
जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं, वामेन शत्रून परिपीडयंतीम्।
गदाभिघातेन् च दक्षिणेन्, पीताम्बराढ्यां द्विभुजा नमामि।।




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